श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1369, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेरहवाँ अध्याय 13/189-200 ] अनुवाद—तब महाप्रभुने रथकी परिक्रमा की और रथके पीछे जाकर रथको अपने माथेसे ठेलने लगे। रथको ठेलते ही रथ 'हड़' 'हड़' शब्द करता हुआ आगे चलने लगा। चारों ओरसे सभी लोग 'हरि' 'हरि' बोलने लगे॥ 189-190 ॥ सुभद्रा-बलरामके रथके आगे सगण महाप्रभुका नृत्य :— तबे प्रभु निज-भक्तगण लञा सङ्गे। बलदेव-सुभद्राग्रे नृत्य करे रङ्गे ॥ 191 ॥ उसके बाद श्रीजगन्नाथके रथके आगे नृत्य :— ताँहा नृत्य करि' जगन्नाथाग्रे आइला। जगन्नाथ-आगे नृत्य करिते लागिला ॥ 192 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभु अपने भक्तोंको साथ लेकर श्रीबलदेव एवं श्रीसुभद्राके रथोंके आगे आनन्दसे नृत्य करने लगे। कुछ देर वहाँ नृत्य करनेके बाद महाप्रभु श्रीजगन्नाथके सामने आये। तब श्रीजगन्नाथके रथके आगे नृत्य करने लगे॥ 191-192 ॥ बलगाण्डिपर रथका रुकना :— चलिया आइल रथ 'बलगाण्डि'-स्थाने। जगन्नाथ राखि' देखे डाहिने-वामे ॥ 193 ॥ वामे—'विप्रशासन', नारिकेल-वन। डाहिने त' पुष्पोद्यान येन वृन्दावन ॥ 194 ॥ आगे नृत्य करे गौर लञा भक्तगण। रथ राखि' जगन्नाथ करेन दरशन ॥ 195 ॥ अनुवाद—रथ चलते-चलते बलगाण्डि नामक स्थानपर पहुँच गया। वहाँ रथको रोककर श्रीजगन्नाथ दायें-बायें देखने लगे। बाईं ओर ब्राह्मणोंकी बस्ती और नारियलके वृक्षोंका वन था और दायीं और वृन्दावन जैसा सुन्दर पुष्पोंका उद्यान था। रथके आगे महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ नृत्य कर रहे थे और श्रीजगन्नाथ रथको रोककर नृत्यका दर्शन करने लगे॥ 193-195 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'बलगाण्डि'-स्थाने—श्रद्धाबालु और अर्द्धासनी देवीके बीचमें जो स्थान है, उसका नाम 'बलगाण्डि' है॥ 193॥ अनुभाष्य—उड़ीसामें ब्राह्मणोंकी बस्तीको 'विप्रशासन' कहते हैं॥ 194॥ श्रीजगन्नाथके द्वारा उत्तम भोगोंका आस्वादन :— सेइ स्थले भोग लागे, आछये नियम। कोटि भोग जगन्नाथ करे आस्वादन ॥ 196 ॥ जगन्नाथेर छोट-बड़ यत भक्तगण। निज निज उत्तम-भोग करे समर्पण ॥ 197 ॥ अनुवाद—उस स्थानपर श्रीजगन्नाथको भोग लगता है, ऐसा नियम है। वहाँ असंख्य भोग श्रीजगन्नाथको अर्पित किये गये और उन्होंने सभीका आस्वादन किया। श्रीजगन्नाथके कनिष्ठसे उत्तम जितने भी भक्त हैं, सभीने अपने लाये हुए उत्तम भोग समर्पित किये॥ 196-197 ॥ छोटे-बड़े, प्रजा-राजा सभीके द्वारा भोग समर्पण :— राजा, राजमहिषीवृन्द, पात्र, मित्रगण। नीलाचलवासी यत छोट-बड़ जन ॥ 198 ॥ नाना-देशेर देशी यत यात्रिक जन। निज-निज-भोग ताँहा करे समर्पण ॥ 199 ॥ आगे-पाछे, दुइ पार्श्वे उद्यानेर-वने। येइ याहा पाय, लागाय,—नाहिक नियमे ॥ 200 ॥ अनुवाद—उस स्थानपर स्वयं राजा और उनकी महिषियाँ, राजमन्त्री, राजाके मित्रों एवं नीलाचलवासी सभी छोटे-बड़े लोगों तथा अनेक देशोंसे आये जितने भी यात्री थे, अपना-अपना भोग लाकर उन्होंने श्रीजगन्नाथको वहाँ समर्पित किया। रथके आगे-पीछे, दोनों ओर उद्यानोंमें, जिसे जहाँ स्थान मिला, उसने वहींसे श्रीजगन्नाथको भोग लगाया, वहाँ किसी विशेष स्थानसे भोग लगानेका नियम नहीं है॥ 198-200॥ । 525