श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
तेरहवाँ अध्याय 13/139-149 ] स्मरण नहीं करते हो, वह केवल हमारा ही दुर्दैवविलास श्रीकृष्णको व्रजमें आनेके लिये कातर होकर आवेदन :- (दुर्भाग्यका खेल) है। मैं अपने दुःखको नहीं देख रही तुमि—व्रजेर जीवन, व्रजराजेर प्राणधन, हूँ, (किन्तु सत्य तो यह है कि), ब्रजेश्वरी यशोदाका तुमि—व्रजेर सकल सम्पद्। दुःख देखकर व्रजवासियोंका हृदय वास्तवमें फट जाता कृपार्द्र तोमार मन, आसि' जीयाओ व्रजजन, है। तुम व्रजवासियोंको विरहके द्वारा कभी तो मरे हुए व्रजे उदय कराओ निज-पद ॥ 147 ॥ जैसा बना देते हो, कभी मिलनके द्वारा जीवित करते अनुवाद—हे कृष्ण! तुम व्रजके जीवन हो। व्रजराज हो,—किसलिये यह दुःख सहन करनेके लिये जीवित नन्द महाराजके प्राणधन हो। तुम तो समस्त व्रजकी रखते हो, इस विषयमें कुछ नहीं कह सकती। तुम्हारा एकमात्र सम्पत्ति हो। तुम्हारा मन कृपासे द्रवीभूत रहता यह माथुर राजवेशादि धारण करना, व्रजसे पृथक् है। तुम व्रजमें आकर व्रजवासियोंको सञ्जीवित करो। स्थानपर वास और महिषियोंका सङ्ग, यह व्रजवासियोंको कृपाकर व्रजमें पदार्पण करो ॥ 147 ॥ बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता। व्रजवासियोंकी यही श्रीकृष्णकी लज्जा, व्याकुलता एवं एक विचित्र बात है कि, वे व्रजभूमिको छोड़कर अन्यत्र श्रीराधाको सान्त्वना :- नहीं जा सकते, और दूसरी ओर, तुम्हें नहीं देखनेपर शुनिया राधिका-वाणी, व्रजप्रेम मने जानि, मर भी रहे हैं, इसलिये व्रजवासियोंके लिये क्या उपाय भावे व्याकुलित देह-मन। होगा, उसे तुम ही जानते हो ॥ 139-146 ॥ व्रजलोकेर प्रेम शुनि', आपनाके 'ऋणी' मानि', अनुभाष्य— 'उद्धव-द्वारे'—भाः दशम स्कन्ध, 47वाँ करे कृष्ण ताँरे आश्वासन ॥ 148 ॥ अध्याय देखें। श्रीकृष्णका सहैतुक प्रत्युत्तर :- 'विषय'—श्रीकृष्णसे भिन्न वस्तु अथवा कार्य। 'प्राणप्रिये, शून, मोर ए सत्य-वचन। 'कुटिनाटी'—कपटता। तोमा-सबार स्मरणे, झुरों मुञि रात्रिदिने, देहस्मृति या देहमें अभिनिवेश होनेसे 'संसार' होता मोर दुःख ना जाने कोन जन ॥ 149 ॥ ध्रु ॥ है—भाः 11/2/37, 11/3/6 आदि असंख्य भागवतके अनुवाद—श्रीमती राधिकाके वचन सुनकर श्रीकृष्णके श्लोक इसके प्रमाण हैं, अधिकताके भयसे वे यहाँ मनमें व्रजवासियोंके प्रति प्रेम जाग्रत हो उठा और उद्धृत नहीं किये जा रहे हैं। गोपियों (एवं सिद्ध उनके देह तथा मन व्याकुल हो गये। अपने प्रति महाभागवत अथवा परमहंसोंकी भी) देहस्मृति नहीं होती, व्रजवासियोंके प्रेमके विषयमें सुनकर वे स्वयंको ऋणी भाः 10/29/30, 33-34, 11/30/43, 10/32/22, 11/35/19 मानने लगे। तब श्रीकृष्ण श्रीमती राधिकाको आश्वासन आदि श्लोक देखें। देते हुए कहने लगे,—हे प्राणप्रिय राधिके! मैं सत्य 'काम'—भःरःसिः पूर्व विभाग, साधनभक्ति लहरीमें वचन कह रहा हूँ। तुम सबको स्मरण करके मैं गौतमीयतन्त्र-वाक्य—आदिलीला 4/162-214 संख्या एवं रात-दिन रोता हूँ। मेरे दुःखको कोई भी नहीं मध्यलीला 8/207-218 संख्या देखें। जानता ॥ 148-49 ॥ 'तिमिङ्गिल'—बड़ी व्हेल-मछलीको भी निगलनेमें अमृतप्रवाह भाष्य— 'झुरों'—रोता रहता हूँ॥ 149 ॥ जो समर्थ है, ऐसा बहुत बड़ा जलचर जन्तु। अनुभाष्य— 'ऋणी'—आदिलीला 4/179-180 संख्या 'नेह'—ले जाओ। देखें ॥ 148 ॥ 'तार'—विरह-समुद्रका ॥ 139-142 ॥ । 519
[ 13/150–155 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीकृष्णके द्वारा व्रजवासियोंकी विशेषतः गोपियों और श्रीराधिकाकी स्तुति :— व्रजवासी यत जन, माता, पिता, सखागण, सबे हय मोर प्राणसम। ताँर मध्ये गोपीगण, साक्षात् मोर जीवन, तुमि—मोर जीवनेर जीवन ॥ 150 ॥ व्रजवासियोंसे वियोग—श्रीकृष्णके ही दुर्भाग्यका फल :— तोमा-सबार प्रेमरसे, आमाके करिल वशे, आमि तोमार अधीन केवल। तोमा-सबा छाड़ाञा, आमा दूर-देशे लञा, राखियाछे दुर्देव प्रबल ॥ 151 ॥ अनुवाद—समस्त व्रजवासी—माता, पिता, सखादि सभी मेरे प्राणोंके समान हैं। उनमें भी गोपियाँ तो साक्षात् मेरे जीवन स्वरूप हैं और तुम तो मेरे जीवनका भी जीवन हो। तुम सबके प्रेमरसने मुझे वशमें कर रखा है, मैं तो केवल तुम्हारे अधीन हूँ। मेरा प्रबल दुर्देव (दुर्भाग्य) ही तुम सबसे छुड़ाकर, मुझे दूर देशमें ले गया है ॥ 150-151 ॥ परस्परका विच्छेद मृत्युजनक होनेपर भी परस्परकी प्रीतिके लिये कान्त और कान्ताको जीवन-धारणकी इच्छा :— प्रिया प्रिय-सङ्गहीना, प्रिय प्रिया-सङ्ग बिना, नाहि जीये,—ए सत्य प्रमाण। मोर दशा शोने यबे, ताँर एइ दशा हबे, एइ भये दुँहे राखे प्राण ॥ 152 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 152 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्रियके सङ्गके बिना प्रिया स्त्री, प्रियाके सङ्गके बिना प्रिय पुरुष जीवन धारण नहीं कर सकते—यही सत्य प्रमाण है; तथापि (दोनों यही सोचकर) इसलिये जीवन धारण किये रहते हैं कि 'मेरी मृत्युको सुनकर उसकी भी मृत्यु होगी॥'152॥ विरह होनेपर भी प्रियका मङ्गल अथवा प्रीतिवाञ्छा ही यथार्थ प्रेमका परिचय :— सेइ सती—प्रेमवती, प्रेमवान् सेइ पति, वियोगे ये वाञ्छे प्रिय-हिते। ना गणे आपन-दुःख, वाञ्छे प्रियजन-सुख, सेइ दुइ मिले अचिराते ॥ 153 ॥ अनुवाद—वही सती ही प्रेमवती है तथा प्रेमवान् वही पति है, जो वियोगमें भी प्रियका हित चाहते हैं। वे अपने दुःखका विचार न करके केवल प्रियजनके सुखकी ही कामना करते हैं। ऐसे दोनों प्रेमियोंका शीघ्र ही मिलन होता है ॥ 153 ॥ श्रीराधाको प्रबोध प्रदान करनेकी छलना :— राखिते तोमार जीवन, सेवि आमि नारायण, ताँर शक्त्ये आसि निति-निति। तोमा-सने क्रीड़ा करि', पुनः याइ यदुपुरी, ताहा तुमि मानह मोर स्फूर्त्ति ॥ 154 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 154 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—तुम मेरी नित्यप्रिया हो और मेरे विरहमें तुम बचोगी नहीं—ऐसा जानकर मैं नारायणकी सेवा करते हुए उनकी विभुत्व-शक्तिके बलसे प्रतिदिन व्रजमें आकर तुम्हारे साथ क्रीड़ा करके पुनः यदुपुरी लौट जाता हूँ; इसलिये व्रजमें रहकर तुम सोचती हो कि तुम्हें मेरी स्फूर्त्ति हुई है ॥ 154 ॥ अनुभाष्य—'यदुपुरी'—द्वारकामें और मथुरामें ॥ 154 ॥ श्रीराधाप्रेमसे श्रीकृष्णका प्राकट्य :— मोर भाग्य मो-विषये, तोमार ये प्रेम हये, सेइ प्रेम—परम प्रबल। लुकाञा आमा आने, सङ्ग कराय तोमा सने, प्रकटेह आनिबे सत्वर ॥ 155 ॥ 520 ।
