श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1360, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 13/124-135 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीजगन्नाथ-दर्शनसे भी महाप्रभुका वैसा ही गोपी-भाव :- जगन्नाथ देखि' प्रभुर से भाव उठिल। सेइ भावाविष्ट हञा धुया गाओयाइल॥ 125 ॥ अनुवाद—पहले जैसे कुरुक्षेत्रमें सभी गोपियाँ श्रीकृष्णका दर्शन पाकर आनन्दित हो गयीं थीं, श्रीजगन्नाथको देखकर महाप्रभुमें भी वही भाव उदित हुआ। उसी भावमें आविष्ट होकर महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदरसे उस पदका बार-बार गान करवाया था॥ 124-125 ॥ राजवेशधारी श्रीकृष्णके प्रति गोपवधू श्रीमती राधिकाकी उक्ति :- अवशेषे राधा कृष्णे करे निवेदन। 'सेइ तुमि, सेइ आमि, सेइ नव सङ्गम॥ 126 ॥ तथापि आमार मन हरे वृन्दावन। वृन्दावने उदय कराओ आपन-चरण॥ 127 ॥ इँहा लोकारण्य, हाती, घोड़ा, रथध्वनि। ताँहा पुष्पारण्य, भृङ्ग-पिक-नाद शुनि॥ 128 ॥ एइ राजवेश, सङ्गे सब क्षत्रियगण। ताँहा गोपवेश, सङ्गे मुरली-वादन॥ 129 ॥ व्रजे तोमार सङ्गे येइ सुख-आस्वादन। सेइ सुखसमुद्ररे इँहा नाहि एक कण॥ 130 ॥ आमा लञा पुनः लीला करह वृन्दावने। तबे आमार मनोवाञ्छा हय त' पूरणे॥' 131 ॥ अनुवाद—अन्तमें श्रीमती राधिका श्रीकृष्णसे इस प्रकार निवेदन करने लगीं,—'आप भी वही हैं, मैं भी वही हूँ और हमारा मिलन भी नवनवायमान जैसा ही है। तथापि मेरे मनको तो वृन्दावनकी स्मृति हरण कर रही है, अतः आप वृन्दावनमें अपने चरण धरो अर्थात् वृन्दावनमें प्रवेश करो। यहाँपर लोगोंकी भीड़, हाथियों, घोड़ों और रथोंका कोलाहल है, परन्तु वृन्दावनमें पुष्पोंके वन तथा भ्रमर और कोयल की मधुर ध्वनि सुनायी देती है। यहाँ आपका राजवेश है और साथमें योद्धा भी हैं और वृन्दावनमें आपका गोपवेश होता है और वहाँ आप मुरलीवादन करते हैं। [इस स्थानपर रणभूमिका परिवेश है, प्रेमरसास्वादनके अनुकूल वातावरण नहीं है]। इसलिये व्रजमें आपके साथ जो सुखका आस्वादन है, उस सुख-समुद्रका यहाँ एक कण भी नहीं है। मुझे साथ लेकर पुनः उसी वृन्दावनमें आप लीला कीजिये, तभी मेरी मनोवाञ्छा पूर्ण होगी॥ 126-131 ॥ प्रथम अध्यायमें सूत्र-वर्णनके बीचमें यह वर्णित :— भागवते आछे यैछे राधिका-वचन। पूर्वे ताहा सूत्रमध्ये करियाछि वर्णन॥ 132 ॥ अनुवाद—(ग्रन्थकार कह रहे हैं—) भागवतमें जैसे श्रीमती राधिकाके वचन वर्णित हैं, उन्हीं वचनोंका मैंने पहले श्रीचैतन्यलीलाके सूत्ररूप वर्णनमें (मध्यलीलाके पहले अध्यायमें) उल्लेख किया है॥ 132 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 1/81 संख्या, 13/136 संख्या देखें॥ 132 ॥ भागवतके इन श्लोकोंका अर्थ श्रीस्वरूप और श्रीरूपके अतिरिक्त अन्योंके लिये अज्ञेय :- सेइ भावावेशे प्रभु पड़े आर श्लोक। सेइ सब श्लोकेर अर्थ नाहि बुझे लोक॥ 133 ॥ स्वरूप-गोसाञि जाने, ना कहे अर्थ तार। श्रीरूप-गोसाञि कैल से अर्थ प्रचार॥ 134 ॥ अनुवाद—श्रीमती राधिकाके भावावेशमें महाप्रभुने और कई श्लोक पढ़े। इन सब श्लोकोंके अर्थको साधारण लोग नहीं समझ सकते। यद्यपि श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी उन श्लोकोंके अर्थको जानते थे, तथापि उन्होंने किसीको भी उन्हें प्रकाशित नहीं किया। श्रीरूप गोस्वामीने ही उनके अर्थका प्रचार किया॥ 133-134 ॥ नृत्यके बीचमें नित्य-आस्वादित श्लोकोंका उच्चारण :— स्वरूप सङ्गे यार अर्थ करे आस्वादन। नृत्यमध्ये सेइ श्लोक करेन पठन॥ 135 ॥ 516 ।