भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1366, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1366

[ 13/163–172 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ग्रन्थकारके द्वारा श्रीस्वरूप दामोदरकी स्तुति :— स्वरूप-गोसाञिर भाग्य ना याय वर्णन। प्रभुते आविष्ट याँर काय, वाक्य, मन ॥ 163 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरके भाग्यका वर्णन नहीं किया जा सकता जो तन-मन और वचनसे महाप्रभुमें ही आविष्ट रहते थे॥ 163 ॥ कृष्णसेवारत महाप्रभु और श्रीस्वरूपकी इन्द्रियाँ अभिन्न :— स्वरूपेर इन्द्रिये प्रभुर निजेन्द्रियगण। आविष्ट हञा करे गान-आस्वादन ॥ 164 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरकी इन्द्रियोंमें अपनी इन्द्रियोंको आविष्ट करके महाप्रभु उनके गानका आस्वादन कर रहे थे॥ 164 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—स्वरूप दामोदर जब इन सब भावोंका गान करते हैं, तब महाप्रभुकी नेत्र-कर्ण आदि अपनी इन्द्रियाँ स्वरूपकी इन्द्रियोंमें आविष्ट होकर गानका आस्वादन करने लगती हैं, अर्थात् दोनोंका एकचित्तता (चित्तका एक समान होना) और एकतानता (एक ही वस्तुके प्रति आकर्षित होना) सर्वोत्तम रूपसे उदित होता है॥ 164 ॥ कान्तकी उदासीनताके कारण मलिन-मुखवाली मानिनी श्रीराधाके भावोंमें आविष्ट महाप्रभु :— भावेर आवेशे कभु भूमिते बसिया। तर्जनीते भूमे लिखे अधोमुख हञा ॥ 165 ॥ अनुवाद—भावाविष्ट होकर महाप्रभु कभी भूमिपर बैठ जाते और नीचेकी ओर मुख करके अपनी तर्जनी अङ्गुलीके द्वारा भूमिपर कुछ लिखने लगते॥ 165 ॥ महाप्रभुकी अङ्गुलीमें चोट लगनेके भयसे श्रीस्वरूपकी सतर्कता :— अङ्गुलिते क्षत हबे जानि' दामोदर। भये निज-करे निवारये प्रभु-कर ॥ 166 ॥ अनुवाद—यह जानते हुए कि भूमिपर लिखनेसे महाप्रभुकी अङ्गुलीमें घाव हो जायेगा, श्रीस्वरूप दामोदरने अपने हाथोंसे उनको रोक दिया॥ 166 ॥ अनुभाष्य—'दामोदर'—श्रीस्वरूप॥ 166 ॥ श्रीस्वरूपके कीर्तनसे महाप्रभुके हृदयमें राधाभावके वैचित्य मूर्तिमान :— प्रभुर भावानुरूप स्वरूपेर गान। यबे येइ रस, ताहा करे मूर्त्तिमान ॥ 167 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके भावोंके अनुरूप ही श्रीस्वरूप दामोदर गान करते थे। जिस समय महाप्रभु जिस रसका आस्वादन करते थे, उसी समय उसके अनुरूप गान करके श्रीस्वरूप दामोदर उस रसको मूर्तिमान कर देते थे॥ 167 ॥ श्रीजगन्नाथके श्रीरूपका वर्णन :— श्रीजगन्नाथेर देखे श्रीमुख-कमल। ताहार उपर सुन्दर नयनयुगल ॥ 168 ॥ सूर्य्येर किरणे मुख करे झलमल। माल्य, वस्त्र, दिव्य, अलङ्कार, परिमल ॥ 169 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीजगन्नाथके मुखकमल और उसके ऊपर शोभायमान सुन्दर नेत्रोंको देखा। उनके श्रीअङ्गोंपर माला, वस्त्र और दिव्य अलङ्कार थे। सूर्यकी किरणोंसे श्रीजगन्नाथका मुखकमल झलमल कर रहा था और सारा वातावरण सुन्धित हो रहा था॥ 168-169 ॥ अनुभाष्य—'परिमल'—सुगन्ध॥ 169 ॥ महाप्रभुका दिव्य-उन्माद :— प्रभुर हृदये आनन्दसिन्धु उथलिल। उन्माद, झञ्झा-वात ततक्षणे उठिल ॥ 170 ॥ आनन्दोन्मादे उठाय भावेर तरङ्ग। नाना-भाव-सैन्ये उपजिल युद्ध-रङ्ग ॥ 171 ॥ भावोदय, भावशान्ति, सन्धि, शाबल्य। सञ्चारी, सात्त्विक, स्थायी स्वभाव-प्राबल्य ॥ 172 ॥ 522 ।