तेरहवाँ अध्याय 13/155-162 ] श्रीराधाको अपने व्रज-गमन-विषयमें आश्वासन-दान :- यादवेर विपक्ष, यत दुष्ट कंसपक्ष, ताहा आमि कैलुँ सब क्षय। आछे दुइ-चारि जन, ताहा मारि' वृन्दावन, आइलाम आमि, जानिह निश्चय ॥ 156 ॥ सेइ शत्रुगण हैते, व्रजजन राखिते, रहि राज्ये उदासीन हञा। येबा स्त्री-पुत्र-धने, करि राज्य-आवरणे, यदुगुणेर सन्तोष लागिया ॥ 157 ॥ 'व्रजमें आऊगाँ' कहकर श्रीराधासे श्रीकृष्णकी प्रतिज्ञा :- तोमार ये प्रेमगुण, करे आमा आकर्षण, आनिबे आमा दिन दश-विशे। पुनः आसिं वृन्दावने, व्रजबन्धु तोमा-सने, विलासिब रजनी-दिवसे ॥ '158 ॥ श्रीकृष्णोक्त श्लोक श्रवणसे श्रीराधाको विश्वास :- एत ताँरे कहिं कृष्ण, व्रजे याइते सतृष्ण, एक श्लोक पड़ि' शुनाइल। सेइ श्लोक शुनि' राधा, खण्डिल सकल बाधा, कृष्णप्राप्त्ये प्रतीति हइल ॥ 159 ॥ अनुवाद—नारायणकी कृपारूपी मेरे सौभाग्यसे मेरे प्रति तुम्हारा जो प्रेम है, वह प्रेम अति प्रबल है। वही मुझे गुप्तरूपसे व्रजमें लाकर तुम्हारे साथ मेरा सङ्ग कराता है। मुझे विश्वास है कि शीघ्र ही वह साक्षात् रूपमें भी मुझे वहाँ ले जायेगा। यादवोंके जो विपक्षी थे, कंस और उसके पक्षके जो दुष्ट राजा थे—मैंने उस सबका वध कर दिया है। अब तो केवल दो-चार दुष्ट लोग ही बचे हैं, निश्चय जानो कि उन्हें मारकर मैं वृन्दावनमें आ ही गया हूँ। उन शत्रुओंसे तुम व्रजवासियोंकी रक्षाके लिये ही मैं अपने राज्यमें रहता हूँ। परन्तु मैं उस राज्यके प्रति उदासीन हूँ। उस राज्यमें मेरे जो स्त्री-पुत्र-धन आदि हैं, उनका निर्वाह मैं केवल यादवोंकी सन्तुष्टिके लिये ही करता हूँ। तुम्हारा जो प्रेमरूपी गुण है, वही मुझे सदा वृन्दावनमें आकर्षित करता है और मुझे दस-बीस दिनोंमें व्रजमें ले जायेगा। पुनः वृन्दावनमें आकर मैं तुम्हारे और सब व्रजवधुओंके साथ रात-दिन विलास करूँगा।' श्रीराधासे इतना कहकर श्रीकृष्ण व्रजमें जानेके लिये आतुर हो गये। तब उन्होंने एक श्लोक कहा जिसे सुनकर श्रीराधाको विश्वास हो गया कि अब समस्त बाधाएँ दूर हो गयी हैं और उन्हें श्रीकृष्णप्राप्ति अवश्य होगी ॥ 155-159 ॥ अनुभाष्य—'येबा'—यद्यपि ॥ 157 ॥ गोपियोंका कृष्णप्रेम ही उनकी श्रीकृष्णप्राप्तिका कारण :- श्रीमद्भागवत (10/82/44)— मयि भक्तिर्हि भूतानाममृतत्वाय कल्पते। दिष्ट्या यदासीन्मत्स्नेहो भवतीनां मदापनः ॥ 160 ॥ अनुवाद—मेरे प्रति भक्ति ही जीवोंके लिये अमृत है। हे गोपियों! मेरे प्रति तुम्हारा जो स्नेह है, वही एकमात्र तुम लोगोंका मुझे प्राप्त करनेका कारण है ॥ 160 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/23 संख्या देखें ॥ 160 ॥ श्रीस्वरूपके साथ महाप्रभुका आस्वादन :- एइ सब अर्थ प्रभु स्वरूपेर सने। रात्रि-दिने घरे बसि' करे आस्वादने ॥ 161 ॥ अनुवाद—भागवतके श्लोकोंके इन सब भावोंका महाप्रभु श्रीस्वरूप दामोदरके साथ रात-दिन अपने वासस्थानमें बैठकर आस्वादन करते थे ॥ 161 ॥ श्रीजगन्नाथको देखकर राधाभावमें भावित महाप्रभुका श्लोक पाठ :- नृत्यकाले सेइ भावे आविष्ट हञा। श्लोक पड़ि' नाचे जगन्नाथ-मुख चाञा ॥ 162 ॥ अनुवाद—इन्हीं भावोंमें आविष्ट होकर महाप्रभु नृत्य कर रहे थे। श्रीजगन्नाथका मुख दर्शन करते हुए महाप्रभु नृत्य करते समय ये सब श्लोक पढ़ रहे थे ॥ 162 ॥ । 521
[ 13/163–172 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ग्रन्थकारके द्वारा श्रीस्वरूप दामोदरकी स्तुति :— स्वरूप-गोसाञिर भाग्य ना याय वर्णन। प्रभुते आविष्ट याँर काय, वाक्य, मन ॥ 163 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरके भाग्यका वर्णन नहीं किया जा सकता जो तन-मन और वचनसे महाप्रभुमें ही आविष्ट रहते थे॥ 163 ॥ कृष्णसेवारत महाप्रभु और श्रीस्वरूपकी इन्द्रियाँ अभिन्न :— स्वरूपेर इन्द्रिये प्रभुर निजेन्द्रियगण। आविष्ट हञा करे गान-आस्वादन ॥ 164 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरकी इन्द्रियोंमें अपनी इन्द्रियोंको आविष्ट करके महाप्रभु उनके गानका आस्वादन कर रहे थे॥ 164 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—स्वरूप दामोदर जब इन सब भावोंका गान करते हैं, तब महाप्रभुकी नेत्र-कर्ण आदि अपनी इन्द्रियाँ स्वरूपकी इन्द्रियोंमें आविष्ट होकर गानका आस्वादन करने लगती हैं, अर्थात् दोनोंका एकचित्तता (चित्तका एक समान होना) और एकतानता (एक ही वस्तुके प्रति आकर्षित होना) सर्वोत्तम रूपसे उदित होता है॥ 164 ॥ कान्तकी उदासीनताके कारण मलिन-मुखवाली मानिनी श्रीराधाके भावोंमें आविष्ट महाप्रभु :— भावेर आवेशे कभु भूमिते बसिया। तर्जनीते भूमे लिखे अधोमुख हञा ॥ 165 ॥ अनुवाद—भावाविष्ट होकर महाप्रभु कभी भूमिपर बैठ जाते और नीचेकी ओर मुख करके अपनी तर्जनी अङ्गुलीके द्वारा भूमिपर कुछ लिखने लगते॥ 165 ॥ महाप्रभुकी अङ्गुलीमें चोट लगनेके भयसे श्रीस्वरूपकी सतर्कता :— अङ्गुलिते क्षत हबे जानि' दामोदर। भये निज-करे निवारये प्रभु-कर ॥ 166 ॥ अनुवाद—यह जानते हुए कि भूमिपर लिखनेसे महाप्रभुकी अङ्गुलीमें घाव हो जायेगा, श्रीस्वरूप दामोदरने अपने हाथोंसे उनको रोक दिया॥ 166 ॥ अनुभाष्य—'दामोदर'—श्रीस्वरूप॥ 166 ॥ श्रीस्वरूपके कीर्तनसे महाप्रभुके हृदयमें राधाभावके वैचित्य मूर्तिमान :— प्रभुर भावानुरूप स्वरूपेर गान। यबे येइ रस, ताहा करे मूर्त्तिमान ॥ 167 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके भावोंके अनुरूप ही श्रीस्वरूप दामोदर गान करते थे। जिस समय महाप्रभु जिस रसका आस्वादन करते थे, उसी समय उसके अनुरूप गान करके श्रीस्वरूप दामोदर उस रसको मूर्तिमान कर देते थे॥ 167 ॥ श्रीजगन्नाथके श्रीरूपका वर्णन :— श्रीजगन्नाथेर देखे श्रीमुख-कमल। ताहार उपर सुन्दर नयनयुगल ॥ 168 ॥ सूर्य्येर किरणे मुख करे झलमल। माल्य, वस्त्र, दिव्य, अलङ्कार, परिमल ॥ 169 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीजगन्नाथके मुखकमल और उसके ऊपर शोभायमान सुन्दर नेत्रोंको देखा। उनके श्रीअङ्गोंपर माला, वस्त्र और दिव्य अलङ्कार थे। सूर्यकी किरणोंसे श्रीजगन्नाथका मुखकमल झलमल कर रहा था और सारा वातावरण सुन्धित हो रहा था॥ 168-169 ॥ अनुभाष्य—'परिमल'—सुगन्ध॥ 169 ॥ महाप्रभुका दिव्य-उन्माद :— प्रभुर हृदये आनन्दसिन्धु उथलिल। उन्माद, झञ्झा-वात ततक्षणे उठिल ॥ 170 ॥ आनन्दोन्मादे उठाय भावेर तरङ्ग। नाना-भाव-सैन्ये उपजिल युद्ध-रङ्ग ॥ 171 ॥ भावोदय, भावशान्ति, सन्धि, शाबल्य। सञ्चारी, सात्त्विक, स्थायी स्वभाव-प्राबल्य ॥ 172 ॥ 522 ।
तेरहवाँ अध्याय 13/170-179 ] अनुवाद—महाप्रभुके हृदयमें आनन्दके सागरकी लहरें उठने लगीं और उसमें उसी समय उन्मादकी तीव्रताने तूफानका रूप ले लिया। आनन्दके उन्मादमें अनेक भावोंकी तरङ्ग उठने लगीं और उन भावोंमें विरोधी सेनाओं जैसा युद्ध होने लगा। महाप्रभुमें कभी भाव उदय होते और अत्यधिक रूपमें प्रकट होकर कभी शान्त हो जाते, तो कभी अनेक भावोंकी सन्धि होती और कभी एक भाव दूसरोंको दबाकर प्रबल होनेसे भाव-शाबल्य होता। इस प्रकार सञ्चारी, सात्त्विक और स्थायी भावोंने महाप्रभुके शरीरपर अत्यधिक प्रबलता धारण की ॥ 170-172 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'झञ्झावात'—बीच-बीचमें आनेवाली तेज हवा। 'भावोदय', 'भावशान्ति', 'सन्धि', 'शाबल्य'—भावोदय, भावशान्ति, भावसन्धि, भावशाबल्य ॥ 170-172 ॥ अनुभाष्य—'उन्माद'—मध्यलीला 2/66 संख्या देखें। भाव-सन्धि, भाव-शाबल्य आदिके लिये मध्यलीला 2/63 संख्या देखें ॥ 170-172 ॥ स्वर्णगिरिके साथ महाप्रभुकी देह और पुष्पवृक्षके साथ सात्त्विक भावोंकी उपमा :- प्रभुर शरीर येन शुद्ध-हेमाचल। भाव-पुष्पद्रुम ताहे पुष्पित सकल ॥ 173 ॥ महाप्रभुके प्रेम-दर्शनसे सभी श्रीकृष्णप्रेममें उन्मत्त :- देखिते आकर्षये सबार चित्त-मन। प्रेमामृतवृष्ट्ये प्रभु सिञ्चे सबार मन ॥ 174 ॥ जगन्नाथ-सेवक यत राजपात्रगण। यात्रिक लोक, नीलाचलवासी यत जन ॥ 175 ॥ प्रभुर नृत्य प्रेम देखि' हय चमत्कार। कृष्णप्रेम उपजिल हृदये सबार ॥ 176 ॥ अनुवाद—महाप्रभुका शरीर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह शुद्ध-स्वर्णका पर्वत था और उसपर भावरूपी पुष्पोंके वृक्ष सब पुष्पित हो रहे थे। इस प्रकार महाप्रभुके भावोंको देखकर सभीके चित्त और मन आकर्षित हो रहे थे। महाप्रभुने श्रीकृष्णप्रेमके अमृतकी वर्षा करके श्रीजगन्नाथके सेवक, राजकर्मचारी, यात्रीगण और सभी नीलाचलवासी आदि जितने भी लोग वहाँ उपस्थित थे, सभीके हृदयोंका सिञ्चन किया। महाप्रभुके नृत्य और प्रेमको देखकर सभीके मन चमत्कृत हुए और उनके दर्शनसे सभीके हृदयमें श्रीकृष्णप्रेम उदित हो गया ॥ 