भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1374

[ 14/5-13 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला दीन वैष्णव-वेशमें सभी वैष्णवोंकी आज्ञा लेकर बन्द नेत्रोंसे महाप्रभुका पाद-सम्वहन :- सार्वभौम-उपदेशे छाड़ि' राजवेश। एकला वैष्णव-वेशे करिल प्रवेश॥5॥ सब-भक्तेर आज्ञा निल जोड़-हात हञा। प्रभु-पद धरि' पड़े साहस करिया॥6॥ आँखि मुदि' प्रेमे प्रभु भूमिते शयान। नृपति नैपुण्ये करे पाद-सम्वहान॥7॥ राजाके द्वारा गोपीगीतका पाठ :- रासलीलार श्लोक पड़ि' करेन स्तवन। “जयति तेऽधिकं” अध्याय करेन पठन॥8॥ अनुवाद-श्रीसार्वभौमके उपदेशानुसार राजा प्रतापरुद्रने राजवेशको छोड़कर वैष्णववेशमें अकेले पुष्पोद्यानमें प्रवेश किया। राजाने पहले सभी भक्तोंसे हाथ जोड़कर आज्ञा ली। तब राजाने बहुत साहस करके महाप्रभुके श्रीचरणोंको पकड़ लिया। महाप्रभु प्रेमावेशमें आँखें मूँदकर भूमिपर लेटे हुए थे और राजा बड़ी निपुणतासे उनके चरणोंको दबाने लगे तथा साथ ही श्रीमद्भागवतमें वर्णित रासलीलाके श्लोकोंका पाठ करने लगे। उन्होंने “जयति तेऽधिकं” श्लोकसे आरम्भ होनेवाले अध्यायका पाठ आरम्भ किया॥5-8॥ अमृतप्रवाह भाष्य-“जयति तेऽधिकं” अध्याय- रासपञ्चध्यायके बीचमें “गोपीगीत”-दशम स्कन्धमें 31वाँ अध्याय॥8॥ महाप्रभुका सन्तोष और सुननेका आग्रह :- शुनिते शुनिते प्रभुर सन्तोष अपार। 'बल, बल' बलि' प्रभु बले बार बार॥9॥ प्रेमाविष्ट महाप्रभुका राजाको आलिङ्गन :- 'तब कथामृतं' श्लोक राजा ये पड़िल। उठि' प्रभु प्रेमावेशे आलिङ्गन कैल॥10॥ स्वयंको प्रचुर लाभान्वित जानकर राजाके प्रति कृतज्ञता :- “तुमि मोरे दिले बहु अमूल्य रतन। मोर किछु दिते नाहि, दिलुँ आलिङ्गन॥”11॥ अनुवाद-सुनते-सुनते महाप्रभुको अपार सन्तोष हुआ और वे बार-बार 'बोलो बोलो' कहने लगे। जैसे ही राजा प्रतापरुद्रने 'तव कथामृतं' श्लोक पढ़ा, तभी महाप्रभुने उठकर प्रेमावेशमें उनका आलिङ्गन किया और कहा,-“तुमने मुझे बहुत अमूल्य रत्न दिये हैं, परन्तु इसके बदलेमें मेरे पास तुम्हें देनेके लिये कुछ नहीं है, इसलिये मैं तुम्हें आलिङ्गन ही दे सकता हूँ॥”9-11॥ दोनोंमें अश्रु और कम्प :- एत बलि' सेइ श्लोक पड़े बार बार। दुइजनार अङ्गे कम्प, नेत्रे जलधार॥12॥ अनुवाद-इतना कहकर महाप्रभु उस श्लोकको बार-बार पढ़ने लगे। महाप्रभु और राजा प्रतापरुद्र, दोनोंके अङ्ग काँपने लगे तथा उनके नेत्रोंसे अश्रुओंकी धारा बहने लगी॥12॥ भगवत्कथामृत वितरण करनेवाला ही सर्वश्रेष्ठ दाता :- (श्रीमद्भागवत 10/31/9)- तव कथामृतं तप्तजीवनं, कविभिरीड़ितं कल्मषापहम्। श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः॥13॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥13॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे प्रिय, बहुत जन्मोंमें बहु-सुकृतिकारी व्यक्ति जगत्में आकर, तुम्हारे प्रेममें सन्तप्त व्यक्तियोंके जीवन-स्वरूप, कवियोंके सङ्गीत, कल्मषका नाश करनेवाले, श्रवणमात्रसे मङ्गल करनेवाले, सर्वोत्कृष्ट, सर्वव्यापक तुम्हारे कथामृतका गान करते हैं॥13॥ 530 ।