भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1364, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1364

[ 13/150–155 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीकृष्णके द्वारा व्रजवासियोंकी विशेषतः गोपियों और श्रीराधिकाकी स्तुति :— व्रजवासी यत जन, माता, पिता, सखागण, सबे हय मोर प्राणसम। ताँर मध्ये गोपीगण, साक्षात् मोर जीवन, तुमि—मोर जीवनेर जीवन ॥ 150 ॥ व्रजवासियोंसे वियोग—श्रीकृष्णके ही दुर्भाग्यका फल :— तोमा-सबार प्रेमरसे, आमाके करिल वशे, आमि तोमार अधीन केवल। तोमा-सबा छाड़ाञा, आमा दूर-देशे लञा, राखियाछे दुर्देव प्रबल ॥ 151 ॥ अनुवाद—समस्त व्रजवासी—माता, पिता, सखादि सभी मेरे प्राणोंके समान हैं। उनमें भी गोपियाँ तो साक्षात् मेरे जीवन स्वरूप हैं और तुम तो मेरे जीवनका भी जीवन हो। तुम सबके प्रेमरसने मुझे वशमें कर रखा है, मैं तो केवल तुम्हारे अधीन हूँ। मेरा प्रबल दुर्देव (दुर्भाग्य) ही तुम सबसे छुड़ाकर, मुझे दूर देशमें ले गया है ॥ 150-151 ॥ परस्परका विच्छेद मृत्युजनक होनेपर भी परस्परकी प्रीतिके लिये कान्त और कान्ताको जीवन-धारणकी इच्छा :— प्रिया प्रिय-सङ्गहीना, प्रिय प्रिया-सङ्ग बिना, नाहि जीये,—ए सत्य प्रमाण। मोर दशा शोने यबे, ताँर एइ दशा हबे, एइ भये दुँहे राखे प्राण ॥ 152 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 152 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्रियके सङ्गके बिना प्रिया स्त्री, प्रियाके सङ्गके बिना प्रिय पुरुष जीवन धारण नहीं कर सकते—यही सत्य प्रमाण है; तथापि (दोनों यही सोचकर) इसलिये जीवन धारण किये रहते हैं कि 'मेरी मृत्युको सुनकर उसकी भी मृत्यु होगी॥'152॥ विरह होनेपर भी प्रियका मङ्गल अथवा प्रीतिवाञ्छा ही यथार्थ प्रेमका परिचय :— सेइ सती—प्रेमवती, प्रेमवान् सेइ पति, वियोगे ये वाञ्छे प्रिय-हिते। ना गणे आपन-दुःख, वाञ्छे प्रियजन-सुख, सेइ दुइ मिले अचिराते ॥ 153 ॥ अनुवाद—वही सती ही प्रेमवती है तथा प्रेमवान् वही पति है, जो वियोगमें भी प्रियका हित चाहते हैं। वे अपने दुःखका विचार न करके केवल प्रियजनके सुखकी ही कामना करते हैं। ऐसे दोनों प्रेमियोंका शीघ्र ही मिलन होता है ॥ 153 ॥ श्रीराधाको प्रबोध प्रदान करनेकी छलना :— राखिते तोमार जीवन, सेवि आमि नारायण, ताँर शक्त्ये आसि निति-निति। तोमा-सने क्रीड़ा करि', पुनः याइ यदुपुरी, ताहा तुमि मानह मोर स्फूर्त्ति ॥ 154 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 154 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—तुम मेरी नित्यप्रिया हो और मेरे विरहमें तुम बचोगी नहीं—ऐसा जानकर मैं नारायणकी सेवा करते हुए उनकी विभुत्व-शक्तिके बलसे प्रतिदिन व्रजमें आकर तुम्हारे साथ क्रीड़ा करके पुनः यदुपुरी लौट जाता हूँ; इसलिये व्रजमें रहकर तुम सोचती हो कि तुम्हें मेरी स्फूर्त्ति हुई है ॥ 154 ॥ अनुभाष्य—'यदुपुरी'—द्वारकामें और मथुरामें ॥ 154 ॥ श्रीराधाप्रेमसे श्रीकृष्णका प्राकट्य :— मोर भाग्य मो-विषये, तोमार ये प्रेम हये, सेइ प्रेम—परम प्रबल। लुकाञा आमा आने, सङ्ग कराय तोमा सने, प्रकटेह आनिबे सत्वर ॥ 155 ॥ 520 ।