173-176 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 2/81-82 संख्या देखें ॥ 174-176 ॥ सभीका प्रेम-कलरव :- प्रेमे नाचे, गाय, लोक, करे कोलाहल। प्रभु-नृत्ये कैल यात्री चौगुण-मङ्गल ॥ 177 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णप्रेममें मत्त होकर सभी लोग नृत्य-गान करते हुए कोलाहल कर रहे थे। महाप्रभुके नृत्यसे यात्रियोंकी मङ्गलध्वनि चौगुनी हो गयी ॥ 177 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'चौगुण मङ्गल'—चार गुणा मङ्गलध्वनि ॥ 177 ॥ श्रीकृष्ण-बलरामके द्वारा भी महाप्रभुके नृत्यका दर्शन :- अन्येर कि काय, जगन्नाथ-हलधर। प्रभुर नृत्य देखि' सुखे चलिला मन्थर ॥ 178 ॥ दोनोंके द्वारा महाप्रभुके नृत्यको देखकर चलना स्थगित करना :- कभु सुखे नृत्यरङ्ग देखे रथ राखि'। से कौतुक ये देखिल, सेइ तार साक्षी ॥ 179 ॥ अनुवाद—अन्य लोगोंकी तो बात ही क्या, स्वयं श्रीजगन्नाथ और श्रीबलदेव भी महाप्रभुके नृत्यको देखनेके लिये धीरे-धीरे चलने लगे और कभी-कभी अपने रथको रोककर आनन्दसे महाप्रभुके नृत्यको देखते। इस कौतुकको जिसने देखा, वही उसका साक्षी है॥ 178-179 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मन्थर'—धीरे-धीरे ॥ 178 ॥ । 523
[ 13/180-190 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला नृत्य करते हुए महाप्रभुका राजाके आगे गिरने लगना :- एइमत नृत्य प्रभु करिते भ्रमिते। प्रतापरुद्रेर आगे लागिला पड़िते॥180॥ राजाके द्वारा महाप्रभुको पकड़ना, महाप्रभुकी बाह्यदशा :- सम्भ्रमे प्रतापरुद्र प्रभुरे धरिल। ताँहाके देखिते प्रभुर बाह्य हइल॥181॥ बाह्यदशामें लोकशिक्षक जगद्गुरु आचार्यलीलाकारी महाप्रभुका राजाके स्पर्श करनेसे स्वयंको धिक्कार :- राजा देखि' महाप्रभु करेन धिक्कार। “छि, छि, विषयीर स्पर्श हइल आमार॥”182॥ अनुवाद—महाप्रभु जब इस प्रकार नृत्य और भ्रमण कर रहे थे, तब वे राजा प्रतापरुद्रके आगे गिरने लगे। राजा प्रतापरुद्रने महाप्रभुको गिरते हुए देखकर उन्हें आदरपूर्वक पकड़ लिया, परन्तु राजाको देखते ही महाप्रभुको बाहरी ज्ञान हो आया। राजाको देखते ही महाप्रभु अपनेको धिक्कारते हुए कहने लगे,—“छि, छि, मुझे एक विषयीका स्पर्श हो गया है॥”180-182॥ आवेशेते नित्यानन्द हैला असावधान। काशीश्वर-गोविन्दादि छिला अन्यस्थान॥183॥ अनुवाद—उस समय श्रीनित्यानन्द प्रभु भी भावमें आविष्ट होनेके कारण असावधान हो गये थे और श्रीकाशीश्वर एवं श्रीगोविन्दादि महाप्रभुके सेवक भी किसी अन्य स्थानपर थे॥183॥ राजाकी दैन्यमयी श्रीकृष्णसेवा-दर्शनसे हृदयमें सन्तोष, भक्तिसाधकके हितके लिये बाहरसे रोषाभास :- यद्यपि राजारे देखि' हाड़िर सेवने। प्रसन्न हञाछे ताँरे मिलिबारे मने॥184॥ तथापि आपन-गणे करिते सावधान। बाह्य किछु रोषाभास कैला भगवान् ॥185॥ अनुवाद—यद्यपि राजाको श्रीजगन्नाथके झाडूदारका कार्य करते देखकर महाप्रभु प्रसन्न हुए थे और राजासे मिलना भी चाहते थे, तथापि अपने परिकरोंको सावधान करनेके लिये भगवान्ने बाहरसे कुछ क्रोधका आभास दिखलाया॥184-185॥ अनुभाष्य— 'हाड़िर सेवन'—रास्तेमें झाडूदारका कार्य; मध्यलीला 13/15-18 संख्या देखें। 'आपन-गण'—भवसागरसे पार जानेके इच्छुक, निष्किञ्चन, भगवद्-भजनोन्मुख अर्थात् प्रेमकी भूमिकामें आरूढ़ होनेके इच्छुककी लीला करनेवाले भक्तगण॥184-185॥ महाप्रभुके वाक्यको सुनकर राजाको भय, श्रीसार्वभौमका आश्वासन :- प्रभुर वचने राजार मने हैल भय। सार्वभौम कहे,—“तुमि ना कर संशय॥186॥ तोमार उपरे प्रभुर सुप्रसन्न मन। तोमा लक्ष्य करि' शिखायेन निजगण॥187॥ अवसर जानि' आमि करिब निवेदन। सेइकाले याइ' करिह प्रभुर मिलन॥”188॥ अनुवाद—महाप्रभुके वचन सुनकर राजाके मनमें भय उत्पन्न हुआ, परन्तु श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने राजाको सान्त्वना देते हुए कहा,—“आप किसी भी प्रकारका संशय मत करें। महाप्रभु आपपर बहुत प्रसन्न हैं। आपको लक्ष्य करके वे अपने परिकरोंको शिक्षा देना चाहते हैं। उचित समय आनेपर मैं आपके विषयमें निवेदन करूँगा, तब आपको महाप्रभुसे मिलना सहज हो जायेगा॥”186-188॥ स्वयं महाप्रभुके द्वारा रथ-सञ्चालन :- तबे महाप्रभु रथ प्रदक्षिण करिया। रथ-पाछे याइ' ठेले रथे माथा दिया॥189॥ रथके चलते हुए देखकर लोगोंके द्वारा हरिध्वनि :- ठेलितेइ चलिल रथ 'हड़' 'हड़' करि'। चतुर्दिके लोक सबे बले 'हरि' 'हरि'॥190॥ 524 ।
तेरहवाँ अध्याय 13/189-200 ] अनुवाद—तब महाप्रभुने रथकी परिक्रमा की और रथके पीछे जाकर रथको अपने माथेसे ठेलने लगे। रथको ठेलते ही रथ 'हड़' 'हड़' शब्द करता हुआ आगे चलने लगा। चारों ओरसे सभी लोग 'हरि' 'हरि' बोलने लगे॥ 189-190 ॥ सुभद्रा-बलरामके रथके आगे सगण महाप्रभुका नृत्य :— तबे प्रभु निज-भक्तगण लञा सङ्गे। बलदेव-सुभद्राग्रे नृत्य करे रङ्गे ॥ 191 ॥ उसके बाद श्रीजगन्नाथके रथके आगे नृत्य :— ताँहा नृत्य करि' जगन्नाथाग्रे आइला। जगन्नाथ-आगे नृत्य करिते लागिला ॥ 192 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभु अपने भक्तोंको साथ लेकर श्रीबलदेव एवं श्रीसुभद्राके रथोंके आगे आनन्दसे नृत्य करने लगे। कुछ देर वहाँ नृत्य करनेके बाद महाप्रभु श्रीजगन्नाथके सामने आये। तब श्रीजगन्नाथके रथके आगे नृत्य करने लगे॥ 191-192 ॥ बलगाण्डिपर रथका रुकना :— चलिया आइल रथ 'बलगाण्डि'-स्थाने। जगन्नाथ राखि' देखे डाहिने-वामे ॥ 193 ॥ वामे—'विप्रशासन', नारिकेल-वन। डाहिने त' पुष्पोद्यान येन वृन्दावन ॥ 194 ॥ आगे नृत्य करे गौर लञा भक्तगण। रथ राखि' जगन्नाथ करेन दरशन ॥ 195 ॥ अनुवाद—रथ चलते-चलते बलगाण्डि नामक स्थानपर पहुँच गया। वहाँ रथको रोककर श्रीजगन्नाथ दायें-बायें देखने लगे। बाईं ओर ब्राह्मणोंकी बस्ती और नारियलके वृक्षोंका वन था और दायीं और वृन्दावन जैसा सुन्दर पुष्पोंका उद्यान था। रथके आगे महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ नृत्य कर रहे थे और श्रीजगन्नाथ रथको रोककर नृत्यका दर्शन करने लगे॥ 193-195 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'बलगाण्डि'-स्थाने—श्रद्धाबालु और अर्द्धासनी देवीके बीचमें जो स्थान है, उसका नाम 'बलगाण्डि' है॥ 193॥ अनुभाष्य—उड़ीसामें ब्राह्मणोंकी बस्तीको 'विप्रशासन' कहते हैं॥ 194॥ श्रीजगन्नाथके द्वारा उत्तम भोगोंका आस्वादन :— सेइ स्थले भोग लागे, आछये नियम। कोटि भोग जगन्नाथ करे आस्वादन ॥ 196 ॥ जगन्नाथेर छोट-बड़ यत भक्तगण। निज निज उत्तम-भोग करे समर्पण ॥ 197 ॥ अनुवाद—उस स्थानपर श्रीजगन्नाथको भोग लगता है, ऐसा नियम है। वहाँ असंख्य भोग श्रीजगन्नाथको अर्पित किये गये और उन्होंने सभीका आस्वादन किया। श्रीजगन्नाथके कनिष्ठसे उत्तम जितने भी भक्त हैं, सभीने अपने लाये हुए उत्तम भोग समर्पित किये॥ 196-197 ॥ छोटे-बड़े, प्रजा-राजा सभीके द्वारा भोग समर्पण :— राजा, राजमहिषीवृन्द, पात्र, मित्रगण। नीलाचलवासी यत छोट-बड़ जन ॥ 198 ॥ नाना-देशेर देशी यत यात्रिक जन। निज-निज-भोग ताँहा करे समर्पण ॥ 199 ॥ आगे-पाछे, दुइ पार्श्वे उद्यानेर-वने। येइ याहा पाय, लागाय,—नाहिक नियमे ॥ 200 ॥ अनुवाद—उस स्थानपर स्वयं राजा और उनकी महिषियाँ, राजमन्त्री, राजाके मित्रों एवं नीलाचलवासी सभी छोटे-बड़े लोगों तथा अनेक देशोंसे आये जितने भी यात्री थे, अपना-अपना भोग लाकर उन्होंने श्रीजगन्नाथको वहाँ समर्पित किया। रथके आगे-पीछे, दोनों ओर उद्यानोंमें, जिसे जहाँ स्थान मिला, उसने वहींसे श्रीजगन्नाथको भोग लगाया, वहाँ किसी विशेष स्थानसे भोग लगानेका नियम नहीं है॥ 198-200॥ । 525
