भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1377

चौदहवाँ अध्याय 14/23-38 ] मौसमी, आम आदिके वृक्षके आकारकी फूल-फल-पत्तॉसे 'चन्द्रकान्ति' - उड़दकी दालकी बनी चन्द्राकारकी फुलबड़ी। युक्त चीनीसे बनी मिठाइयाँ (खिलौने) भी थीं। दही, 'वियरि' - विरण धानके चावलको भूनकर बनाये गये दूध, माखन, छाछ, शिकञ्जी, शिखरिणी (दही, चीनी, मिठाईके टुकड़े। 'कद्मा'-चावलोंको पीसकर चीनीके शहद, कर्पूर आदिके मिश्रणसे बनी), अदरकके टुकड़ोंके रसमें बनायी गयी बहुत कठोर अति प्रसिद्ध मिठाई। साथ अङ्कुरित मूँगकी नमकीन दाल भी थी। नींबू तथा 'तिलेखाजा'-खाजाके साथ घीमें भूने हुए तिलसे बनी बेर आदिसे बने अनेक प्रकारके आचार थे। भगवान् मिठाई। 'तक्र'-छाछ। 'रसाला'-शरबत, पाना। श्रीजगन्नाथको कितनी प्रकारका भोग लगा था, मैं उसका 'खानि-खानि'-छोटे-छोटे टुकड़े। नींबूका आचार और वर्णन नहीं कर सकता ॥ 23-34 ॥ बेरका आचार; पूर्वबङ्गालमें चलती भाषामें 'नींबू'को अमृतप्रवाह भाष्य- 'नि-सकड़ि'-दही, दूध, फल, लेम्बू कहते है ॥ 26-34 ॥ मूल आदि जो पकाया नहीं गया है। प्रसादके पात्रोंसे बहुतसे स्थानका घिर जाना :- 'पैड़'-डाब (हरा नारियल); (पाठान्तरमें, 'पैरा'- प्रसादे पूरित हइल अर्द्ध उपवन। खजूर और ताड़के रससे बना शीरा।) देखिया सन्तोष हैल महाप्रभुर मन ॥ 35 ॥ चीनीसे बनाया गये 'नारङ्गी', 'मौसमी', 'कीनू', जगन्नाथकी तृप्तिके स्मरणसे महाप्रभुको हर्ष :- 'संतरा' आदि नींबूजातीय फल और आमके वृक्षके एइमत जगन्नाथ करेन भोजन। आकारकी मिठाई (खिलौने) ॥ 25-32 ॥ एइ सुखे महाप्रभुर जुड़ाय नयन ॥ 36 ॥ अनुभाष्य-ग्रन्थकारका कृष्ण-नैवेद्यका विचित्रता- केयापत्र-द्रोणी आइल बोझा पाँच-सात। विषयक ज्ञान प्रकाशित हो रहा है- एक एक जने दश दोना दिल, -एत पात ॥ 37 ॥ 'बीजताल'-कच्चे ताल का फल। संतरा आदि अनुवाद-आधा उपवन प्रसादके पात्रोंसे ही भर सभी नींबूजातिके फल हैं। 'बीजपूर'-अनार अथवा गया, जिसे देखकर महाप्रभुके मनमें बहुत सन्तोष गलगल (?)। 'छोहारा'-छुआरा (सूखी खजूर)। हुआ। श्रीजगन्नाथने इतनी मात्रामें ऐसे स्वादिष्ट व्यञ्जनोंका 'द्राक्षा'-अंगूर। 'मनोहरा'-एक विशेष प्रकारकी बनी भोजन किया है, इस सुखमें ही महाप्रभुके नेत्र शीतल मिठाई, जिसे संदेश कहते हैं। 'क्षीरसा'-पूर्व बङ्गालमें हो रहे थे। पाँच-सात बोरियाँ भरकर केतकी वृक्षके चलती भाषामें 'क्षीर अर्थात् दूध' को ही क्षीरसा कहते पत्ते और दोने आये। एक-एक भक्तके आगे दस-दस हैं। पाठान्तरमें 'अमृतभण्डा'-पपीता; 'सरबती'-एक दोने और एक-एक पत्ता रखा गया ॥ 35-37 ॥ विशेष प्रकारका उत्कृष्ट नींबू। 'सरभाजा' और अनुभाष्य- 'केयापत्र-द्रोणी'-केतकी वृक्षके पत्तोंसे 'सरपुरी'-नदीया जिलेके कृष्णनगर अञ्चलमें विशेषरूपसे बना दोना ॥ 37 ॥ बनायी जानेवाली मिठाई। 'हरिवल्लभ'-घीमें बनायी कीर्त्तन करते-करते थक गये भक्तोंकी गयी विशेष प्रकारकी रोटी (?), 'सेंउति'-विशेष स्वयं भगवान्‌के द्वारा ही सेवा :- सुगन्धित पुष्प। 'कर्पूर'-विशेष पुष्प(?)। कीर्त्तनीयार परिश्रम जानि' गौरराय। 'डाल-मरिच-लाडु'-मूँगकी दालका लड्डू (?) ताँ-सबारे खाओयाइते प्रभुर मन धाय ॥ 38 ॥ 'नवात'-चीनीके रसमें पका विशेष मिष्ठान्न-द्रव्य। अनुवाद-कीर्त्तनकारी भक्तोंके परिश्रमको जानकर 'अमृति'-'जलेबी'-जातीय घीमें पकी मिठाई (इमरती) (पूर्व बङ्गालमें विशेष रूपसे बनती है)। । 533