श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1370, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 13/201-207 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भोगके समय लोगोंका एकत्रित होना, विश्राम करनेके लिये महाप्रभुका निकटस्थ उद्यानमें जाना :- भोगेर समय लोकेर महा भीड़ हैल। नृत्य छाड़ि' महाप्रभु उपवने गेल॥ 201॥ प्रेमावेशे महाप्रभु उपवन पाञा। पुष्पोद्याने गृहपिण्डाय रहिला पड़िया॥ 202॥ शीतल वायुसे परिश्रम दूर होना :- नृत्य-परिश्रमे प्रभुर देहे घन घर्म। सुगन्धि शीतल-वायु करेन सेवन॥ 203॥ अनुवाद—भोगके समय वहाँ लोगोंकी बहुत भीड़ हो गयी, इसलिये महाप्रभु नृत्य छोड़कर उपवनमें चले गये। प्रेमावेशमें महाप्रभु उपवनमें जाकर एक पुष्प-उद्यानमें एक चबूतरेके ऊपर लेट गये। नृत्यके परिश्रमसे महाप्रभुका शरीर पसीनेसे तर-बतर हो गया था। इसलिये महाप्रभु उस उपवनमें प्रवाहित हो रही सुगन्धित, शीतल वायुका आनन्द लेने लगे॥ 201-203॥ कीर्त्तनकारियोंका वृक्षोंके नीचे विश्राम :- यत भक्त कीर्त्तनीया आसिया आराम। प्रतिवृक्षतले सबे करेन विश्राम॥ 204॥ अनुवाद—जितने भी भक्त सङ्कीर्त्तन कर रहे थे, वे सब उस उपवनमें आकर प्रत्येक वृक्षके नीचे विश्राम करने लगे॥ 204॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आराम'—उद्यानमें (उपवन, वृक्षवाटिका, बागान)॥ 204॥ महाप्रभुका इस प्रकार महासङ्कीर्त्तन :- एइ त' कहिल प्रभुर महासङ्कीर्त्तन। जगन्नाथेर आगे यैछे करिल नर्त्तन॥ 205॥ श्रीरूप गोस्वामीके चैतन्याष्टकमें रथके आगे महाप्रभुके नृत्यका वर्णन :- रथाग्रेते प्रभु यैछे करिला नर्त्तन। श्रीचैतन्याष्टके रूप-गोसाञि करयाछे वर्णन॥ 206॥ अनुवाद—(ग्रन्थकार कह रहे हैं)—यहाँ तक मैंने महाप्रभुके महासङ्कीर्त्तनका और जैसे उन्होंने श्रीजगन्नाथके रथके आगे नृत्य किया, उसका वर्णन किया है। श्रीरूप गोस्वामीने स्वरचित श्रीचैतन्याष्टकमें श्रीजगन्नाथके रथके आगे महाप्रभुने जिस प्रकारसे नृत्य किया था, उसका वर्णन किया है॥ 205-206॥ स्तवमालामें प्रथम चैतन्याष्टक (7) श्लोकमें श्रीरूप गोस्वामी-वाक्य :- रथारूढस्यारादधिपदवि नीलाचलपते- रदभ्रप्रेमोर्मिस्फुरितनटनोल्लासविवशः। सहर्षं गायद्भिः परिवृत-तनुर्वैष्णवजनैः स चैतन्यः किं मे पुनरपि दृशोर्यास्यति पदम् ॥ 207॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 207॥ अमृतप्रवाह भाष्य—रथपर आरूढ़ नीलाचलपतिके सम्मुख अधिक प्रेमकी लहरोंसे स्फुरित नाट्योल्लाससे विवश होकर आनन्दके सहित सङ्कीर्त्तनकारी एवं वैष्णवोंके द्वारा जो आवृत (घिरे हुए) हैं, वे श्रीचैतन्यदेव क्या पुनः मेरे दृष्टिपथ पर आयेंगे?॥ 207॥ तेरहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य—श्रीरूप गोस्वामीने तीन 'श्रीचैतन्याष्टकों'की रचना की है, उनमेंसे प्रथम अष्टकका सातवाँ श्लोक— रथारूढ़स्य (रथोपरि स्थितस्य) नीलाचलपतेः (जगन्नाथ- देवस्य) आरात् (समीपे) अधिपदवि (प्रधानपथे) अदभ्र- प्रेमोर्मिस्फुरित-नटनोल्लासविवशः (अदभ्रेण अधिकेन प्रेमोर्मिणा प्रेमतरङ्गेण स्फुरितः प्रतिबिम्बितः यः नटनोल्लासः नर्त्तन- विलास-हर्षः, तेन विवशः श्रम-विह्वलः) सहर्षं (सानन्दं) गायद्भिः (कीर्त्तनपरैः) वैष्णव-जनैः (भक्तवृन्दैः) परिवृतः-तनुः (वेष्टितविग्रहः एवम्भूतः) सः चैतन्यः (गौरचन्द्रः) पुनरपि किं मे (मम) दृशोः पदं (नयनपथं) यास्यति (प्राप्स्यति)? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। श्रील प्रबोधानन्द सरस्वती त्रिदण्डिपादने स्वकृत 'श्रीराधारससुधानिधि'में भी— “निन्दन्तं पुलकोत्करेण विकसत्प्रप्रसूनच्छविं प्रोद्धींकृत्य 526 ।