श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1361, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेरहवाँ अध्याय 13/133-140 ] अनुवाद—महाप्रभु श्रीस्वरूप दामोदरके साथ जिन श्लोकोंके भावोंका आस्वादन करते थे, उन्हीं श्लोकोंका नृत्य करते हुए पाठ करते ॥ 135 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 1/59-60, 69-72 और 76-84 संख्या देखें ॥ 133-135 ॥ गोपियोंकी अपने घरमें श्रीकृष्णको पानेकी आकाङ्क्षा :- श्रीमद्भागवत (10/82/48)— आहुश्च ते नलिन-नाभ पदारविन्दं योगेश्वरैर्हृदि विचिन्त्यमगाधबोधैः। संसारकूपपतितोत्तरणावलम्बं गेहं जुषामपि मनस्युदियात् सदा नः ॥ 136 ॥ अनुवाद—[इसका शाब्दिक अर्थ है]—गोपियोंने कहा,—“प्रिय प्रभो! आपकी नाभि कमल-पुष्पके समान है। संसारकूपमें पतित जीवोंके लिये आपके चरणकमल ही एकमात्र आश्रय हैं। बड़े-बड़े ज्ञानी और योगी भी आपके चरणकमलोंकी आराधना करते हैं। वे ध्यानमें उनके दर्शनोंकी अभिलाषा रखते हैं, परन्तु यदा-कदा ही वे उनके दर्शन पाते हैं। यद्यपि हम गृह-शृंखलामें आबद्ध साधारण जीव हैं, किन्तु आपसे प्रार्थना करती हैं कि आपके ये चरणकमल हमारे हृदयमें भी उदित हों ॥” 136 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 1/81 संख्या देखें ॥ 136 ॥ कृष्णेन्द्रिय-प्रीतिवाञ्छामय शुद्ध हृदयरूपी वृन्दावनमें ही श्रीकृष्णके उदय होनेकी योग्यता :- “अन्येर हृदय—मन, मोर मन—वृन्दावन, 'मने' 'वने' एक करि' जानि। ताँहा तोमार पदद्वय, कराह यदि उदय, तबे तोमार पूर्ण कृपा मानि ॥ 137 ॥ अनुवाद—श्रीमती राधारानीके भावोंमें विभावित होकर महाप्रभु श्रीजगन्नाथसे कह रहे हैं,—“संसारके लोगोंका मन ही हृदय है, परन्तु मेरा मन और वृन्दावन एक है, क्योंकि मेरा मन वृन्दावनसे कभी पृथक् नहीं होता। मेरा मन वृन्दावन है, जहाँ आप परम सुख अनुभव करते हो। वृन्दावनका आनन्द लेनेके लिये आप अपने चरणकमल मेरे मनरूपी वृन्दावनमें रखोगे, तो मैं इसे आपकी पूर्ण कृपा मानूँगी ॥ 137 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अन्य लोगोंका मन ही हृदय है, किन्तु मेरा मन वृन्दावनसे पृथक् नहीं है। मैं मन और वृन्दावनको 'एक' ही जानती हूँ ॥ 137 ॥ अनुभाष्य—प्राकृत मानव सङ्कल्प और विकल्पात्मक धर्मसे युक्त हृदयको 'मन' मानता है। प्राकृत-भोगबुद्धि परित्याग करके मैं अपने श्रीकृष्ण-सेवापरायण चित्तको ही श्रीराधाकृष्णकी विहार भूमि 'वृन्दावन' मानती हूँ। प्राकृत-विषय-चेष्टारहित मनको वृन्दावनसे 'अभिन्न' मानती हूँ ॥ 137 ॥ शुद्ध हृदयमें श्रीकृष्णसङ्ग-लालसा :- प्राणनाथ, शुन मोर निवेदन। व्रज—आमार सदन, ताँहा तोमार सङ्गम, ना पाइले ना रहे जीवन ॥ 138 ॥ ध्रु ॥ अनुवाद—हे प्राणनाथ ! मेरा एक निवेदन सुनिये। व्रज मेरा घर है, वहाँ आपका सङ्ग प्राप्त नहीं करनेपर मेरा जीवन नहीं रहेगा ॥ 138 ॥ कृष्णेन्द्रिय प्रीतिवाञ्छामें ऐश्वर्यसूचक ज्ञान शिथिल :- पूर्वे उद्धव-द्वारे, एबे साक्षात् आमारे, योग-ज्ञाने कहिला उपाय। तुमि-विदग्ध, कृपामय, जानह आमार हृदय, मोरे ऐछे कहिते ना युयाय ॥ 139 ॥ ऐकान्तिक कृष्णप्रेममें उसके अतिरिक्त अन्य अभिनिवेश असम्भव :- चित्त काढ़ि तोमा हैते, विषये चाहि लगाइते, यत्न करि, नारि काढ़िबारे। तारे ध्यान शिक्षा कराह, लोक हासाञा मार, स्थानास्थान ना कर विचारे ॥ 140 ॥ । 517