श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1381, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौदहवाँ अध्याय 14/68-77 ] बाकी भक्तोंके द्वारा महाप्रभुको निमन्त्रण करनेके सौभाग्यका अभाव :- चारि मासेर दिन मुख्यभक्त बाँटि निल। आर भक्तगण अवसर ना पाइल ॥ 68 ॥ अन्य कोई उपाय न देख 2-3 भक्तोंके द्वारा इकट्ठे मिलकर एक-एक दिन महाप्रभुका निमन्त्रण :- एक दिन निमन्त्रण करे दुइ-तिने मिलि'। एइमत महाप्रभुर निमन्त्रण-केलि ॥ 69 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको भिक्षा करानेके लिये चातुर्मास्यके दिन भी मुख्य-मुख्य भक्तोंने बाँट लिये। अन्य भक्तोंको इसका अवसर प्राप्त नहीं हुआ। इसलिये दो-तीन भक्तोंने मिलकर महाप्रभुको एक-एक दिन निमन्त्रण किया। इस प्रकार महाप्रभुकी निमन्त्रण-लीला हुई॥ 68-69 ॥ प्रातःकाल स्नान करके श्रीजगन्नाथके दर्शनके बाद परिकरोंके साथ कीर्त्तन-नृत्य :- प्रातःकाले स्नान करि' देखि' जगन्नाथ। सङ्कीर्त्तने नृत्य करे भक्तगण-साथ ॥ 70 ॥ श्रीनित्ताइ और श्रीअद्वैतादिका नृत्य, गुण्डिचामें तीनों समय कीर्त्तन :- कभु अद्वैते नाचाय, कभु नित्यानन्दे। कभु हरिदासे नाचाय, कभु अच्युतानन्दे ॥ 71 ॥ कभु वक्रेश्वरे, कभु आर भक्तगणे। त्रिसन्ध्या कीर्त्तन करे गुण्डिचा-प्राङ्गुणे ॥ 72 ॥ अनुवाद—महाप्रभु प्रातःकालमें स्नान करके श्रीजगन्नाथका दर्शन करनेके बाद अपने भक्तोंके साथ सङ्कीर्त्तनमें नृत्य करते थे। वे सङ्कीर्त्तनमें नृत्य करते हुए कभी श्रीअद्वैताचार्यको नचाते, तो कभी श्रीनित्यानन्द प्रभुको, कभी श्रीहरिदासको नृत्य कराने लगते, तो कभी श्रीअच्युतानन्दको, कभी श्रीवक्रेश्वरको और कभी किसी ओर भक्तको। इस प्रकार महाप्रभु तीन सन्ध्या श्रीगुण्डिचा मन्दिरके प्राङ्गणमें कीर्त्तन करते ॥ 70-72 ॥ श्रीकृष्णका व्रजमें आगमन और श्रीराधाके साथ मिलनसे उनकी दासी-गोपी-अभिमानी महाप्रभुका आनन्द :- वृन्दावने आइला कृष्ण—एइ प्रभुर ज्ञान। कृष्णेर विरह-स्फूर्त्ति हैल अवसान ॥ 73 ॥ राधासङ्गे कृष्णलीला—एइ हैल ज्ञाने। एइ रसे मग्न प्रभु हइला आपने ॥ 74 ॥ अनुवाद—महाप्रभुको अनुभव होता कि श्रीकृष्ण वृन्दावनमें आ गये हैं। अतः उनकी श्रीकृष्ण विरह-स्फूर्त्ति शान्त हो गयी। महाप्रभु सदा श्रीकृष्णकी श्रीराधाके साथ विहारलीलाका स्मरण करते हुए स्वयं इस रसमें निमग्न हो गये ॥ 73-74 ॥ भक्तोंके साथ महाप्रभुकी अनेक प्रकारकी जलकेलि :- नानोद्याने भक्तसङ्गे वृन्दावन-लीला। 'इन्द्रद्युम्न'-सरोवरे करे जलखेला ॥ 75 ॥ आपने सकल भक्ते सिञ्चे जल दिया। सब भक्तगण सिञ्चे चौदिके बेड़िया ॥ 76 ॥ कभु एक मण्डल, कभु अनेक मण्डल। जलमण्डूक-वाद्ये सबे बाजाय करतल ॥ 77 ॥ अनुवाद—गुण्डिचा मन्दिरके पास अनेक उद्यान थे और महाप्रभु प्रत्येक उद्यानमें भक्तोंके साथ वृन्दावनकी लीलाएँ करने लगे। 'इन्द्रद्युम्न' नामक सरोवरमें उन्होंने भक्तोंके साथ जल-क्रीड़ा की। महाप्रभु सभी भक्तोंपर सरोवरका जल उलीचने लगे और सब भक्त भी चारों ओरसे महाप्रभुपर जल फेंकने लगे। वे जलमें कभी तो एक घेरा और कभी अनेक घेरे बनाकर जलमें करतल बजाते हुए मेंढ़क जैसी ध्वनि करते ॥ 75-77 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'जलमण्डुक-वाद्य'—पानीमें मेढ़क जिस प्रकार आवाज करता है, उस प्रकार ध्वनिके जैसे बजाते हुए गोलाकारमें जलकेलि होने लगी ॥ 77 ॥ अनुभाष्य—'जलमण्डुक-वाद्य'—पानीमें करतल बजाकर मेढ़क जैसे ध्वनि करना ॥ 77 ॥ । 537