भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1378, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1378

[ 14/38-48 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीगौररायका मन उन्हें पेट भर प्रसाद खिलानेके लिये उत्कण्ठित हो रहा था ॥ ३८॥ महाप्रभु स्वयं परिवेशान करनेवाले :- पाँति पाँति करि' भक्तगणे बसाइला। परिवेशान करिबारे आपने लागिला ॥ ३९॥ अनुवाद—महाप्रभुने सभी भक्तोंको पंक्तियाँ बनाकर बैठा दिया और वे स्वयं प्रसादका परिवेशान करने लगे॥ ३९॥ अनुभाष्य—'पाँति'—पंक्ति बनाकर ॥ ३९॥ महाप्रभुके द्वारा भोजन न करनेसे सभीकी भोजन करनेमें अरुचि :- प्रभु ना खाइले, কেহ ना करे भोजन। स्वरूप-गोसाञि तबे कैल निवेदन ॥ ४० ॥ भक्तोंका पक्ष लेकर श्रीस्वरूपकी प्रार्थना :- “आपने बैस, प्रभु, भोजन करिते। तुमि ना खाइले, কেহ ना पारे खाइते ॥" ४१ ॥ अनुवाद—महाप्रभुके भोजन न करनेसे कोई भी भोजन नहीं कर रहा था। तब श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुसे निवेदन किया,―"प्रभो ! आप भोजन करनेके लिये बैठिये। जब तक आप भोजन नहीं करेंगे, तब तक कोई भी प्रसाद ग्रहण नहीं करेगा॥" ४०-४१॥ प्रभुके द्वारा प्रसाद सेवन :- तबे महाप्रभु कैसे निजगण लञा। भोजन कराइल सबाके आकण्ठ पूरिया ॥ ४२ ॥ अनुवाद—तब महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ भोजन करनेके लिये बैठ गये और उन्होंने सभी भक्तोंको कण्ठ तक भरकर भोजन कराया॥ ४२ ॥ भोजनके बाद आचमन, बहुत लोगोंको भी अतिरिक्त प्रसादकी प्राप्ति :- भोजन करि' बसिला प्रभु करि' आचमन। प्रसाद उबरिल, खाय सहस्रेक जन ॥ ४३ ॥ दीन-दुःखी-कङ्गालोंको महाप्रभुकी कृपासे प्रसाद-प्राप्ति :- प्रभुर आज्ञाय गोविन्द दीन-हीन जने। दुःखी काङ्गाल आनि' कराय भोजने ॥ ४४ ॥ अनुवाद—भोजन करनेके पश्चात् महाप्रभु आचमन करके बैठ गये। तब उन्होंने देखा कि इतना प्रसाद बच गया है कि अभी और हजारों व्यक्ति भोजन कर सकते हैं। महाप्रभुकी आज्ञासे श्रीगोविन्दने दीन-हीन, दुःखी तथा दरिद्र लोगोंको बुलाकर उन्हें भोजन कराया॥ ४३-४४॥ अनुभाष्य—'उवरिल'—अतिरिक्त (अधिक) हुआ॥ ४३॥ गौरहरिके द्वारा कङ्गालोंको भोजन करते हुए देखना और हरिकीर्त्तन करनेका उपदेश :- काङ्गालेर भोजन-रङ्ग देखे गौरहरि। 'हरिबोल' बलि' तारे उपदेश करि ॥ ४५ ॥ काङ्गालोंको हरिभक्तिकी प्राप्ति :- 'हरिबोल' बलि' काङ्गाल प्रेमे भासि' याय। ऐछन अद्भुत लीला करे गौरराय ॥ ४६ ॥ अनुवाद—श्रीगौरहरिने दरिद्रोंको भोजन करते देखकर उन्हें 'हरिबोल' बोलनेका उपदेश दिया। 'हरिबोल' बोलकर दरिद्र व्यक्ति भी प्रेममें डूबे जा रहे थे। श्रीगौरराय ऐसी अद्भुत लीला करते हैं॥ ४५-४६॥ रथ-सञ्चालनमें गौड़ोंका असामर्थ्य :- इँहा जगन्नाथेर रथ-चलन-समय। गौड़ सब रथ टाने, आगे नाहि याय ॥ ४७ ॥ सपरिकर राजाकी व्यग्र भावसे उपस्थिति :- टानिते ना पारे गौड़, रथ छाड़ि' दिल। पात्र-मित्र लञा राजा व्यग्र हञा आइल ॥ ४८ ॥ अनुवाद—इधर जब श्रीजगन्नाथके रथके चलनेका समय हुआ, तब सब गौड़ोंने रथ खींचना आरम्भ किया, परन्तु रथ आगे नहीं चला। गौड़ लोग जब रथको चला नहीं पाये, तो उन्होंने प्रयास करना छोड़ दिया। तब अपने सेवकों और मित्रोंके साथ राजा व्याकुल होकर आये ॥ ४७-४८ ॥ 534 ।