श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1362, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 13/139-146 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ऐश्वर्य ज्ञानके अभ्यासमें गोपियोंकी विरक्ति :- नहे गोपी योगेश्वर, पदकमल तोमार, ध्यान करि' पाइबे सन्तोष। तोमार वाक्य-परिपाटी, तार मध्ये कुटिनाटी, शुनि' गोपीर आरो बाढ़े रोष ॥ 141 ॥ कृष्णविरहके ग्राससे ही उद्धारकी गोपियोंकी इच्छा, अपने संसार-बन्धनसे मुक्त होनेकी इच्छा नहीं :- देह-स्मृति नाहि यार, संसार-कूप काँहा तार, ताहा हैते ना चाहे उद्धार। विरह-समुद्र-जले, काम-तिमिङ्गिल गिले, गोपीगणे नेह' तार पार ॥ 142 ॥ व्रजलीला और स्वजनोंको भूलनेके कारण श्रीकृष्णको उलाहना देना :- वृन्दावन, गोवर्धन, यमुना-पुलिन, वन, सेइ कुञ्जे रासादिक लीला। सेइ व्रजेर जनगण, माता, पिता, बन्धुगण, बड़ चित्र, केमने पासरिला ॥ 143 ॥ श्रीकृष्णकी व्रजकी विस्मृतिको देखकर प्रियतमको दोष न देकर अपने भाग्यको धिक्कार :- विदग्ध, मृदु, सद्गुण, सुशील, स्निग्ध, करुण, तुमि, तोमार नाहि दोषाभास। तबे ये तोमार मन, नाहि स्मरे व्रजजन, से-आमार दुर्दैव-विलास ॥ 144 ॥ यशोदाका दुःख बतलाकर आवेदनके द्वारा श्रीकृष्णकी करुणाको उदित करानेकी चेष्टा; श्रीकृष्णके विरहकी अपेक्षा व्रजवासियोंकी मृत्युकी कामना :- ना देखि आपन-दुःख, देखि' व्रजेश्वरी-मुख, व्रजजनेर हृदय विदरे। किवा मार' व्रजवासी, किवा जीयाओ व्रजे आसि', केन जीयाओ दुःख सहाइबारे ? ॥ 145 ॥ श्रीकृष्णकी ऐश्वर्यलीलामें व्रजवासियोंकी अरुचि, फिर भी व्रजके त्याग और श्रीकृष्णके विरहमें मृतप्राय :- तोमार ये अन्यवेश, अन्य सङ्ग, अन्य देश, व्रजजने कभु नाहि भाय। व्रजभूमि छाड़िते नारे, तोमा ना देखिले मरे, व्रजजनेर कि हबे उपाय ? ॥ 146 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 139-146 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे कृष्ण! तुम जब मथुरामें थे, तब उद्धवके माध्यमसे 'ज्ञानयोग'का उपदेश भेजकर कि ज्ञानयोगसे तुम्हें प्राप्त किया जा सकता है, यह बात तुमने कही थी। अब इस कुरुक्षेत्रमें साक्षात् मिलन होनेपर भी उसी प्रकार 'ज्ञानयोग' बतला रहे हो। मेरा हृदय-प्रेममय है, इसमें ज्ञानयोगका स्थान नहीं है। ऐसा जाननेपर भी तुम्हारा इस प्रकार उपदेश देना उचित नहीं है। मैं तुमसे चित्त हटाकर विषयमें लगानेकी इच्छा करनेपर भी वैसा नहीं कर पाती। इसलिये तुम्हारे प्रति ऐसी अनुरक्ति ही जब मेरा स्वभाव है, तब मुझे ध्यानकी शिक्षा देना-केवल लोकहास्य मात्र है; इसलिये तुमने स्थान-अस्थानका विचार नहीं किया है। गोपियाँ कोई योगेश्वर नहीं है कि तुम्हारे चरणकमलोंका ध्यान करके आनन्द प्राप्त करेंगी। तुम्हारे वचनोंकी परिपाटी उचित होनेपर भी गोपियोंको (अपने) ध्यानके विषयमें शिक्षा देना-केवल कुटिनाटी (कपटता मात्र) है। इस (ध्यानकी शिक्षाकी आवश्यकताको) सुनकर गोपियोंमें अधिक अभिमान उत्पन्न होता है। गोपियोंकी स्वाभाविक रूपसे ही जब देहकी स्मृति नहीं है, तब 'संसार-कूप'के नामपर तो उनका कुछ है ही नहीं। इसलिये मुक्तिजनक ध्यानकी पद्धति उनके लिये विफल (मात्र) है। तुम्हारे विरह-समुद्रमें पड़ी हुई गोपियोंको केवल तुम्हारी सेवा-कामरूपी तिमिङ्गल (बहुत बड़ी विशेष मछली) निगल रही है, उससे अर्थात् उस विरहसे उनका उद्धार करो। आश्चर्यकी बात यह है कि, तुम अपने उन व्रजजनों अर्थात् माता, पिता, बन्धुओंको कैसे भूल गये? तुम विशुद्ध पुरुष, मृदु, सद्गुणोंके द्वारा सदैव सुशील, स्निग्ध, करुण हो, इसलिये तुम्हारे ऐसे व्यवहारमें दोषाभास भी नहीं है। फिर भी तुम व्रजजनोंको अब 518 ।