श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1375, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौदहवाँ अध्याय [14/13-20 ] अनुभाष्य— रासक्रीड़ाके समय श्रीकृष्णके अचानक अन्तर्धान होनेपर कृष्णैकप्राणा (कृष्णमयी) गोपियाँ श्रीकृष्णके विरहमें अत्यन्त कातर होकर तन्मय चित्तसे रासक्रीड़ा-स्थलसे यमुनाके तटपर आकर इन सब गीतोंके द्वारा श्रीकृष्णका विविध गुणगान कर रही हैं— ये जनाः भुवि (संसारे) तप्तजीवनं (विरहतापक्लिष्टानां प्राणस्वरूपं) कविभिः (कृष्णरसविद्भिः) ईड़ितम् (आराधितं) कल्मषापहं (विरहज्वरदुःखविनाशकं) श्रवणमङ्गलं (कर्णरसायनं) श्रीमत् (सर्वशक्तिसमन्वितं) तव (हरेः) कथामृतं (सुधात्मकां कथाम्) आततं (विस्तृतं) गृणन्ति (कीर्त्तयन्ति), [ते एव जनाः] भूरिदाः (वदान्यवराः)। श्लोक-भावानुवाद— जो लोग संसारमें तुम्हारे विरहमें सन्तप्त व्यक्तियोंके जीवन-स्वरूप, कृष्णरसविद्-जनोंके द्वारा आराधित, विरहज्वरदुःखविनाशक, कर्णरसायन, सर्वशक्तियुक्त तुम्हारे कथामृतका सर्वत्र कीर्तन करते हैं, वे लोग ही श्रेष्ठ वदान्य (दाता) हैं॥13॥ अनजानेमें राजाका आलिङ्गन :- ‘भूरिदा’ ‘भूरिदा’ बलि’ करे आलिङ्गन। इँहो नाहि जाने, — इँहो हय कोन जन॥14॥ अनुवाद— महाप्रभु राजा प्रतापरुद्रको ‘भूरिदा’ ‘भूरिदा’ अर्थात् दानियोंमें सर्वोत्तम कहकर उनका आलिङ्गन करने लगे, परन्तु वे यह नहीं जानते थे कि ये कौन हैं॥14॥ अनुभाष्य— पहलेवाले ‘इँहॉ’—शब्दसे महाप्रभुको तथा बादवाले ‘इँहौ’—शब्दसे राजा प्रतापरुद्रको समझना चाहिए॥14॥ राजाकी पूर्व-सेवाको देखनेसे महाप्रभुकी कृपा :- पूर्व-सेवा देखि’ ताँरे कृपा उपजिल। अनुसन्धान बिना कृपा-प्रसाद करिल॥15॥ चैतन्यकी कृपामें अधिकार-विचार अथवा कारण नहीं :- एइ देख, चैतन्येर कृपा-महाबल। तार अनुसन्धान बिना कराय सफल॥16॥ अनुवाद— राजा प्रतापरुद्रकी (श्रीजगन्नाथके रथके आगे झाडू लगानेकी) पूर्व-सेवाको देखकर महाप्रभुकी उनके प्रति कृपा उत्पन्न हुई थी। इसलिये अब बिना पूछे कि वे कौन हैं, उन्होंने राजाको कृपा-प्रसाद प्रदान किया। महाप्रभुकी कृपाका महाबल देखो, राजाके बारेमें बिना पूछे ही उनका जीवन सफल कर दिया॥15-16॥ प्रेमावेशमें राजाके परिचयकी जिज्ञासा :- प्रभु बोले,—“के तुमि, करिला मोर हित? आचम्बिते आसिं’ पियाउ कृष्णलीलामृत?” 17॥ राजाका ‘कृष्णदासानुदास’ कहकर अपना परिचय देना :- राजा कहे,—“आमि तोमार दासेर दास। भृत्येरे भृत्य कर, — एइ मोर आश॥” 18॥ अनुवाद— अन्तमें महाप्रभुने पूछा, —“तुम कौन हो जो मेरा इतना हित कर रहे हो? अचानक आकर मुझे कृष्णलीलामृतका पान करा रहे हो?” राजा प्रतापरुद्रने कहा— “मैं आपके दासोंका दास हूँ। मेरी यही अभिलाषा है कि आप मुझे अपने दासोंके दासरूपमें स्वीकार कीजिये॥” 17-18॥ महाप्रभुके द्वारा राजाको अपना ऐश्वर्य दिखाना :- तबे महाप्रभु ताँरे ऐश्वर्य देखाइल। ‘कारेह ना कहिबे’ एइ निषेध करिल॥19॥ अनुवाद— तब महाप्रभुने राजाको अपना कुछ ऐश्वर्य दिखलाया और ‘इसे किसीसे मत कहना’ कहकर उन्हें निषेध किया॥19॥ सर्वान्तर्यामी महाप्रभुका बाह्य-दशामें भावावेशमें राजाके दर्शनकी घटना अप्रकाशित :- ‘राजा’—हेन ज्ञान कभु ना कैल प्रकाश। अन्तरे सकल जानेन, बाहिरे उदास॥20॥ अनुवाद— महाप्रभु भीतरसे सब कुछ जानते थे कि क्या हो रहा है, बाहरसे उसे प्रकाश नहीं किया। उन्होंने यह भी प्रकट नहीं किया कि वे राजा प्रतापरुद्रसे बात कर रहे थे॥20॥ । 531