भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1367

तेरहवाँ अध्याय 13/170-179 ] अनुवाद—महाप्रभुके हृदयमें आनन्दके सागरकी लहरें उठने लगीं और उसमें उसी समय उन्मादकी तीव्रताने तूफानका रूप ले लिया। आनन्दके उन्मादमें अनेक भावोंकी तरङ्ग उठने लगीं और उन भावोंमें विरोधी सेनाओं जैसा युद्ध होने लगा। महाप्रभुमें कभी भाव उदय होते और अत्यधिक रूपमें प्रकट होकर कभी शान्त हो जाते, तो कभी अनेक भावोंकी सन्धि होती और कभी एक भाव दूसरोंको दबाकर प्रबल होनेसे भाव-शाबल्य होता। इस प्रकार सञ्चारी, सात्त्विक और स्थायी भावोंने महाप्रभुके शरीरपर अत्यधिक प्रबलता धारण की ॥ 170-172 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'झञ्झावात'—बीच-बीचमें आनेवाली तेज हवा। 'भावोदय', 'भावशान्ति', 'सन्धि', 'शाबल्य'—भावोदय, भावशान्ति, भावसन्धि, भावशाबल्य ॥ 170-172 ॥ अनुभाष्य—'उन्माद'—मध्यलीला 2/66 संख्या देखें। भाव-सन्धि, भाव-शाबल्य आदिके लिये मध्यलीला 2/63 संख्या देखें ॥ 170-172 ॥ स्वर्णगिरिके साथ महाप्रभुकी देह और पुष्पवृक्षके साथ सात्त्विक भावोंकी उपमा :- प्रभुर शरीर येन शुद्ध-हेमाचल। भाव-पुष्पद्रुम ताहे पुष्पित सकल ॥ 173 ॥ महाप्रभुके प्रेम-दर्शनसे सभी श्रीकृष्णप्रेममें उन्मत्त :- देखिते आकर्षये सबार चित्त-मन। प्रेमामृतवृष्ट्ये प्रभु सिञ्चे सबार मन ॥ 174 ॥ जगन्नाथ-सेवक यत राजपात्रगण। यात्रिक लोक, नीलाचलवासी यत जन ॥ 175 ॥ प्रभुर नृत्य प्रेम देखि' हय चमत्कार। कृष्णप्रेम उपजिल हृदये सबार ॥ 176 ॥ अनुवाद—महाप्रभुका शरीर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह शुद्ध-स्वर्णका पर्वत था और उसपर भावरूपी पुष्पोंके वृक्ष सब पुष्पित हो रहे थे। इस प्रकार महाप्रभुके भावोंको देखकर सभीके चित्त और मन आकर्षित हो रहे थे। महाप्रभुने श्रीकृष्णप्रेमके अमृतकी वर्षा करके श्रीजगन्नाथके सेवक, राजकर्मचारी, यात्रीगण और सभी नीलाचलवासी आदि जितने भी लोग वहाँ उपस्थित थे, सभीके हृदयोंका सिञ्चन किया। महाप्रभुके नृत्य और प्रेमको देखकर सभीके मन चमत्कृत हुए और उनके दर्शनसे सभीके हृदयमें श्रीकृष्णप्रेम उदित हो गया ॥ 173-176 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 2/81-82 संख्या देखें ॥ 174-176 ॥ सभीका प्रेम-कलरव :- प्रेमे नाचे, गाय, लोक, करे कोलाहल। प्रभु-नृत्ये कैल यात्री चौगुण-मङ्गल ॥ 177 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णप्रेममें मत्त होकर सभी लोग नृत्य-गान करते हुए कोलाहल कर रहे थे। महाप्रभुके नृत्यसे यात्रियोंकी मङ्गलध्वनि चौगुनी हो गयी ॥ 177 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'चौगुण मङ्गल'—चार गुणा मङ्गलध्वनि ॥ 177 ॥ श्रीकृष्ण-बलरामके द्वारा भी महाप्रभुके नृत्यका दर्शन :- अन्येर कि काय, जगन्नाथ-हलधर। प्रभुर नृत्य देखि' सुखे चलिला मन्थर ॥ 178 ॥ दोनोंके द्वारा महाप्रभुके नृत्यको देखकर चलना स्थगित करना :- कभु सुखे नृत्यरङ्ग देखे रथ राखि'। से कौतुक ये देखिल, सेइ तार साक्षी ॥ 179 ॥ अनुवाद—अन्य लोगोंकी तो बात ही क्या, स्वयं श्रीजगन्नाथ और श्रीबलदेव भी महाप्रभुके नृत्यको देखनेके लिये धीरे-धीरे चलने लगे और कभी-कभी अपने रथको रोककर आनन्दसे महाप्रभुके नृत्यको देखते। इस कौतुकको जिसने देखा, वही उसका साक्षी है॥ 178-179 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मन्थर'—धीरे-धीरे ॥ 178 ॥ । 523