[ 13/201-207 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भोगके समय लोगोंका एकत्रित होना, विश्राम करनेके लिये महाप्रभुका निकटस्थ उद्यानमें जाना :- भोगेर समय लोकेर महा भीड़ हैल। नृत्य छाड़ि' महाप्रभु उपवने गेल॥ 201॥ प्रेमावेशे महाप्रभु उपवन पाञा। पुष्पोद्याने गृहपिण्डाय रहिला पड़िया॥ 202॥ शीतल वायुसे परिश्रम दूर होना :- नृत्य-परिश्रमे प्रभुर देहे घन घर्म। सुगन्धि शीतल-वायु करेन सेवन॥ 203॥ अनुवाद—भोगके समय वहाँ लोगोंकी बहुत भीड़ हो गयी, इसलिये महाप्रभु नृत्य छोड़कर उपवनमें चले गये। प्रेमावेशमें महाप्रभु उपवनमें जाकर एक पुष्प-उद्यानमें एक चबूतरेके ऊपर लेट गये। नृत्यके परिश्रमसे महाप्रभुका शरीर पसीनेसे तर-बतर हो गया था। इसलिये महाप्रभु उस उपवनमें प्रवाहित हो रही सुगन्धित, शीतल वायुका आनन्द लेने लगे॥ 201-203॥ कीर्त्तनकारियोंका वृक्षोंके नीचे विश्राम :- यत भक्त कीर्त्तनीया आसिया आराम। प्रतिवृक्षतले सबे करेन विश्राम॥ 204॥ अनुवाद—जितने भी भक्त सङ्कीर्त्तन कर रहे थे, वे सब उस उपवनमें आकर प्रत्येक वृक्षके नीचे विश्राम करने लगे॥ 204॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आराम'—उद्यानमें (उपवन, वृक्षवाटिका, बागान)॥ 204॥ महाप्रभुका इस प्रकार महासङ्कीर्त्तन :- एइ त' कहिल प्रभुर महासङ्कीर्त्तन। जगन्नाथेर आगे यैछे करिल नर्त्तन॥ 205॥ श्रीरूप गोस्वामीके चैतन्याष्टकमें रथके आगे महाप्रभुके नृत्यका वर्णन :- रथाग्रेते प्रभु यैछे करिला नर्त्तन। श्रीचैतन्याष्टके रूप-गोसाञि करयाछे वर्णन॥ 206॥ अनुवाद—(ग्रन्थकार कह रहे हैं)—यहाँ तक मैंने महाप्रभुके महासङ्कीर्त्तनका और जैसे उन्होंने श्रीजगन्नाथके रथके आगे नृत्य किया, उसका वर्णन किया है। श्रीरूप गोस्वामीने स्वरचित श्रीचैतन्याष्टकमें श्रीजगन्नाथके रथके आगे महाप्रभुने जिस प्रकारसे नृत्य किया था, उसका वर्णन किया है॥ 205-206॥ स्तवमालामें प्रथम चैतन्याष्टक (7) श्लोकमें श्रीरूप गोस्वामी-वाक्य :- रथारूढस्यारादधिपदवि नीलाचलपते- रदभ्रप्रेमोर्मिस्फुरितनटनोल्लासविवशः। सहर्षं गायद्भिः परिवृत-तनुर्वैष्णवजनैः स चैतन्यः किं मे पुनरपि दृशोर्यास्यति पदम् ॥ 207॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 207॥ अमृतप्रवाह भाष्य—रथपर आरूढ़ नीलाचलपतिके सम्मुख अधिक प्रेमकी लहरोंसे स्फुरित नाट्योल्लाससे विवश होकर आनन्दके सहित सङ्कीर्त्तनकारी एवं वैष्णवोंके द्वारा जो आवृत (घिरे हुए) हैं, वे श्रीचैतन्यदेव क्या पुनः मेरे दृष्टिपथ पर आयेंगे?॥ 207॥ तेरहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य—श्रीरूप गोस्वामीने तीन 'श्रीचैतन्याष्टकों'की रचना की है, उनमेंसे प्रथम अष्टकका सातवाँ श्लोक— रथारूढ़स्य (रथोपरि स्थितस्य) नीलाचलपतेः (जगन्नाथ- देवस्य) आरात् (समीपे) अधिपदवि (प्रधानपथे) अदभ्र- प्रेमोर्मिस्फुरित-नटनोल्लासविवशः (अदभ्रेण अधिकेन प्रेमोर्मिणा प्रेमतरङ्गेण स्फुरितः प्रतिबिम्बितः यः नटनोल्लासः नर्त्तन- विलास-हर्षः, तेन विवशः श्रम-विह्वलः) सहर्षं (सानन्दं) गायद्भिः (कीर्त्तनपरैः) वैष्णव-जनैः (भक्तवृन्दैः) परिवृतः-तनुः (वेष्टितविग्रहः एवम्भूतः) सः चैतन्यः (गौरचन्द्रः) पुनरपि किं मे (मम) दृशोः पदं (नयनपथं) यास्यति (प्राप्स्यति)? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। श्रील प्रबोधानन्द सरस्वती त्रिदण्डिपादने स्वकृत 'श्रीराधारससुधानिधि'में भी— “निन्दन्तं पुलकोत्करेण विकसत्प्रप्रसूनच्छविं प्रोद्धींकृत्य 526 ।
तेरहवाँ अध्याय 13/207-209 ] भुजद्वयं हरि-हरीत्युच्चैर्वदन्तं मुहुः। नृत्यन्तं द्रुतमश्रुनिर्झरचयैः श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। सिञ्चन्तमुर्वीतलं गायद्भिर्निजपार्षदैः परिवृतं श्रीगौरचन्द्रं स्तुमः ॥ ” चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 209 ॥ अर्थात् “जो सात्त्विक भावोंसे उदित पुलकादि इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे रथाग्रे नर्त्तनं समूहके द्वारा परिशोभित श्रीअङ्गशोभाके द्वारा विकसित नाम त्रयोदश-परिच्छेदः। कदम्ब-पुष्पकी शोभाको भी निन्दित कर रहे हैं, अनुवाद—श्रीजगन्नाथके रथके आगे महाप्रभुके नृत्यकी सुविशाल दोनों भुजाओंको ऊपर उठाकर उच्च स्वरसे लीलाको जो व्यक्ति सुनेगा, उसे महाप्रभुकी प्राप्ति होगी बार बार 'हरि-हरि' बोल रहे हैं, चञ्चल चरणोंसे नृत्य और सुदृढ़ विश्वासके साथ प्रेमाभक्ति प्राप्त होगी। करते-करते अश्रु-प्रवाह धाराके द्वारा धरतीका सिञ्चन श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा कर रहे हैं, पार्षदोंके द्वारा परिवेष्टित कीर्त्तनरस-विनोदी करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन उन श्रीगौरचन्द्रको मैं प्रणाम करता हूँ॥” 207 ॥ कर रहा है ॥ 208-209 ॥ तेरहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त ॥ रथके आगे महाप्रभुके नृत्य-श्रवणसे प्रेमभक्तिकी प्राप्ति :- श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें रथके आगे नृत्य इहा येइ सुने, सेइ श्रीचैतन्य पाय। नामक तेरहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त। सुदृढ़ विश्वास-सह प्रेमभक्ति हय ॥ 208 ॥ ॥ 527
This page is blank and contains no text to transcribe.
चौदहवाँ अध्याय कथासार—बलगाण्डि-उद्यानमें महाप्रभु प्रेमावेशमें थे, तब राजा प्रतापरुद्रदेव अकेले वैष्णव वेश धारण करके वहाँ आये और भागवतके श्लोकोंका पाठ करते-करते महाप्रभुके चरणोंको दबाने लगे। प्रेमावेशमें महाप्रभुने उनका आलिङ्गन करके कृपा की। भक्तोंके साथ महाप्रभुने बलगाण्डि-भोगके प्रसादकी सेवा की। उसके बाद रथके न चलनेपर, राजाने अनेक मतवाले हाथियोंको लगाया, परन्तु वे भी रथको नहीं चला पाये। तब महाप्रभुने स्वयं अपने सिरसे रथको धकेलकर उसे चलाया और फिर भक्तगण उस समय रस्सी खींचने लगे। गुण्डिचाके निकट आइटोटामें महाप्रभुका विश्राम स्थान हुआ। श्रीजगन्नाथके सुन्दराचलमें वास करनेपर महाप्रभुको वृन्दावनकी लीलाओंकी स्फूर्ति हो आई। इन्द्रद्युम्न सरोवरमें महाप्रभुकी अपने भक्तों सहित जल-क्रीड़ा हुई। नवरात्र-यात्रामें महाप्रभु जगन्नाथ-वल्लभ उद्यानमें रहे और पञ्चमीके दिन 'हेरा-पञ्चमी' लीलाके दर्शनमें (महाप्रभुका श्रीस्वरूप दामोदरके साथ) लक्ष्मी और गोपियोंके स्वभावको लेकर अनेक वार्तालाप हुआ था। श्रीस्वरूपके मुखसे राधिकाके भावोंकी सर्वोत्कर्षताके विषयमें सुनकर महाप्रभुको परमानन्द हुआ। पुनर्यात्राके समय कीर्त्तनादि होनेके बाद कुलीनग्रामवासी श्रीराम force वसु और सत्यराज खाँको प्रत्येक वर्ष (श्रीजगन्नाथके रथके लिये) रेशमी डोरी' लानेके लिये श्रीमन्महाप्रभुने आज्ञा दी। —(अमृतप्रवाह भाष्य) 'हेरा-पञ्चमी'के दर्शनमें नृत्य करते हुए श्रीगौरसुन्दर :— गौरः पश्यन्नात्मवृन्दैः श्रीलक्ष्मीविजयोत्सवम्। श्रुत्वा गोपीरसोल्लासं हृष्टः प्रेम्णा ननर्त्त सः॥1॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अपने भक्तों सहित लक्ष्मीदेवीके विजयोत्सवका दर्शन करके और गोपियोंका रासोल्लास श्रवण करके प्रसन्नचित्त होकर श्रीगौरचन्द्रने नृत्य किया था॥1॥ अनुभाष्य— सः गौरः आत्मवृन्दैः (स्वपार्षदगणैः) श्रीलक्ष्मी-विजयोत्सवं पश्यन् गोपीरसोल्लासं (गोपीनां पारकीयरसातिशयं) श्रुत्वा हृष्टः सन् प्रेम्णा (परमया प्रीतया) ननर्त्त। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ जय जय गौरचन्द्र श्रीकृष्णचैतन्य। जय जय नित्यानन्द जयाद्वैत धन्य॥2॥ जय जय श्रीवासादि गौड़ेर भक्तगण। जय श्रोतागण,—याँर गौर प्राणधन॥3॥ अनुवाद—श्रीगौरचन्द्र श्रीकृष्णचैतन्यकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो और धन्य श्रीअद्वैताचार्य प्रभुकी जय हो। श्रीवासादि गौड़-भक्तोंकी जय हो, जय हो तथा ग्रन्थके श्रोताओंकी जय हो, श्रीगौरचन्द्र जिनके प्राणधन हैं॥2-3॥ महाप्रभुके विश्रामके समय राजाका प्रवेश :— एइमत प्रभु आछेन प्रेमेर आवेशे। हेनकाले प्रतापरुद्र करिल प्रवेशे॥4॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु प्रेमके आवेशमें जब विश्राम कर रहे थे, उस समय राजा प्रतापरुद्रने पुष्पोद्यानमें प्रवेश किया॥4॥ । 529
