श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1368, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 13/180-190 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला नृत्य करते हुए महाप्रभुका राजाके आगे गिरने लगना :- एइमत नृत्य प्रभु करिते भ्रमिते। प्रतापरुद्रेर आगे लागिला पड़िते॥180॥ राजाके द्वारा महाप्रभुको पकड़ना, महाप्रभुकी बाह्यदशा :- सम्भ्रमे प्रतापरुद्र प्रभुरे धरिल। ताँहाके देखिते प्रभुर बाह्य हइल॥181॥ बाह्यदशामें लोकशिक्षक जगद्गुरु आचार्यलीलाकारी महाप्रभुका राजाके स्पर्श करनेसे स्वयंको धिक्कार :- राजा देखि' महाप्रभु करेन धिक्कार। “छि, छि, विषयीर स्पर्श हइल आमार॥”182॥ अनुवाद—महाप्रभु जब इस प्रकार नृत्य और भ्रमण कर रहे थे, तब वे राजा प्रतापरुद्रके आगे गिरने लगे। राजा प्रतापरुद्रने महाप्रभुको गिरते हुए देखकर उन्हें आदरपूर्वक पकड़ लिया, परन्तु राजाको देखते ही महाप्रभुको बाहरी ज्ञान हो आया। राजाको देखते ही महाप्रभु अपनेको धिक्कारते हुए कहने लगे,—“छि, छि, मुझे एक विषयीका स्पर्श हो गया है॥”180-182॥ आवेशेते नित्यानन्द हैला असावधान। काशीश्वर-गोविन्दादि छिला अन्यस्थान॥183॥ अनुवाद—उस समय श्रीनित्यानन्द प्रभु भी भावमें आविष्ट होनेके कारण असावधान हो गये थे और श्रीकाशीश्वर एवं श्रीगोविन्दादि महाप्रभुके सेवक भी किसी अन्य स्थानपर थे॥183॥ राजाकी दैन्यमयी श्रीकृष्णसेवा-दर्शनसे हृदयमें सन्तोष, भक्तिसाधकके हितके लिये बाहरसे रोषाभास :- यद्यपि राजारे देखि' हाड़िर सेवने। प्रसन्न हञाछे ताँरे मिलिबारे मने॥184॥ तथापि आपन-गणे करिते सावधान। बाह्य किछु रोषाभास कैला भगवान् ॥185॥ अनुवाद—यद्यपि राजाको श्रीजगन्नाथके झाडूदारका कार्य करते देखकर महाप्रभु प्रसन्न हुए थे और राजासे मिलना भी चाहते थे, तथापि अपने परिकरोंको सावधान करनेके लिये भगवान्ने बाहरसे कुछ क्रोधका आभास दिखलाया॥184-185॥ अनुभाष्य— 'हाड़िर सेवन'—रास्तेमें झाडूदारका कार्य; मध्यलीला 13/15-18 संख्या देखें। 'आपन-गण'—भवसागरसे पार जानेके इच्छुक, निष्किञ्चन, भगवद्-भजनोन्मुख अर्थात् प्रेमकी भूमिकामें आरूढ़ होनेके इच्छुककी लीला करनेवाले भक्तगण॥184-185॥ महाप्रभुके वाक्यको सुनकर राजाको भय, श्रीसार्वभौमका आश्वासन :- प्रभुर वचने राजार मने हैल भय। सार्वभौम कहे,—“तुमि ना कर संशय॥186॥ तोमार उपरे प्रभुर सुप्रसन्न मन। तोमा लक्ष्य करि' शिखायेन निजगण॥187॥ अवसर जानि' आमि करिब निवेदन। सेइकाले याइ' करिह प्रभुर मिलन॥”188॥ अनुवाद—महाप्रभुके वचन सुनकर राजाके मनमें भय उत्पन्न हुआ, परन्तु श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने राजाको सान्त्वना देते हुए कहा,—“आप किसी भी प्रकारका संशय मत करें। महाप्रभु आपपर बहुत प्रसन्न हैं। आपको लक्ष्य करके वे अपने परिकरोंको शिक्षा देना चाहते हैं। उचित समय आनेपर मैं आपके विषयमें निवेदन करूँगा, तब आपको महाप्रभुसे मिलना सहज हो जायेगा॥”186-188॥ स्वयं महाप्रभुके द्वारा रथ-सञ्चालन :- तबे महाप्रभु रथ प्रदक्षिण करिया। रथ-पाछे याइ' ठेले रथे माथा दिया॥189॥ रथके चलते हुए देखकर लोगोंके द्वारा हरिध्वनि :- ठेलितेइ चलिल रथ 'हड़' 'हड़' करि'। चतुर्दिके लोक सबे बले 'हरि' 'हरि'॥190॥ 524 ।