श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतेरहवाँ अध्याय 13/207-209 ] भुजद्वयं हरि-हरीत्युच्चैर्वदन्तं मुहुः। नृत्यन्तं द्रुतमश्रुनिर्झरचयैः श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। सिञ्चन्तमुर्वीतलं गायद्भिर्निजपार्षदैः परिवृतं श्रीगौरचन्द्रं स्तुमः ॥ ” चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 209 ॥ अर्थात् “जो सात्त्विक भावोंसे उदित पुलकादि इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे रथाग्रे नर्त्तनं समूहके द्वारा परिशोभित श्रीअङ्गशोभाके द्वारा विकसित नाम त्रयोदश-परिच्छेदः। कदम्ब-पुष्पकी शोभाको भी निन्दित कर रहे हैं, अनुवाद—श्रीजगन्नाथके रथके आगे महाप्रभुके नृत्यकी सुविशाल दोनों भुजाओंको ऊपर उठाकर उच्च स्वरसे लीलाको जो व्यक्ति सुनेगा, उसे महाप्रभुकी प्राप्ति होगी बार बार 'हरि-हरि' बोल रहे हैं, चञ्चल चरणोंसे नृत्य और सुदृढ़ विश्वासके साथ प्रेमाभक्ति प्राप्त होगी। करते-करते अश्रु-प्रवाह धाराके द्वारा धरतीका सिञ्चन श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा कर रहे हैं, पार्षदोंके द्वारा परिवेष्टित कीर्त्तनरस-विनोदी करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन उन श्रीगौरचन्द्रको मैं प्रणाम करता हूँ॥” 207 ॥ कर रहा है ॥ 208-209 ॥ तेरहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त ॥ रथके आगे महाप्रभुके नृत्य-श्रवणसे प्रेमभक्तिकी प्राप्ति :- श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें रथके आगे नृत्य इहा येइ सुने, सेइ श्रीचैतन्य पाय। नामक तेरहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त। सुदृढ़ विश्वास-सह प्रेमभक्ति हय ॥ 208 ॥ ॥ 527