श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1363, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेरहवाँ अध्याय 13/139-149 ] स्मरण नहीं करते हो, वह केवल हमारा ही दुर्दैवविलास श्रीकृष्णको व्रजमें आनेके लिये कातर होकर आवेदन :- (दुर्भाग्यका खेल) है। मैं अपने दुःखको नहीं देख रही तुमि—व्रजेर जीवन, व्रजराजेर प्राणधन, हूँ, (किन्तु सत्य तो यह है कि), ब्रजेश्वरी यशोदाका तुमि—व्रजेर सकल सम्पद्। दुःख देखकर व्रजवासियोंका हृदय वास्तवमें फट जाता कृपार्द्र तोमार मन, आसि' जीयाओ व्रजजन, है। तुम व्रजवासियोंको विरहके द्वारा कभी तो मरे हुए व्रजे उदय कराओ निज-पद ॥ 147 ॥ जैसा बना देते हो, कभी मिलनके द्वारा जीवित करते अनुवाद—हे कृष्ण! तुम व्रजके जीवन हो। व्रजराज हो,—किसलिये यह दुःख सहन करनेके लिये जीवित नन्द महाराजके प्राणधन हो। तुम तो समस्त व्रजकी रखते हो, इस विषयमें कुछ नहीं कह सकती। तुम्हारा एकमात्र सम्पत्ति हो। तुम्हारा मन कृपासे द्रवीभूत रहता यह माथुर राजवेशादि धारण करना, व्रजसे पृथक् है। तुम व्रजमें आकर व्रजवासियोंको सञ्जीवित करो। स्थानपर वास और महिषियोंका सङ्ग, यह व्रजवासियोंको कृपाकर व्रजमें पदार्पण करो ॥ 147 ॥ बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता। व्रजवासियोंकी यही श्रीकृष्णकी लज्जा, व्याकुलता एवं एक विचित्र बात है कि, वे व्रजभूमिको छोड़कर अन्यत्र श्रीराधाको सान्त्वना :- नहीं जा सकते, और दूसरी ओर, तुम्हें नहीं देखनेपर शुनिया राधिका-वाणी, व्रजप्रेम मने जानि, मर भी रहे हैं, इसलिये व्रजवासियोंके लिये क्या उपाय भावे व्याकुलित देह-मन। होगा, उसे तुम ही जानते हो ॥ 139-146 ॥ व्रजलोकेर प्रेम शुनि', आपनाके 'ऋणी' मानि', अनुभाष्य— 'उद्धव-द्वारे'—भाः दशम स्कन्ध, 47वाँ करे कृष्ण ताँरे आश्वासन ॥ 148 ॥ अध्याय देखें। श्रीकृष्णका सहैतुक प्रत्युत्तर :- 'विषय'—श्रीकृष्णसे भिन्न वस्तु अथवा कार्य। 'प्राणप्रिये, शून, मोर ए सत्य-वचन। 'कुटिनाटी'—कपटता। तोमा-सबार स्मरणे, झुरों मुञि रात्रिदिने, देहस्मृति या देहमें अभिनिवेश होनेसे 'संसार' होता मोर दुःख ना जाने कोन जन ॥ 149 ॥ ध्रु ॥ है—भाः 11/2/37, 11/3/6 आदि असंख्य भागवतके अनुवाद—श्रीमती राधिकाके वचन सुनकर श्रीकृष्णके श्लोक इसके प्रमाण हैं, अधिकताके भयसे वे यहाँ मनमें व्रजवासियोंके प्रति प्रेम जाग्रत हो उठा और उद्धृत नहीं किये जा रहे हैं। गोपियों (एवं सिद्ध उनके देह तथा मन व्याकुल हो गये। अपने प्रति महाभागवत अथवा परमहंसोंकी भी) देहस्मृति नहीं होती, व्रजवासियोंके प्रेमके विषयमें सुनकर वे स्वयंको ऋणी भाः 10/29/30, 33-34, 11/30/43, 10/32/22, 11/35/19 मानने लगे। तब श्रीकृष्ण श्रीमती राधिकाको आश्वासन आदि श्लोक देखें। देते हुए कहने लगे,—हे प्राणप्रिय राधिके! मैं सत्य 'काम'—भःरःसिः पूर्व विभाग, साधनभक्ति लहरीमें वचन कह रहा हूँ। तुम सबको स्मरण करके मैं गौतमीयतन्त्र-वाक्य—आदिलीला 4/162-214 संख्या एवं रात-दिन रोता हूँ। मेरे दुःखको कोई भी नहीं मध्यलीला 8/207-218 संख्या देखें। जानता ॥ 148-49 ॥ 'तिमिङ्गिल'—बड़ी व्हेल-मछलीको भी निगलनेमें अमृतप्रवाह भाष्य— 'झुरों'—रोता रहता हूँ॥ 149 ॥ जो समर्थ है, ऐसा बहुत बड़ा जलचर जन्तु। अनुभाष्य— 'ऋणी'—आदिलीला 4/179-180 संख्या 'नेह'—ले जाओ। देखें ॥ 148 ॥ 'तार'—विरह-समुद्रका ॥ 139-142 ॥ । 519