श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1383, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौदहवाँ अध्याय 14/86-96 ] तर्कपन्थी श्रीसार्वभौमकी खली खानेवाले 'कोल्हूके बैल'के साथ तुलना की है॥ 86-87॥ तैरते हुए श्रीअद्वैतकी 'शेष' और महाप्रभुकी 'शेषशायी'-लीलाका प्रकाश :- हासि' महाप्रभु तबे अद्वैते आनिल। जलेर उपरे ताँरे शेष-शय्या कैल ॥ 88 ॥ आपने ताँहार उपर करिल शयन। 'शेषशायी-लीला' प्रभु कैल प्रकटन ॥ 89 ॥ अद्वैत निज-शक्ति प्रकट करिया। महाप्रभु लञा बुले जलेते भासिया ॥ 90 ॥ भक्तोंके साथ महाप्रभुका आइटोटामें आगमन :- एइमत जलक्रीड़ा करि' कतक्षण। आइटोटा आइला प्रभु लञा भक्तगण ॥ 91 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने मुस्कुराते हुए श्रीअद्वैताचार्यको बुलाया और उन्हें जलके ऊपर तैरती शेष-शय्याकी भाँति बना दिया। फिर महाप्रभुने स्वयं उनके ऊपर लेटकर अपनी 'शेषशायी-लीला'को प्रकाशित किया। श्रीअद्वैताचार्य अपनी शक्तिको प्रकट करके महाप्रभुको अपने ऊपर लेकर जलमें तैरते हुए भ्रमण करने लगे। इस प्रकार कुछ समय तक जलक्रीड़ा करनेके बाद महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ आइटोटामें आये॥ 88-91 ॥ मुख्यभक्तोंके द्वारा आचार्यका निमन्त्रण स्वीकार :- पुरी, भारती आदि यत मुख्य भक्तगण। आचार्येर निमन्त्रणे करिला भोजन ॥ 92 ॥ अनुवाद—श्रीपरमानन्द पुरी, श्रीब्रह्मानन्द भारती आदि मुख्य-मुख्य भक्तोंने श्रीअद्वैताचार्यका निमन्त्रण स्वीकार करके भोजन ग्रहण किया॥ 92 ॥ महाप्रभुके भक्तोंके द्वारा श्रीवाणीनाथके द्वारा लाया हुआ प्रसाद ग्रहण :- वाणीनाथ आर यत प्रसाद आनिल। महाप्रभुर गणे सेइ प्रसाद खाइल ॥ 93 ॥ अनुवाद—श्रीवाणीनाथ और जितना प्रसाद लाये, महाप्रभुके अन्य भक्तोंने उसे ग्रहण किया॥ 93 ॥ अपराह्नमें दर्शन और नृत्य, रातमें उपवनमें निद्रा :- अपराह्ने आसि' कैल दर्शन, नर्त्तन। निशाते उद्याने आसि' करिला शयन ॥ 94 ॥ अनुवाद—अपराह्न-कालमें महाप्रभुने गुण्डिचा मन्दिरमें श्रीजगन्नाथके दर्शन करके नृत्य किया और रातमें उद्यानमें आकर शयन किया॥ 94 ॥ अन्य दिन भगवान्का दर्शन और मन्दिरके प्राङ्गणमें नृत्य-गीत :- आर दिन आसि' कैल ईश्वर-दरशन। प्राङ्गणे नृत्य-गीत कैल कतक्षण ॥ 95 ॥ अनुवाद—अगले दिन भी महाप्रभुने गुण्डिचा मन्दिरमें आकर श्रीजगन्नाथका दर्शन किया और प्राङ्गणमें कुछ समय तक नृत्य-गीत आदि किया॥ 95 ॥ भक्तोंके साथ उद्यानमें व्रज-विहार :- भक्तगण-सङ्गे प्रभु उद्याने आसिया। वृन्दावन-विहार करे भक्तगण लञा ॥ 96 ॥ अनुवाद—उसके बाद महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ उद्यानमें आ गये और उनके साथ वृन्दावन-विहार लीला करने लगे॥ 96 ॥ अनुभाष्य—महाप्रभुने यहाँ वृन्दावन-विहार आरम्भ किया, परन्तु यह श्रीकृष्णकी भाँति उनकी 'पारकीय'-रसमें परस्त्रियोंके साथ विहाररूपी भोक्ताकी लीला नहीं है। स्वयंको श्रीराधाकी दासी समझकर और उनकी सेव्या आश्रय-विग्रह श्रीराधा अपने प्रियतम श्रीकृष्णके मिलनमें आनन्द-सागरमें निमग्न हैं—इस रसमें मत्त अवस्थामें ही महाप्रभुकी भक्तोंके साथ 'वृन्दावन-विहार' लीला हुई थी; (इसी अध्यायकी 74, 75 संख्या देखें)। इसलिये 'गौरनागरी-वाद'का यहाँ कोई भी प्रयोजन नहीं है॥ 96 ॥ । 539