[ 14/5-13 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला दीन वैष्णव-वेशमें सभी वैष्णवोंकी आज्ञा लेकर बन्द नेत्रोंसे महाप्रभुका पाद-सम्वहन :- सार्वभौम-उपदेशे छाड़ि' राजवेश। एकला वैष्णव-वेशे करिल प्रवेश॥5॥ सब-भक्तेर आज्ञा निल जोड़-हात हञा। प्रभु-पद धरि' पड़े साहस करिया॥6॥ आँखि मुदि' प्रेमे प्रभु भूमिते शयान। नृपति नैपुण्ये करे पाद-सम्वहान॥7॥ राजाके द्वारा गोपीगीतका पाठ :- रासलीलार श्लोक पड़ि' करेन स्तवन। “जयति तेऽधिकं” अध्याय करेन पठन॥8॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौमके उपदेशानुसार राजा प्रतापरुद्रने राजवेशको छोड़कर वैष्णववेशमें अकेले पुष्पोद्यानमें प्रवेश किया। राजाने पहले सभी भक्तोंसे हाथ जोड़कर आज्ञा ली। तब राजाने बहुत साहस करके महाप्रभुके श्रीचरणोंको पकड़ लिया। महाप्रभु प्रेमावेशमें आँखें मूँदकर भूमिपर लेटे हुए थे और राजा बड़ी निपुणतासे उनके चरणोंको दबाने लगे तथा साथ ही श्रीमद्भागवतमें वर्णित रासलीलाके श्लोकोंका पाठ करने लगे। उन्होंने “जयति तेऽधिकं” श्लोकसे आरम्भ होनेवाले अध्यायका पाठ आरम्भ किया॥5-8॥ अमृतप्रवाह भाष्य-“जयति तेऽधिकं” अध्याय- रासपञ्चध्यायके बीचमें “गोपीगीत”-दशम स्कन्धमें 31वाँ अध्याय॥8॥ महाप्रभुका सन्तोष और सुननेका आग्रह :- शुनिते शुनिते प्रभुर सन्तोष अपार। 'बल, बल' बलि' प्रभु बले बार बार॥9॥ प्रेमाविष्ट महाप्रभुका राजाको आलिङ्गन :- 'तब कथामृतं' श्लोक राजा ये पड़िल। उठि' प्रभु प्रेमावेशे आलिङ्गन कैल॥10॥ स्वयंको प्रचुर लाभान्वित जानकर राजाके प्रति कृतज्ञता :- “तुमि मोरे दिले बहु अमूल्य रतन। मोर किछु दिते नाहि, दिलुँ आलिङ्गन॥”11॥ अनुवाद-सुनते-सुनते महाप्रभुको अपार सन्तोष हुआ और वे बार-बार 'बोलो बोलो' कहने लगे। जैसे ही राजा प्रतापरुद्रने 'तव कथामृतं' श्लोक पढ़ा, तभी महाप्रभुने उठकर प्रेमावेशमें उनका आलिङ्गन किया और कहा,-“तुमने मुझे बहुत अमूल्य रत्न दिये हैं, परन्तु इसके बदलेमें मेरे पास तुम्हें देनेके लिये कुछ नहीं है, इसलिये मैं तुम्हें आलिङ्गन ही दे सकता हूँ॥”9-11॥ दोनोंमें अश्रु और कम्प :- एत बलि' सेइ श्लोक पड़े बार बार। दुइजनार अङ्गे कम्प, नेत्रे जलधार॥12॥ अनुवाद-इतना कहकर महाप्रभु उस श्लोकको बार-बार पढ़ने लगे। महाप्रभु और राजा प्रतापरुद्र, दोनोंके अङ्ग काँपने लगे तथा उनके नेत्रोंसे अश्रुओंकी धारा बहने लगी॥12॥ भगवत्कथामृत वितरण करनेवाला ही सर्वश्रेष्ठ दाता :- (श्रीमद्भागवत 10/31/9)- तव कथामृतं तप्तजीवनं, कविभिरीड़ितं कल्मषापहम्। श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः॥13॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥13॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे प्रिय, बहुत जन्मोंमें बहु-सुकृतिकारी व्यक्ति जगत्में आकर, तुम्हारे प्रेममें सन्तप्त व्यक्तियोंके जीवन-स्वरूप, कवियोंके सङ्गीत, कल्मषका नाश करनेवाले, श्रवणमात्रसे मङ्गल करनेवाले, सर्वोत्कृष्ट, सर्वव्यापक तुम्हारे कथामृतका गान करते हैं॥13॥ 530 ।
चौदहवाँ अध्याय [14/13-20 ] अनुभाष्य— रासक्रीड़ाके समय श्रीकृष्णके अचानक अन्तर्धान होनेपर कृष्णैकप्राणा (कृष्णमयी) गोपियाँ श्रीकृष्णके विरहमें अत्यन्त कातर होकर तन्मय चित्तसे रासक्रीड़ा-स्थलसे यमुनाके तटपर आकर इन सब गीतोंके द्वारा श्रीकृष्णका विविध गुणगान कर रही हैं— ये जनाः भुवि (संसारे) तप्तजीवनं (विरहतापक्लिष्टानां प्राणस्वरूपं) कविभिः (कृष्णरसविद्भिः) ईड़ितम् (आराधितं) कल्मषापहं (विरहज्वरदुःखविनाशकं) श्रवणमङ्गलं (कर्णरसायनं) श्रीमत् (सर्वशक्तिसमन्वितं) तव (हरेः) कथामृतं (सुधात्मकां कथाम्) आततं (विस्तृतं) गृणन्ति (कीर्त्तयन्ति), [ते एव जनाः] भूरिदाः (वदान्यवराः)। श्लोक-भावानुवाद— जो लोग संसारमें तुम्हारे विरहमें सन्तप्त व्यक्तियोंके जीवन-स्वरूप, कृष्णरसविद्-जनोंके द्वारा आराधित, विरहज्वरदुःखविनाशक, कर्णरसायन, सर्वशक्तियुक्त तुम्हारे कथामृतका सर्वत्र कीर्तन करते हैं, वे लोग ही श्रेष्ठ वदान्य (दाता) हैं॥13॥ अनजानेमें राजाका आलिङ्गन :- ‘भूरिदा’ ‘भूरिदा’ बलि’ करे आलिङ्गन। इँहो नाहि जाने, — इँहो हय कोन जन॥14॥ अनुवाद— महाप्रभु राजा प्रतापरुद्रको ‘भूरिदा’ ‘भूरिदा’ अर्थात् दानियोंमें सर्वोत्तम कहकर उनका आलिङ्गन करने लगे, परन्तु वे यह नहीं जानते थे कि ये कौन हैं॥14॥ अनुभाष्य— पहलेवाले ‘इँहॉ’—शब्दसे महाप्रभुको तथा बादवाले ‘इँहौ’—शब्दसे राजा प्रतापरुद्रको समझना चाहिए॥14॥ राजाकी पूर्व-सेवाको देखनेसे महाप्रभुकी कृपा :- पूर्व-सेवा देखि’ ताँरे कृपा उपजिल। अनुसन्धान बिना कृपा-प्रसाद करिल॥15॥ चैतन्यकी कृपामें अधिकार-विचार अथवा कारण नहीं :- एइ देख, चैतन्येर कृपा-महाबल। तार अनुसन्धान बिना कराय सफल॥16॥ अनुवाद— राजा प्रतापरुद्रकी (श्रीजगन्नाथके रथके आगे झाडू लगानेकी) पूर्व-सेवाको देखकर महाप्रभुकी उनके प्रति कृपा उत्पन्न हुई थी। इसलिये अब बिना पूछे कि वे कौन हैं, उन्होंने राजाको कृपा-प्रसाद प्रदान किया। महाप्रभुकी कृपाका महाबल देखो, राजाके बारेमें बिना पूछे ही उनका जीवन सफल कर दिया॥15-16॥ प्रेमावेशमें राजाके परिचयकी जिज्ञासा :- प्रभु बोले,—“के तुमि, करिला मोर हित? आचम्बिते आसिं’ पियाउ कृष्णलीलामृत?” 17॥ राजाका ‘कृष्णदासानुदास’ कहकर अपना परिचय देना :- राजा कहे,—“आमि तोमार दासेर दास। भृत्येरे भृत्य कर, — एइ मोर आश॥” 18॥ अनुवाद— अन्तमें महाप्रभुने पूछा, —“तुम कौन हो जो मेरा इतना हित कर रहे हो? अचानक आकर मुझे कृष्णलीलामृतका पान करा रहे हो?” राजा प्रतापरुद्रने कहा— “मैं आपके दासोंका दास हूँ। मेरी यही अभिलाषा है कि आप मुझे अपने दासोंके दासरूपमें स्वीकार कीजिये॥” 17-18॥ महाप्रभुके द्वारा राजाको अपना ऐश्वर्य दिखाना :- तबे महाप्रभु ताँरे ऐश्वर्य देखाइल। ‘कारेह ना कहिबे’ एइ निषेध करिल॥19॥ अनुवाद— तब महाप्रभुने राजाको अपना कुछ ऐश्वर्य दिखलाया और ‘इसे किसीसे मत कहना’ कहकर उन्हें निषेध किया॥19॥ सर्वान्तर्यामी महाप्रभुका बाह्य-दशामें भावावेशमें राजाके दर्शनकी घटना अप्रकाशित :- ‘राजा’—हेन ज्ञान कभु ना कैल प्रकाश। अन्तरे सकल जानेन, बाहिरे उदास॥20॥ अनुवाद— महाप्रभु भीतरसे सब कुछ जानते थे कि क्या हो रहा है, बाहरसे उसे प्रकाश नहीं किया। उन्होंने यह भी प्रकट नहीं किया कि वे राजा प्रतापरुद्रसे बात कर रहे थे॥20॥ । 531
