भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1380, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1380

[ 14/59-67 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—'जय गौरचन्द्र', 'जय श्रीकृष्णचैतन्य' का तुमुलनाद लोगोंको अति धन्य कर रहा था ॥ ५९ ॥ महाप्रभुकी महिमाके दर्शनसे राजाको प्रेमावेश :— देखिया प्रतापरुद्र पात्र-मित्र-सङ्गे। प्रभुर महिमा देखि' प्रेमे फुले अङ्गे ॥ ६० ॥ अनुवाद—राजा प्रतापरुद्र और उनके सेवकों एवं मित्रोंको महाप्रभुकी महिमाका दर्शन करके प्रेमसे रोमाञ्च हो गया ॥ ६० ॥ श्रीजगन्नाथका पाहाण्डि :— पाण्डुविजय तब करे सेवकगणे। जगन्नाथ बसिला गिया निज-सिंहासने ॥ ६१ ॥ सुभद्रा-बलरामका पाहाण्डि, श्रीजगन्नाथका स्नानभोग :— सुभद्रा-बलराम निज-सिंहासने आइला। जगन्नाथेर स्नानभोग हइते लागिला ॥ ६२ ॥ आङ्गनमें महाप्रभुका अपने भक्तोंके साथ कीर्तन :— आङ्गिनाते महाप्रभु लञा भक्तगण। आनन्दे आरम्भ कैल नर्त्तन-कीर्त्तन ॥ ६३ ॥ महाप्रभुके प्रेममें सभी पागल :— आनन्दे महाप्रभुर प्रेम उथलिल। देखि' सब लोक प्रेम-सागरे भासिल ॥ ६४ ॥ अनुवाद—तब श्रीजगन्नाथके सेवकोंने उनको रथसे नीचे उतारा और श्रीजगन्नाथ गुण्डिचा मन्दिरमें स्थित अपने सिंहासनपर जाकर बैठ गये। तब श्रीसुभद्रा और श्रीबलराम भी अपने सिंहासनपर आकर विराजमान हुए। इसके बाद श्रीजगन्नाथका स्नान हुआ और फिर उन्हें भोग लगा। इधर महाप्रभुने मन्दिरके आङ्गनमें अपने भक्तोंके साथ आनन्दपूर्वक नृत्य-कीर्तन करना आरम्भ किया। नृत्य-कीर्तनके आनन्दमें महाप्रभु प्रेममें विह्वल हो गये, जिसे देखकर सब लोग प्रेमके सागरमें डूबने लगे ॥ ६१-६४ ॥ सन्ध्या आरतिका दर्शन और आइतोटामें विश्राम :— नृत्य करि' सन्ध्याकाले आरति देखिल। आइतोटा आसि' प्रभु विश्राम करिल ॥ ६५ ॥ अनुवाद—नृत्य करनेके बाद महाप्रभुने श्रीजगन्नाथकी सन्ध्या आरतीका दर्शन किया। तब महाप्रभुने आइतोटामें जाकर रात्रिमें विश्राम किया ॥ ६५ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आइतोटा'—गुण्डिचा मन्दिरके निकट एक उद्यान ॥ ६५ ॥ श्रीअद्वैतादि नौ भक्तोंके द्वारा नौ रातकी यात्राके नौ दिनों तक महाप्रभुको निमन्त्रण :— अद्वैतादि भक्तगण निमन्त्रण कैल। मुख्य मुख्य नव जन नव दिन पाइल ॥ ६६ ॥ चातुर्मास्यमें प्रत्येक भक्तके द्वारा एक-एक दिन तक महाप्रभुको निमन्त्रण :— आर भक्तगण चातुर्मास्ये यत दिन। एक एक दिन करि' करिल वण्टन ॥ ६७ ॥ अनुवाद—तब श्रीअद्वैतादि भक्तोंने जाकर महाप्रभुको भोजनके लिये निमन्त्रण किया। मुख्य-मुख्य नौ भक्तोंने नौ दिन अपने-अपने स्थानपर निमन्त्रण करनेका सौभाग्य प्राप्त किया। अन्य कुछ मुख्य भक्तोंने चातुर्मास्यके जितने दिन थे, उनको एक-एक दिन करके बाँट लिया ॥ ६६-६७ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गौड़देशसे श्रीअद्वैतादि जो सब भक्त आये थे, उन्होंने महाप्रभुको एक-एक दिन निमन्त्रण करके भिक्षा (प्रसाद) दी। गुण्डिचा मन्दिरमें नौ दिन उत्सव होता है,—इसका नाम 'नवरात्र'-यात्रा है। उन नौ दिनोंमें महाप्रभुने भक्तों सहित आइतोटामें वास किया। श्रीअद्वैतादि प्रधान-प्रधान नौ भक्तोंने इन नौ दिन महाप्रभुको निमन्त्रित किया। और-और भक्तोंने चातुर्मास्यका एक एक दिन करके बाँट लिया था ॥ ६६ ॥ 536 ।