श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1373, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौदहवाँ अध्याय कथासार—बलगाण्डि-उद्यानमें महाप्रभु प्रेमावेशमें थे, तब राजा प्रतापरुद्रदेव अकेले वैष्णव वेश धारण करके वहाँ आये और भागवतके श्लोकोंका पाठ करते-करते महाप्रभुके चरणोंको दबाने लगे। प्रेमावेशमें महाप्रभुने उनका आलिङ्गन करके कृपा की। भक्तोंके साथ महाप्रभुने बलगाण्डि-भोगके प्रसादकी सेवा की। उसके बाद रथके न चलनेपर, राजाने अनेक मतवाले हाथियोंको लगाया, परन्तु वे भी रथको नहीं चला पाये। तब महाप्रभुने स्वयं अपने सिरसे रथको धकेलकर उसे चलाया और फिर भक्तगण उस समय रस्सी खींचने लगे। गुण्डिचाके निकट आइटोटामें महाप्रभुका विश्राम स्थान हुआ। श्रीजगन्नाथके सुन्दराचलमें वास करनेपर महाप्रभुको वृन्दावनकी लीलाओंकी स्फूर्ति हो आई। इन्द्रद्युम्न सरोवरमें महाप्रभुकी अपने भक्तों सहित जल-क्रीड़ा हुई। नवरात्र-यात्रामें महाप्रभु जगन्नाथ-वल्लभ उद्यानमें रहे और पञ्चमीके दिन 'हेरा-पञ्चमी' लीलाके दर्शनमें (महाप्रभुका श्रीस्वरूप दामोदरके साथ) लक्ष्मी और गोपियोंके स्वभावको लेकर अनेक वार्तालाप हुआ था। श्रीस्वरूपके मुखसे राधिकाके भावोंकी सर्वोत्कर्षताके विषयमें सुनकर महाप्रभुको परमानन्द हुआ। पुनर्यात्राके समय कीर्त्तनादि होनेके बाद कुलीनग्रामवासी श्रीराम force वसु और सत्यराज खाँको प्रत्येक वर्ष (श्रीजगन्नाथके रथके लिये) रेशमी डोरी' लानेके लिये श्रीमन्महाप्रभुने आज्ञा दी। —(अमृतप्रवाह भाष्य) 'हेरा-पञ्चमी'के दर्शनमें नृत्य करते हुए श्रीगौरसुन्दर :— गौरः पश्यन्नात्मवृन्दैः श्रीलक्ष्मीविजयोत्सवम्। श्रुत्वा गोपीरसोल्लासं हृष्टः प्रेम्णा ननर्त्त सः॥1॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अपने भक्तों सहित लक्ष्मीदेवीके विजयोत्सवका दर्शन करके और गोपियोंका रासोल्लास श्रवण करके प्रसन्नचित्त होकर श्रीगौरचन्द्रने नृत्य किया था॥1॥ अनुभाष्य— सः गौरः आत्मवृन्दैः (स्वपार्षदगणैः) श्रीलक्ष्मी-विजयोत्सवं पश्यन् गोपीरसोल्लासं (गोपीनां पारकीयरसातिशयं) श्रुत्वा हृष्टः सन् प्रेम्णा (परमया प्रीतया) ननर्त्त। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ जय जय गौरचन्द्र श्रीकृष्णचैतन्य। जय जय नित्यानन्द जयाद्वैत धन्य॥2॥ जय जय श्रीवासादि गौड़ेर भक्तगण। जय श्रोतागण,—याँर गौर प्राणधन॥3॥ अनुवाद—श्रीगौरचन्द्र श्रीकृष्णचैतन्यकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो और धन्य श्रीअद्वैताचार्य प्रभुकी जय हो। श्रीवासादि गौड़-भक्तोंकी जय हो, जय हो तथा ग्रन्थके श्रोताओंकी जय हो, श्रीगौरचन्द्र जिनके प्राणधन हैं॥2-3॥ महाप्रभुके विश्रामके समय राजाका प्रवेश :— एइमत प्रभु आछेन प्रेमेर आवेशे। हेनकाले प्रतापरुद्र करिल प्रवेशे॥4॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु प्रेमके आवेशमें जब विश्राम कर रहे थे, उस समय राजा प्रतापरुद्रने पुष्पोद्यानमें प्रवेश किया॥4॥ । 529