[ 14/21-34 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भक्तोंके द्वारा राजाके भाग्यकी प्रशंसा :- प्रतापरुद्रेर भाग्य देखि' भक्तगणे। राजारे प्रशंसे सबे आनन्दित-मने ॥ 21 ॥ अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रके सौभाग्यको देखकर सभी भक्तको बहुत आनन्द हुआ और वे उनकी प्रशंसा करने लगे ॥ 21 ॥ महाप्रभु और भक्तोंकी वन्दना करके राजाका प्रस्थान :- दण्डवत् करि' राजा बाहिरे चलिला। योड़ हस्त करि' सब भक्तेरे वन्दिला ॥ 22 ॥ अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रने हाथ जोड़कर सभी भक्तोंकी वन्दना की और महाप्रभुको दण्डवत् प्रणाम करके बाहर चले आये ॥ 22 ॥ सभीके मध्याह्न स्नानके बाद श्रीवाणीनाथके द्वारा प्रचुर प्रसाद लाना :- मध्याह्न करिला प्रभु लञा भक्तगण। वाणीनाथ प्रसाद लञा करिल गमन ॥ 23 ॥ सार्वभौम-रामानन्द-वाणीनाथे दिया। प्रसाद पाठाल राजा बहुत करिया ॥ 24 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने भक्तोंको साथ लेकर मध्याह्न स्नान किया। उधर श्रीवाणीनाथ सबके लिये प्रसाद लेने गये। राजा प्रतापरुद्रने श्रीसार्वभौम, श्रीरामानन्द राय और श्रीवाणीनाथके द्वारा बहुतसा प्रसाद भिजवा दिया ॥ 23-24 ॥ विचित्र प्रसाद :- 'बलगाण्डि भोगे'र प्रसाद-उत्तम अनन्त। 'नि-सकड़ि' प्रसाद आइल, यार नाहि अन्त ॥ 25 ॥ छाना, पाना, पैड़, आम्र, नारिकेल, काँठाल। नानाविध कदली, आर बीज-ताल ॥ 26 ॥ नारङ्ग, छोलङ्ग, टावा, कमला, बीजपूर। बादाम, छोहारा, द्राक्षा, पिण्डखर्जूर ॥ 27 ॥ मनोहरा, लाडु आदि शतेक प्रकार। अमृतगुटिका-आदि, क्षीर्सा अपार ॥ 28 ॥ अमृतमण्डा, सरवती, आर कुम्ड़ा-कुरी। रसामृत, सरभाजा आर सरपुरी ॥ 29 ॥ हरिवल्लभ, सेंओति, कर्पूर, मालती। डालि-मरिच-लाडु, नवात, अमृति ॥ 30 ॥ पद्मचिनि, चन्द्रकान्ति, खाजा, खण्डसार। वियरि, कदमा, तिलाखाजार प्रकार ॥ 31 ॥ नारङ्ग-छोलङ्ग-आम्र-वृक्षेर आकार। फूल-फल-पत्रयुक्त खण्डेर विकार ॥ 32 ॥ दधि, दुग्ध, ननी, तक्र, रसाला, शिखरिणी। स-लवण, मुद्गाङ्कुर, आदा खानि खानि ॥ 33 ॥ लेम्बु-कुल आदि नानाप्रकार आचार। लिखिते ना पारि प्रसाद कतेक प्रकार ॥ 34 ॥ अनुवाद—'बलगाण्डि' पर लगनेवाले भोगका प्रसाद उत्तम कोटिका और मात्रामें अनन्त होता है। राजाने 'नि-सकड़ि' अर्थात् जो पकाया न गया हो, वह प्रसाद इतना भेजा जिसका कोई अन्त नहीं था। उस प्रसादमें दही, फलोंका रस, डाब (पानीवाला नारियल), आम, सूखा नारियल, कटहल, अनेक प्रकारके केले और तालके बीज थे। नारङ्गी, मौसमी, गलगल, संतरा, कीनू आदि अनेक प्रकारके नींबू-जातीय फल थे। बादाम, छुहारा, किशमिश, खजूर आदि मेवा थे। मनोहर आदि सैकड़ों प्रकारके लड्डू, अमृत-गुटिका आदि मिठाइयाँ, अनेक प्रकारकी खीर थी। पपीता, मौसमी, पेठेकी मिठाई, मलाई लड्डू, मलाईको घीमें भूनकर बनायी गयी मिठाई और मलाईका मिश्रण देकर बनी एक प्रकारकी पूरी थी। घीमें बनायी गयी मीठी रोटी, सफेद गुलाब, कर्पूर और मालतीके फूलोंसे बनी मिठाइयाँ, मूँग दालके लड्डू, नवात (एक प्रकारकी मिठाई), इमरती, कमलके पुष्पसे बनायी चीनी, उड़दकी दालसे बनी रोटी और पूरी, खाजा, गुड़की मिठाई, चावलको भूनकर गुड़में मिलाकर बनी मिठाई, तिलकी मिठाई, तिलकी गजक आदि अनेक प्रकारके व्यञ्जन थे। संतरा, 532 ।
चौदहवाँ अध्याय 14/23-38 ] मौसमी, आम आदिके वृक्षके आकारकी फूल-फल-पत्तॉसे 'चन्द्रकान्ति' - उड़दकी दालकी बनी चन्द्राकारकी फुलबड़ी। युक्त चीनीसे बनी मिठाइयाँ (खिलौने) भी थीं। दही, 'वियरि' - विरण धानके चावलको भूनकर बनाये गये दूध, माखन, छाछ, शिकञ्जी, शिखरिणी (दही, चीनी, मिठाईके टुकड़े। 'कद्मा'-चावलोंको पीसकर चीनीके शहद, कर्पूर आदिके मिश्रणसे बनी), अदरकके टुकड़ोंके रसमें बनायी गयी बहुत कठोर अति प्रसिद्ध मिठाई। साथ अङ्कुरित मूँगकी नमकीन दाल भी थी। नींबू तथा 'तिलेखाजा'-खाजाके साथ घीमें भूने हुए तिलसे बनी बेर आदिसे बने अनेक प्रकारके आचार थे। भगवान् मिठाई। 'तक्र'-छाछ। 'रसाला'-शरबत, पाना। श्रीजगन्नाथको कितनी प्रकारका भोग लगा था, मैं उसका 'खानि-खानि'-छोटे-छोटे टुकड़े। नींबूका आचार और वर्णन नहीं कर सकता ॥ 23-34 ॥ बेरका आचार; पूर्वबङ्गालमें चलती भाषामें 'नींबू'को अमृतप्रवाह भाष्य- 'नि-सकड़ि'-दही, दूध, फल, लेम्बू कहते है ॥ 26-34 ॥ मूल आदि जो पकाया नहीं गया है। प्रसादके पात्रोंसे बहुतसे स्थानका घिर जाना :- 'पैड़'-डाब (हरा नारियल); (पाठान्तरमें, 'पैरा'- प्रसादे पूरित हइल अर्द्ध उपवन। खजूर और ताड़के रससे बना शीरा।) देखिया सन्तोष हैल महाप्रभुर मन ॥ 35 ॥ चीनीसे बनाया गये 'नारङ्गी', 'मौसमी', 'कीनू', जगन्नाथकी तृप्तिके स्मरणसे महाप्रभुको हर्ष :- 'संतरा' आदि नींबूजातीय फल और आमके वृक्षके एइमत जगन्नाथ करेन भोजन। आकारकी मिठाई (खिलौने) ॥ 25-32 ॥ एइ सुखे महाप्रभुर जुड़ाय नयन ॥ 36 ॥ अनुभाष्य-ग्रन्थकारका कृष्ण-नैवेद्यका विचित्रता- केयापत्र-द्रोणी आइल बोझा पाँच-सात। विषयक ज्ञान प्रकाशित हो रहा है- एक एक जने दश दोना दिल, -एत पात ॥ 37 ॥ 'बीजताल'-कच्चे ताल का फल। संतरा आदि अनुवाद-आधा उपवन प्रसादके पात्रोंसे ही भर सभी नींबूजातिके फल हैं। 'बीजपूर'-अनार अथवा गया, जिसे देखकर महाप्रभुके मनमें बहुत सन्तोष गलगल (?)। 'छोहारा'-छुआरा (सूखी खजूर)। हुआ। श्रीजगन्नाथने इतनी मात्रामें ऐसे स्वादिष्ट व्यञ्जनोंका 'द्राक्षा'-अंगूर। 'मनोहरा'-एक विशेष प्रकारकी बनी भोजन किया है, इस सुखमें ही महाप्रभुके नेत्र शीतल मिठाई, जिसे संदेश कहते हैं। 'क्षीरसा'-पूर्व बङ्गालमें हो रहे थे। पाँच-सात बोरियाँ भरकर केतकी वृक्षके चलती भाषामें 'क्षीर अर्थात् दूध' को ही क्षीरसा कहते पत्ते और दोने आये। एक-एक भक्तके आगे दस-दस हैं। पाठान्तरमें 'अमृतभण्डा'-पपीता; 'सरबती'-एक दोने और एक-एक पत्ता रखा गया ॥ 35-37 ॥ विशेष प्रकारका उत्कृष्ट नींबू। 'सरभाजा' और अनुभाष्य- 'केयापत्र-द्रोणी'-केतकी वृक्षके पत्तोंसे 'सरपुरी'-नदीया जिलेके कृष्णनगर अञ्चलमें विशेषरूपसे बना दोना ॥ 37 ॥ बनायी जानेवाली मिठाई। 'हरिवल्लभ'-घीमें बनायी कीर्त्तन करते-करते थक गये भक्तोंकी गयी विशेष प्रकारकी रोटी (?), 'सेंउति'-विशेष स्वयं भगवान्के द्वारा ही सेवा :- सुगन्धित पुष्प। 'कर्पूर'-विशेष पुष्प(?)। कीर्त्तनीयार परिश्रम जानि' गौरराय। 'डाल-मरिच-लाडु'-मूँगकी दालका लड्डू (?) ताँ-सबारे खाओयाइते प्रभुर मन धाय ॥ 38 ॥ 'नवात'-चीनीके रसमें पका विशेष मिष्ठान्न-द्रव्य। अनुवाद-कीर्त्तनकारी भक्तोंके परिश्रमको जानकर 'अमृति'-'जलेबी'-जातीय घीमें पकी मिठाई (इमरती) (पूर्व बङ्गालमें विशेष रूपसे बनती है)। । 533
