श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1384, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 14/97–106 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला महाप्रभुके दर्शनसे चारों ओर हर्षका लक्षण :– वृक्षवल्ली प्रफुल्लित प्रभुर दरशने। भृङ्ग, पिक गाय, बहे शीतल पवने ॥ 97 ॥ महाप्रभुका नृत्य, श्रीवासुदेव-दत्तका कीर्तन :– प्रति-वृक्षतले प्रभु करेन नर्त्तन। वासुदेव-दत्त मात्र करेन गायन ॥ 98 ॥ प्रत्येक वृक्षके नीचे नृत्य करनेवाले महाप्रभु :– एक एक वृक्षतले एक एक गान गाय। परम-आवेशे एका नाचे गौरराय ॥ 99 ॥ नृत्यके अन्तमें श्रीवक्रेश्वरको नाचनेका आदेश :– तबे वक्रेश्वरे प्रभु कहिला नाचिते। वक्रेश्वर नाचे, प्रभु लागिला गाइते ॥ 100 ॥ महाप्रभुके साथ श्रीस्वरूप आदि भक्तोंका गान, सभीमें प्रेम-विह्वलता :– प्रभु-सङ्गे स्वरूपादि कीर्त्तनीया गाय। दिक्विदिक़ नाहि ज्ञान प्रेमेर वन्याय ॥ 101 ॥ अनुवाद—महाप्रभुका दर्शन करके वहाँके वृक्ष और लताएँ प्रफुल्लित हो गये, भ्रमर और कोयल गान करने लगे तथा शीतल पवन बहने लगी। महाप्रभु प्रत्येक वृक्षके नीचे नृत्य करने लगे और एक मात्र श्रीवासुदेव-दत्त ही गान कर रहे थे। श्रीवासुदेव-दत्त एक-एक वृक्षके नीचे एक-एक गीतका गान कर रहे थे और परमावेशमें महाप्रभु उनके साथ अकेले ही नृत्य कर रहे थे। तब महाप्रभुने श्रीवक्रेश्वर पण्डितसे नृत्य करनेके लिये कहा। श्रीवक्रेश्वर पण्डितने जैसे नृत्य आरम्भ किया, तभी महाप्रभु स्वयं गाने लगे। तब श्रीस्वरूप दामोदर और अन्य कीर्त्तनीया भी महाप्रभुके साथ गाने लगे। प्रेमकी बाढ़में सब इतना डूब गये कि उन्हें समय और परिस्थितिका भी ज्ञान नहीं रहा॥ 97-101 ॥ वनलीलाके अन्तमें नरेन्द्र-सरोवरमें जलकेलि :– एइ मत कतक्षण करि' वन-लीला। नरेन्द्र-सरोवरे गेला करिते जलखेला ॥ 102 ॥ अनुवाद—इस प्रकार कुछ समय तक वनलीला करनेके बाद सभी नरेन्द्र सरोवर गये और उसमें जल-क्रीड़ाका आनन्द लिया ॥ 102 ॥ स्नानके बाद उद्यानमें भक्तोंके साथ प्रसाद-सम्मान :– जलक्रीड़ा करि' पुनः आइला उद्याने। भोजनलीला कैला प्रभु लञा भक्तगणे ॥ 103 ॥ अनुवाद—जल-क्रीड़ाके बाद महाप्रभु पुनः उद्यानमें आ गये और वहाँ उन्होंने भक्तोंके साथ भोजनलीला की ॥ 103 ॥ गुण्डिचामें श्रीजगन्नाथके नौ दिनों तक रहनेके समय इस प्रकारकी लीलाएँ हुईं :– नव दिन गुण्डिचাতে रहे जगन्नाथ। महाप्रभु ऐछे लीला करे भक्त-साथ ॥ 104 ॥ अनुवाद—श्रीजगन्नाथ नौ दिनों तक श्रीगुण्डिचा मन्दिरमें रहे, उस कालमें महाप्रभुने अपने भक्तोंके साथ इस प्रकारकी लीलाएँ कीं ॥ 104 ॥ जगन्नाथवल्लभमें महाप्रभुकी विश्राम-लीला :– 'जगन्नाथ-वल्लभ'-नाम बड़ पुष्पाराम। नव दिन करेन प्रभु ताहाते विश्राम ॥ 105 ॥ अनुवाद—'जगन्नाथ-वल्लभ'-नामक एक बड़ी पुष्प-वाटिका में ही महाप्रभुने उन नौ दिनों तक विश्राम किया ॥ 105 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'जगन्नाथ-वल्लभ'—गुण्डिचा मन्दिर और जगन्नाथ मन्दिरके प्रायः मध्यमें ही 'जगन्नाथ-वल्लभ' नामक एक उद्यान है। इस उद्यान में 'दना'-चोरीलीला होती है अर्थात् श्रीमदनमोहन जाकर दना-नामक सुगन्धित वृक्ष चोरी करके लाते हैं ॥ 105 ॥ अनुभाष्य—'पुष्पाराम'—पुष्पवाटिका ॥ 105 ॥ हेरापञ्चमी-उत्सवके विपुल आयोजनके लिये राजाका काशीमिश्रसे अनुरोध :– 'हेरा-पञ्चमी'र दिन आइल जानिया। काशीमिश्रे कहे राजा सयत्न करिया ॥ 106 ॥ 540 ।