भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1379

चौदहवाँ अध्याय 14/49-59 ] बड़े-बड़े बलवान भी रथको चलानेमें असमर्थ :- महामल्लगणे दिल रथ चालाइते। आपने लागिला रथ, ना पारे टानिते ॥ 49 ॥ व्यग्र हञा आने राजा मत्त-हातीगण। रथ चालाइते रथे करिल योजन ॥ 50 ॥ मत्त-हस्तिगण टाने, यत तार बल। एक पद ना चले रथ, हइल अचल ॥ 51 ॥ अनुवाद-राजाने रथको चलानेके लिये बड़े-बड़े पहलवानोंको नियुक्त किया और फिर वे स्वयं भी प्रयास करने लगे, परन्तु वे सब मिलकर भी रथको हिला नहीं सके। अधीर होकर राजाने मतवाले हाथियोंको मँगवाकर उन्हें रथके आगे जोत दिया। मतवाले हाथियोंने भी अपना सम्पूर्ण बल लगाकर खींचनेका प्रयास किया, परन्तु रथ हिला ही नहीं, एक पग भी आगे नहीं बढ़ा ॥ 49-51 ॥ सपरिकर महाप्रभुका रथको खींचनेकी चेष्टाका दर्शन :- शुनि' महाप्रभु आइला निजगण लञा। मत्तहस्ति रथ टाने, — देखे दाण्डाञा ॥ 52 ॥ हाथियोंके द्वारा भी रथको चलता न देख सबका हाहाकार :- अङ्कुशेर घाय हस्ती करये चित्कार। रथ नाहि चले, लोक करे हाहाकार ॥ 53 ॥ अनुवाद - यह सुनकर महाप्रभु अपने भक्तोंको साथ लेकर वहाँ आये और खड़े होकर मतवाले हाथियोंको रथको खींचते हुए देखने लगे। अङ्कुशके प्रहारसे हाथी चिंघाड़ने लगे, परन्तु रथ फिर भी न हिला। लोग भी सब हाहाकार करने लगे ॥ 52-53 ॥ अपने भक्तोंको रथ खींचनेमें नियुक्त करना :- तबे महाप्रभु सब हस्ति घुचाइल। निजगणे रथ-काछि टानिबारे दिल ॥ 54 ॥ महाप्रभुके द्वारा रथके साथ अपने मस्तकको स्पर्श करने मात्रसे रथका चलना :- आपने रथेर पाछे ठेले माथा दिया। हडू हडू करि' रथ चलिल धाइञा ॥ 55 ॥ अनायास ही रथका चलना :- भक्तगण काछि हाते करि' मात्र धाय। आपने चलिल रथ, टानिते ना पाय ॥ 56 ॥ अनुवाद-तब महाप्रभुने सभी हाथियोंको हटवा दिया और रथको खींचनेके लिये अपने भक्तोंके हाथोंमें रस्सीको पकड़ा दिया। रथके पीछे जाकर महाप्रभु स्वयं अपने सिरसे रथको ठेलने लगे और तभी रथ हडू हडू शब्द करता हुआ तेजीसे चलने लगा। रथके आगे भक्तगण केवल रस्सीको हाथमें पकड़कर दौड़ रहे थे, रथ तो बिना खींचे ही अपने आप चल रहा था॥ 54-56 ॥ हर्षवशतः सभीके द्वारा जयध्वनि :- आनन्दे करये लोक 'जय' 'जय'-ध्वनि। 'जय जगन्नाथ' बइ आर नाहि शुनि ॥ 57 ॥ अनुवाद-रथको चलते हुए देख लोग आनन्दमें 'जय' 'जय'-कार करने लगे। 'जय जगन्नाथ'के अतिरिक्त और कुछ भी सुनायी नहीं दे रहा था ॥ 57 ॥ महाप्रभुके प्रभावसे रथका गुण्डिचा पहुँचना :- निमेषे त' गेल रथ गुण्डिचार द्वार। चैतन्य-प्रताप देखि' लोके चमत्कार ॥ 58 ॥ अनुवाद-एक निमेष अर्थात् पलक झपकनेके समयमें ही श्रीजगन्नाथका रथ गुण्डिचा मन्दिरके द्वारपर पहुँच गया। श्रीचैतन्य महाप्रभुके ऐसे प्रतापको देखकर सभी लोग चमत्कृत हो उठे ॥ 58 ॥ लोगोंके द्वारा महाप्रभुकी जयध्वनि :- 'जय गौरचन्द्र', 'जय श्रीकृष्णचैतन्य'। एइमत कोलाहल लोके करे धन्य ॥ 59 ॥ । 535