[ 14/38-48 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीगौररायका मन उन्हें पेट भर प्रसाद खिलानेके लिये उत्कण्ठित हो रहा था ॥ ३८॥ महाप्रभु स्वयं परिवेशान करनेवाले :- पाँति पाँति करि' भक्तगणे बसाइला। परिवेशान करिबारे आपने लागिला ॥ ३९॥ अनुवाद—महाप्रभुने सभी भक्तोंको पंक्तियाँ बनाकर बैठा दिया और वे स्वयं प्रसादका परिवेशान करने लगे॥ ३९॥ अनुभाष्य—'पाँति'—पंक्ति बनाकर ॥ ३९॥ महाप्रभुके द्वारा भोजन न करनेसे सभीकी भोजन करनेमें अरुचि :- प्रभु ना खाइले, কেহ ना करे भोजन। स्वरूप-गोसाञि तबे कैल निवेदन ॥ ४० ॥ भक्तोंका पक्ष लेकर श्रीस्वरूपकी प्रार्थना :- “आपने बैस, प्रभु, भोजन करिते। तुमि ना खाइले, কেহ ना पारे खाइते ॥" ४१ ॥ अनुवाद—महाप्रभुके भोजन न करनेसे कोई भी भोजन नहीं कर रहा था। तब श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुसे निवेदन किया,―"प्रभो ! आप भोजन करनेके लिये बैठिये। जब तक आप भोजन नहीं करेंगे, तब तक कोई भी प्रसाद ग्रहण नहीं करेगा॥" ४०-४१॥ प्रभुके द्वारा प्रसाद सेवन :- तबे महाप्रभु कैसे निजगण लञा। भोजन कराइल सबाके आकण्ठ पूरिया ॥ ४२ ॥ अनुवाद—तब महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ भोजन करनेके लिये बैठ गये और उन्होंने सभी भक्तोंको कण्ठ तक भरकर भोजन कराया॥ ४२ ॥ भोजनके बाद आचमन, बहुत लोगोंको भी अतिरिक्त प्रसादकी प्राप्ति :- भोजन करि' बसिला प्रभु करि' आचमन। प्रसाद उबरिल, खाय सहस्रेक जन ॥ ४३ ॥ दीन-दुःखी-कङ्गालोंको महाप्रभुकी कृपासे प्रसाद-प्राप्ति :- प्रभुर आज्ञाय गोविन्द दीन-हीन जने। दुःखी काङ्गाल आनि' कराय भोजने ॥ ४४ ॥ अनुवाद—भोजन करनेके पश्चात् महाप्रभु आचमन करके बैठ गये। तब उन्होंने देखा कि इतना प्रसाद बच गया है कि अभी और हजारों व्यक्ति भोजन कर सकते हैं। महाप्रभुकी आज्ञासे श्रीगोविन्दने दीन-हीन, दुःखी तथा दरिद्र लोगोंको बुलाकर उन्हें भोजन कराया॥ ४३-४४॥ अनुभाष्य—'उवरिल'—अतिरिक्त (अधिक) हुआ॥ ४३॥ गौरहरिके द्वारा कङ्गालोंको भोजन करते हुए देखना और हरिकीर्त्तन करनेका उपदेश :- काङ्गालेर भोजन-रङ्ग देखे गौरहरि। 'हरिबोल' बलि' तारे उपदेश करि ॥ ४५ ॥ काङ्गालोंको हरिभक्तिकी प्राप्ति :- 'हरिबोल' बलि' काङ्गाल प्रेमे भासि' याय। ऐछन अद्भुत लीला करे गौरराय ॥ ४६ ॥ अनुवाद—श्रीगौरहरिने दरिद्रोंको भोजन करते देखकर उन्हें 'हरिबोल' बोलनेका उपदेश दिया। 'हरिबोल' बोलकर दरिद्र व्यक्ति भी प्रेममें डूबे जा रहे थे। श्रीगौरराय ऐसी अद्भुत लीला करते हैं॥ ४५-४६॥ रथ-सञ्चालनमें गौड़ोंका असामर्थ्य :- इँहा जगन्नाथेर रथ-चलन-समय। गौड़ सब रथ टाने, आगे नाहि याय ॥ ४७ ॥ सपरिकर राजाकी व्यग्र भावसे उपस्थिति :- टानिते ना पारे गौड़, रथ छाड़ि' दिल। पात्र-मित्र लञा राजा व्यग्र हञा आइल ॥ ४८ ॥ अनुवाद—इधर जब श्रीजगन्नाथके रथके चलनेका समय हुआ, तब सब गौड़ोंने रथ खींचना आरम्भ किया, परन्तु रथ आगे नहीं चला। गौड़ लोग जब रथको चला नहीं पाये, तो उन्होंने प्रयास करना छोड़ दिया। तब अपने सेवकों और मित्रोंके साथ राजा व्याकुल होकर आये ॥ ४७-४८ ॥ 534 ।
चौदहवाँ अध्याय 14/49-59 ] बड़े-बड़े बलवान भी रथको चलानेमें असमर्थ :- महामल्लगणे दिल रथ चालाइते। आपने लागिला रथ, ना पारे टानिते ॥ 49 ॥ व्यग्र हञा आने राजा मत्त-हातीगण। रथ चालाइते रथे करिल योजन ॥ 50 ॥ मत्त-हस्तिगण टाने, यत तार बल। एक पद ना चले रथ, हइल अचल ॥ 51 ॥ अनुवाद-राजाने रथको चलानेके लिये बड़े-बड़े पहलवानोंको नियुक्त किया और फिर वे स्वयं भी प्रयास करने लगे, परन्तु वे सब मिलकर भी रथको हिला नहीं सके। अधीर होकर राजाने मतवाले हाथियोंको मँगवाकर उन्हें रथके आगे जोत दिया। मतवाले हाथियोंने भी अपना सम्पूर्ण बल लगाकर खींचनेका प्रयास किया, परन्तु रथ हिला ही नहीं, एक पग भी आगे नहीं बढ़ा ॥ 49-51 ॥ सपरिकर महाप्रभुका रथको खींचनेकी चेष्टाका दर्शन :- शुनि' महाप्रभु आइला निजगण लञा। मत्तहस्ति रथ टाने, — देखे दाण्डाञा ॥ 52 ॥ हाथियोंके द्वारा भी रथको चलता न देख सबका हाहाकार :- अङ्कुशेर घाय हस्ती करये चित्कार। रथ नाहि चले, लोक करे हाहाकार ॥ 53 ॥ अनुवाद - यह सुनकर महाप्रभु अपने भक्तोंको साथ लेकर वहाँ आये और खड़े होकर मतवाले हाथियोंको रथको खींचते हुए देखने लगे। अङ्कुशके प्रहारसे हाथी चिंघाड़ने लगे, परन्तु रथ फिर भी न हिला। लोग भी सब हाहाकार करने लगे ॥ 52-53 ॥ अपने भक्तोंको रथ खींचनेमें नियुक्त करना :- तबे महाप्रभु सब हस्ति घुचाइल। निजगणे रथ-काछि टानिबारे दिल ॥ 54 ॥ महाप्रभुके द्वारा रथके साथ अपने मस्तकको स्पर्श करने मात्रसे रथका चलना :- आपने रथेर पाछे ठेले माथा दिया। हडू हडू करि' रथ चलिल धाइञा ॥ 55 ॥ अनायास ही रथका चलना :- भक्तगण काछि हाते करि' मात्र धाय। आपने चलिल रथ, टानिते ना पाय ॥ 56 ॥ अनुवाद-तब महाप्रभुने सभी हाथियोंको हटवा दिया और रथको खींचनेके लिये अपने भक्तोंके हाथोंमें रस्सीको पकड़ा दिया। रथके पीछे जाकर महाप्रभु स्वयं अपने सिरसे रथको ठेलने लगे और तभी रथ हडू हडू शब्द करता हुआ तेजीसे चलने लगा। रथके आगे भक्तगण केवल रस्सीको हाथमें पकड़कर दौड़ रहे थे, रथ तो बिना खींचे ही अपने आप चल रहा था॥ 54-56 ॥ हर्षवशतः सभीके द्वारा जयध्वनि :- आनन्दे करये लोक 'जय' 'जय'-ध्वनि। 'जय जगन्नाथ' बइ आर नाहि शुनि ॥ 57 ॥ अनुवाद-रथको चलते हुए देख लोग आनन्दमें 'जय' 'जय'-कार करने लगे। 'जय जगन्नाथ'के अतिरिक्त और कुछ भी सुनायी नहीं दे रहा था ॥ 57 ॥ महाप्रभुके प्रभावसे रथका गुण्डिचा पहुँचना :- निमेषे त' गेल रथ गुण्डिचार द्वार। चैतन्य-प्रताप देखि' लोके चमत्कार ॥ 58 ॥ अनुवाद-एक निमेष अर्थात् पलक झपकनेके समयमें ही श्रीजगन्नाथका रथ गुण्डिचा मन्दिरके द्वारपर पहुँच गया। श्रीचैतन्य महाप्रभुके ऐसे प्रतापको देखकर सभी लोग चमत्कृत हो उठे ॥ 58 ॥ लोगोंके द्वारा महाप्रभुकी जयध्वनि :- 'जय गौरचन्द्र', 'जय श्रीकृष्णचैतन्य'। एइमत कोलाहल लोके करे धन्य ॥ 59 ॥ । 535
[ 14/59-67 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—'जय गौरचन्द्र', 'जय श्रीकृष्णचैतन्य' का तुमुलनाद लोगोंको अति धन्य कर रहा था ॥ ५९ ॥ महाप्रभुकी महिमाके दर्शनसे राजाको प्रेमावेश :— देखिया प्रतापरुद्र पात्र-मित्र-सङ्गे। प्रभुर महिमा देखि' प्रेमे फुले अङ्गे ॥ ६० ॥ अनुवाद—राजा प्रतापरुद्र और उनके सेवकों एवं मित्रोंको महाप्रभुकी महिमाका दर्शन करके प्रेमसे रोमाञ्च हो गया ॥ ६० ॥ श्रीजगन्नाथका पाहाण्डि :— पाण्डुविजय तब करे सेवकगणे। जगन्नाथ बसिला गिया निज-सिंहासने ॥ ६१ ॥ सुभद्रा-बलरामका पाहाण्डि, श्रीजगन्नाथका स्नानभोग :— सुभद्रा-बलराम निज-सिंहासने आइला। जगन्नाथेर स्नानभोग हइते लागिला ॥ ६२ ॥ आङ्गनमें महाप्रभुका अपने भक्तोंके साथ कीर्तन :— आङ्गिनाते महाप्रभु लञा भक्तगण। आनन्दे आरम्भ कैल नर्त्तन-कीर्त्तन ॥ ६३ ॥ महाप्रभुके प्रेममें सभी पागल :— आनन्दे महाप्रभुर प्रेम उथलिल। देखि' सब लोक प्रेम-सागरे भासिल ॥ ६४ ॥ अनुवाद—तब श्रीजगन्नाथके सेवकोंने उनको रथसे नीचे उतारा और श्रीजगन्नाथ गुण्डिचा मन्दिरमें स्थित अपने सिंहासनपर जाकर बैठ गये। तब श्रीसुभद्रा और श्रीबलराम भी अपने सिंहासनपर आकर विराजमान हुए। इसके बाद श्रीजगन्नाथका स्नान हुआ और फिर उन्हें भोग लगा। इधर महाप्रभुने मन्दिरके आङ्गनमें अपने भक्तोंके साथ आनन्दपूर्वक नृत्य-कीर्तन करना आरम्भ किया। नृत्य-कीर्तनके आनन्दमें महाप्रभु प्रेममें विह्वल हो गये, जिसे देखकर सब लोग प्रेमके सागरमें डूबने लगे ॥ ६१-६४ ॥ सन्ध्या आरतिका दर्शन और आइतोटामें विश्राम :— नृत्य करि' सन्ध्याकाले आरति देखिल। आइतोटा आसि' प्रभु विश्राम करिल ॥ ६५ ॥ अनुवाद—नृत्य करनेके बाद महाप्रभुने श्रीजगन्नाथकी सन्ध्या आरतीका दर्शन किया। तब महाप्रभुने आइतोटामें जाकर रात्रिमें विश्राम किया ॥ ६५ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आइतोटा'—गुण्डिचा मन्दिरके निकट एक उद्यान ॥ ६५ ॥ श्रीअद्वैतादि नौ भक्तोंके द्वारा नौ रातकी यात्राके नौ दिनों तक महाप्रभुको निमन्त्रण :— अद्वैतादि भक्तगण निमन्त्रण कैल। मुख्य मुख्य नव जन नव दिन पाइल ॥ ६६ ॥ चातुर्मास्यमें प्रत्येक भक्तके द्वारा एक-एक दिन तक महाप्रभुको निमन्त्रण :— आर भक्तगण चातुर्मास्ये यत दिन। एक एक दिन करि' करिल वण्टन ॥ ६७ ॥ अनुवाद—तब श्रीअद्वैतादि भक्तोंने जाकर महाप्रभुको भोजनके लिये निमन्त्रण किया। मुख्य-मुख्य नौ भक्तोंने नौ दिन अपने-अपने स्थानपर निमन्त्रण करनेका सौभाग्य प्राप्त किया। अन्य कुछ मुख्य भक्तोंने चातुर्मास्यके जितने दिन थे, उनको एक-एक दिन करके बाँट लिया ॥ ६६-६७ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गौड़देशसे श्रीअद्वैतादि जो सब भक्त आये थे, उन्होंने महाप्रभुको एक-एक दिन निमन्त्रण करके भिक्षा (प्रसाद) दी। गुण्डिचा मन्दिरमें नौ दिन उत्सव होता है,—इसका नाम 'नवरात्र'-यात्रा है। उन नौ दिनोंमें महाप्रभुने भक्तों सहित आइतोटामें वास किया। श्रीअद्वैतादि प्रधान-प्रधान नौ भक्तोंने इन नौ दिन महाप्रभुको निमन्त्रित किया। और-और भक्तोंने चातुर्मास्यका एक एक दिन करके बाँट लिया था ॥ ६६ ॥ 536 ।
