श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1365, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेरहवाँ अध्याय 13/155-162 ] श्रीराधाको अपने व्रज-गमन-विषयमें आश्वासन-दान :- यादवेर विपक्ष, यत दुष्ट कंसपक्ष, ताहा आमि कैलुँ सब क्षय। आछे दुइ-चारि जन, ताहा मारि' वृन्दावन, आइलाम आमि, जानिह निश्चय ॥ 156 ॥ सेइ शत्रुगण हैते, व्रजजन राखिते, रहि राज्ये उदासीन हञा। येबा स्त्री-पुत्र-धने, करि राज्य-आवरणे, यदुगुणेर सन्तोष लागिया ॥ 157 ॥ 'व्रजमें आऊगाँ' कहकर श्रीराधासे श्रीकृष्णकी प्रतिज्ञा :- तोमार ये प्रेमगुण, करे आमा आकर्षण, आनिबे आमा दिन दश-विशे। पुनः आसिं वृन्दावने, व्रजबन्धु तोमा-सने, विलासिब रजनी-दिवसे ॥ '158 ॥ श्रीकृष्णोक्त श्लोक श्रवणसे श्रीराधाको विश्वास :- एत ताँरे कहिं कृष्ण, व्रजे याइते सतृष्ण, एक श्लोक पड़ि' शुनाइल। सेइ श्लोक शुनि' राधा, खण्डिल सकल बाधा, कृष्णप्राप्त्ये प्रतीति हइल ॥ 159 ॥ अनुवाद—नारायणकी कृपारूपी मेरे सौभाग्यसे मेरे प्रति तुम्हारा जो प्रेम है, वह प्रेम अति प्रबल है। वही मुझे गुप्तरूपसे व्रजमें लाकर तुम्हारे साथ मेरा सङ्ग कराता है। मुझे विश्वास है कि शीघ्र ही वह साक्षात् रूपमें भी मुझे वहाँ ले जायेगा। यादवोंके जो विपक्षी थे, कंस और उसके पक्षके जो दुष्ट राजा थे—मैंने उस सबका वध कर दिया है। अब तो केवल दो-चार दुष्ट लोग ही बचे हैं, निश्चय जानो कि उन्हें मारकर मैं वृन्दावनमें आ ही गया हूँ। उन शत्रुओंसे तुम व्रजवासियोंकी रक्षाके लिये ही मैं अपने राज्यमें रहता हूँ। परन्तु मैं उस राज्यके प्रति उदासीन हूँ। उस राज्यमें मेरे जो स्त्री-पुत्र-धन आदि हैं, उनका निर्वाह मैं केवल यादवोंकी सन्तुष्टिके लिये ही करता हूँ। तुम्हारा जो प्रेमरूपी गुण है, वही मुझे सदा वृन्दावनमें आकर्षित करता है और मुझे दस-बीस दिनोंमें व्रजमें ले जायेगा। पुनः वृन्दावनमें आकर मैं तुम्हारे और सब व्रजवधुओंके साथ रात-दिन विलास करूँगा।' श्रीराधासे इतना कहकर श्रीकृष्ण व्रजमें जानेके लिये आतुर हो गये। तब उन्होंने एक श्लोक कहा जिसे सुनकर श्रीराधाको विश्वास हो गया कि अब समस्त बाधाएँ दूर हो गयी हैं और उन्हें श्रीकृष्णप्राप्ति अवश्य होगी ॥ 155-159 ॥ अनुभाष्य—'येबा'—यद्यपि ॥ 157 ॥ गोपियोंका कृष्णप्रेम ही उनकी श्रीकृष्णप्राप्तिका कारण :- श्रीमद्भागवत (10/82/44)— मयि भक्तिर्हि भूतानाममृतत्वाय कल्पते। दिष्ट्या यदासीन्मत्स्नेहो भवतीनां मदापनः ॥ 160 ॥ अनुवाद—मेरे प्रति भक्ति ही जीवोंके लिये अमृत है। हे गोपियों! मेरे प्रति तुम्हारा जो स्नेह है, वही एकमात्र तुम लोगोंका मुझे प्राप्त करनेका कारण है ॥ 160 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/23 संख्या देखें ॥ 160 ॥ श्रीस्वरूपके साथ महाप्रभुका आस्वादन :- एइ सब अर्थ प्रभु स्वरूपेर सने। रात्रि-दिने घरे बसि' करे आस्वादने ॥ 161 ॥ अनुवाद—भागवतके श्लोकोंके इन सब भावोंका महाप्रभु श्रीस्वरूप दामोदरके साथ रात-दिन अपने वासस्थानमें बैठकर आस्वादन करते थे ॥ 161 ॥ श्रीजगन्नाथको देखकर राधाभावमें भावित महाप्रभुका श्लोक पाठ :- नृत्यकाले सेइ भावे आविष्ट हञा। श्लोक पड़ि' नाचे जगन्नाथ-मुख चाञा ॥ 162 ॥ अनुवाद—इन्हीं भावोंमें आविष्ट होकर महाप्रभु नृत्य कर रहे थे। श्रीजगन्नाथका मुख दर्शन करते हुए महाप्रभु नृत्य करते समय ये सब श्लोक पढ़ रहे थे ॥ 162 ॥ । 521