चौदहवाँ अध्याय 14/68-77 ] बाकी भक्तोंके द्वारा महाप्रभुको निमन्त्रण करनेके सौभाग्यका अभाव :- चारि मासेर दिन मुख्यभक्त बाँटि निल। आर भक्तगण अवसर ना पाइल ॥ 68 ॥ अन्य कोई उपाय न देख 2-3 भक्तोंके द्वारा इकट्ठे मिलकर एक-एक दिन महाप्रभुका निमन्त्रण :- एक दिन निमन्त्रण करे दुइ-तिने मिलि'। एइमत महाप्रभुर निमन्त्रण-केलि ॥ 69 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको भिक्षा करानेके लिये चातुर्मास्यके दिन भी मुख्य-मुख्य भक्तोंने बाँट लिये। अन्य भक्तोंको इसका अवसर प्राप्त नहीं हुआ। इसलिये दो-तीन भक्तोंने मिलकर महाप्रभुको एक-एक दिन निमन्त्रण किया। इस प्रकार महाप्रभुकी निमन्त्रण-लीला हुई॥ 68-69 ॥ प्रातःकाल स्नान करके श्रीजगन्नाथके दर्शनके बाद परिकरोंके साथ कीर्त्तन-नृत्य :- प्रातःकाले स्नान करि' देखि' जगन्नाथ। सङ्कीर्त्तने नृत्य करे भक्तगण-साथ ॥ 70 ॥ श्रीनित्ताइ और श्रीअद्वैतादिका नृत्य, गुण्डिचामें तीनों समय कीर्त्तन :- कभु अद्वैते नाचाय, कभु नित्यानन्दे। कभु हरिदासे नाचाय, कभु अच्युतानन्दे ॥ 71 ॥ कभु वक्रेश्वरे, कभु आर भक्तगणे। त्रिसन्ध्या कीर्त्तन करे गुण्डिचा-प्राङ्गुणे ॥ 72 ॥ अनुवाद—महाप्रभु प्रातःकालमें स्नान करके श्रीजगन्नाथका दर्शन करनेके बाद अपने भक्तोंके साथ सङ्कीर्त्तनमें नृत्य करते थे। वे सङ्कीर्त्तनमें नृत्य करते हुए कभी श्रीअद्वैताचार्यको नचाते, तो कभी श्रीनित्यानन्द प्रभुको, कभी श्रीहरिदासको नृत्य कराने लगते, तो कभी श्रीअच्युतानन्दको, कभी श्रीवक्रेश्वरको और कभी किसी ओर भक्तको। इस प्रकार महाप्रभु तीन सन्ध्या श्रीगुण्डिचा मन्दिरके प्राङ्गणमें कीर्त्तन करते ॥ 70-72 ॥ श्रीकृष्णका व्रजमें आगमन और श्रीराधाके साथ मिलनसे उनकी दासी-गोपी-अभिमानी महाप्रभुका आनन्द :- वृन्दावने आइला कृष्ण—एइ प्रभुर ज्ञान। कृष्णेर विरह-स्फूर्त्ति हैल अवसान ॥ 73 ॥ राधासङ्गे कृष्णलीला—एइ हैल ज्ञाने। एइ रसे मग्न प्रभु हइला आपने ॥ 74 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको अनुभव होता कि श्रीकृष्ण वृन्दावनमें आ गये हैं। अतः उनकी श्रीकृष्ण विरह-स्फूर्त्ति शान्त हो गयी। महाप्रभु सदा श्रीकृष्णकी श्रीराधाके साथ विहारलीलाका स्मरण करते हुए स्वयं इस रसमें निमग्न हो गये ॥ 73-74 ॥ भक्तोंके साथ महाप्रभुकी अनेक प्रकारकी जलकेलि :- नानोद्याने भक्तसङ्गे वृन्दावन-लीला। 'इन्द्रद्युम्न'-सरोवरे करे जलखेला ॥ 75 ॥ आपने सकल भक्ते सिञ्चे जल दिया। सब भक्तगण सिञ्चे चौदिके बेड़िया ॥ 76 ॥ कभु एक मण्डल, कभु अनेक मण्डल। जलमण्डूक-वाद्ये सबे बाजाय करतल ॥ 77 ॥ अनुवाद—गुण्डिचा मन्दिरके पास अनेक उद्यान थे और महाप्रभु प्रत्येक उद्यानमें भक्तोंके साथ वृन्दावनकी लीलाएँ करने लगे। 'इन्द्रद्युम्न' नामक सरोवरमें उन्होंने भक्तोंके साथ जल-क्रीड़ा की। महाप्रभु सभी भक्तोंपर सरोवरका जल उलीचने लगे और सब भक्त भी चारों ओरसे महाप्रभुपर जल फेंकने लगे। वे जलमें कभी तो एक घेरा और कभी अनेक घेरे बनाकर जलमें करतल बजाते हुए मेंढ़क जैसी ध्वनि करते ॥ 75-77 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'जलमण्डुक-वाद्य'—पानीमें मेढ़क जिस प्रकार आवाज करता है, उस प्रकार ध्वनिके जैसे बजाते हुए गोलाकारमें जलकेलि होने लगी ॥ 77 ॥ अनुभाष्य—'जलमण्डुक-वाद्य'—पानीमें करतल बजाकर मेढ़क जैसे ध्वनि करना ॥ 77 ॥ । 537
[ 14/78-87 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
दो-दो भक्तोंके द्वारा जलकेलि करना और महाप्रभुके द्वारा उसका दर्शन :- दुइ-दुइ जने मेलि' करे जल-रण। केह हारे, केह जिने-प्रभु करे दरशन ॥ 78 ॥ अद्वैत-नित्यानन्दे जल-फेलाफेलि। आचार्य हारिया, पाछे करे गालागालि ॥ 79 ॥ विद्यानिधिर जलकेलि स्वरूपेर सने। गुप्त-दत्ते जलकेलि करे दुइ जने ॥ 80 ॥ श्रीवास-सहित जल खेले गदाधर। राघव-पण्डित सने खेले वक्रेश्वर ॥ 81 ॥ सार्वभौम-सङ्गे खेले रामानन्द-राय। गाम्भीर्य गेल दोंहार, हैल शिशुप्राय ॥ 82 ॥
“पण्डित, गम्भीर दुँहे—प्रामाणिक जन। बाल-चाञ्चल्य करे, कराह वर्जन ॥” 84 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीसार्वभौम और श्रीरामानन्द राय—दोनोंकी चञ्चलताको देखकर मुस्कुराते हुए श्रीगोपीनाथाचार्यसे कहा,—“इन्हें बाल-चापल्य करनेसे मना करो, क्योंकि ये दोनों ही विद्वान, गम्भीर और समाजमें प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं॥”83-84॥
श्रीगोपीनाथके द्वारा महाप्रभुकी कृपा-महिमाका वर्णन :- गोपीनाथ कहे,—“तोमार कृपा-महासिनधु। उछलित करे यबे तार एक बिन्दु ॥ 85 ॥ मेरु-मन्दर-पर्वत डुबाय यथा तथा। एइ दुइ-गण्ड-शैल, इहार का कथा ॥ 86 ॥ महाप्रभुकी कृपासे शुष्कज्ञानी श्रीसार्वभौम भी अब श्रीकृष्णसेवा-रसमें रसिक :- शुष्कतर्क-खलि खाइते जन्म गेल याँर। ताँरे लीलामृत पियाओ,—ए कृपा तोमार ॥” 87 ॥
अनुवाद—कभी दो भक्त एक दूसरेसे जल-युद्ध करने लगते। इस युद्धमें एक हार जाता और दूसरा जीत जाता—महाप्रभु ये सब क्रीड़ा देखते। एक-दूसरेपर जल फेंकनेकी पहली क्रीड़ा श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द प्रभुके बीच हुई। इसमें श्रीअद्वैताचार्य हार गये और बादमें वे श्रीनित्यानन्द प्रभुको (प्रेमपूर्वक) गाली देने लगे। श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि श्रीस्वरूप दामोदरके साथ और श्रीमुरारि गुप्त वासुदेवदत्तके साथ जलकेलि कर रहे थे। श्रीवास पण्डित श्रीगदाधर पण्डितके साथ और श्रीराघव पण्डित श्रीवक्रेश्वर पण्डितके साथ जलकेलि करते एक-दूसरेपर जल फेंक रहे थे। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य श्रीरामानन्द-रायके साथ जल-क्रीड़ा कर रहे थे, क्रीड़ा करते हुए उनकी गम्भीरता न जाने कहाँ लुप्त हो गयी और वे बालकोंकी भाँति हो गये॥78-82॥
अनुभाष्य— 'गुप्त'—मुरारि गुप्त; 'दत्त'—वासुदेव दत्त ॥ 80 ॥
श्रीगोपीनाथको श्रीसार्वभौम और श्रीरायके चापल्यको त्याग करवानेकी आज्ञा :- महाप्रभु ताँ दोंहार चापल्य देखिया। गोपीनाथाचार्ये किछु कहेन हासिया ॥ 83 ॥
अनुवाद—श्रीगोपीनाथने कहा,—“आपकी कृपा महासिन्धुकी भाँति है। जब उसकी एक बूँद भी उछलती है, तो वह सुमेरु-मन्दराचल जैसे बड़े पर्वतोंको भी वहीं डुबो सकती है। ये दोनों तो छोटीसी पहाड़ियोंके समान हैं, तो इसमें आश्चर्यकी क्या बात है कि ये आपकी कृपाके सागरमें डूब रहे हैं। जिनका (श्रीसार्वभौमका) समस्त जीवन शुष्कतर्क रूपी खली खाते हुआ व्यतीत हुआ है, उन्हें आप आज अपनी लीलामृतका पान करा रहे हैं—आपकी इनपर यह महान् कृपा है॥85-87॥
अनुभाष्य— 'गण्ड-शैल'—पहाड़ी; यद्यपि 'दुई'—अर्थात् 'दो'—शब्दका उल्लेख है, तथापि विशेष रूपसे श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको लक्ष्य करके ऐसा कहा गया है। 'खलि'—खली (बीजसे तेल निकालनेके बाद बची हुई खली); महाप्रभुकी कृपा प्राप्त करनेसे पहले निर्विशेष-ब्रह्म-ज्ञानी
538 ।