भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1385

चौदहवाँ अध्याय 14/106-115 ] “कल्य 'हेरा-पञ्चमी', हबे लक्ष्मीर विजय। ऐछे उत्सव कर, येन कभु नाहि हय ॥107॥ अनुवाद—'हेरा-पञ्चमी' अगले दिन ही है, ऐसा जानकर राजा प्रतापरुद्रने श्रीकाशीमिश्रको ध्यानपूर्वक कहा,—“कल हेरा-पञ्चमी अथवा लक्ष्मी विजय है। इस उपलक्ष्यमें ऐसा उत्सव करो, जैसा पहले कभी न हुआ हो॥106-107॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'हेरा-पञ्चमीर दिन'—रथ यात्राके बाद पाँचवें दिनको 'हेरा-पञ्चमी' कहते हैं। लक्ष्मीदेवी श्रीजगन्नाथको ढूँढ़ते हुए गुण्डिचामें जाकर श्रीजगन्नाथको हेरकर (देखकर) आती हैं, इसलिये उड़ीसावासी लोग इस दिनको 'हेरा-पञ्चमी' कहते हैं। इस दिन लक्ष्मी श्रीजगन्नाथको खोई हुई वस्तुकी भाँति ढूँढ़ने जाती है, इसलिये 'अतिबाड़ी' लोग इसे 'हारापञ्चमी' कहते हैं। जो हो, कविराज गोस्वामीने इस पञ्चमीको 'हेरा-पञ्चमी' कहकर ही लिखा है॥106॥ महाप्रभुकी सन्तुष्टिके लिये महोत्सवके आयोजनका आदेश :— महोत्सव कर तैछे विशेष सम्भार। देखि' महाप्रभुर यैछे हय चमत्कार ॥108॥ सुचारू रूपसे सजानेका आदेश :— ठाकुरेर भाण्डारे आर आमार भाण्डारे। चित्रवस्त्र किङ्किणी, आर छत्र-चामरे॥109॥ ध्वजावृन्द-पताका-घन्टाय करह मण्डन। नानावाद्य-नृत्य-दोलाय करह साजन॥110॥ अनुवाद—विशेष आयोजन करके ऐसा महोत्सव करो, जिसे देखकर महाप्रभु आश्चर्यचकित हो जाँय। ठाकुर श्रीजगन्नाथके भण्डार और मेरे भण्डारमें जितने भी रङ्ग-बिरङ्गे वस्त्र, किङ्किणी, छत्र, चामर, ध्वजा, पताका, घण्टा आदि हैं, उन्हें एकत्रित करके पालकीको सजाओ। अनेक प्रकारके वाद्य-यन्त्रों तथा नर्त्तकोंको बुलाकर यात्राकी शोभाको बढ़ाओ॥108-110॥ अनुभाष्य—'चित्रवस्त्र'—रङ्गे हुए वस्त्र; 'किङ्किणी'—छोटी घण्टियाँ॥109॥ रथयात्राकी अपेक्षा बड़े समारोहके लिये आदेश :— द्विगुण करिया कर सब उपहार। रथयात्रा हैते यैछे हय चमत्कार ॥111॥ महाप्रभुके लिये दर्शनकी सुविधाका विधान :— सेइत' करिह,–प्रभु लञा भक्तगण। स्वच्छन्दे आसिया करे यैछे दरशन॥”112॥ अनुवाद—पहलेकी अपेक्षा इस बार दोगुना अधिक उपहारों और प्रसादका आयोजन करो, जिससे यह उत्सव रथ-यात्रासे भी बढ़-चढ़कर हो जाय। और ऐसी व्यवस्था करना जिससे महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ स्वतन्त्ररूपसे आकर उत्सवका दर्शन कर सकें॥”111-112॥ भक्तोंके साथ गुण्डिचामें जगन्नाथका दर्शन :— प्रातःकाले महाप्रभु निजगण लञा। जगन्नाथ-दर्शन कैल सुन्दराचले याञा॥113॥ अनुवाद—प्रातःकालमें महाप्रभु अपने भक्तोंको साथ लेकर श्रीजगन्नाथका दर्शन करने सुन्दराचल गये॥113॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'सुन्दराचल'—श्रीजगन्नाथ मन्दिरको जिस प्रकार 'नीलाचल' कहा जाता है, गुण्डिचा-मन्दिरको उसी प्रकार 'सुन्दराचल' कहते हैं॥113॥ हेरा-पञ्चमीके दर्शनके लिये पुनः नीलाचल आगमन :— नीलाचले आइला पुनः भक्तगण-सङ्गे। देखिते उत्कण्ठा हेरा-पञ्चमीर रङ्गे॥114॥ श्रीकाशीमिश्रके द्वारा महाप्रभुको उत्तम स्थानपर विराजमान करना :— काशीमिश्र प्रभुरे बहु आदर करिया। स्वगण-सह भालस्थाने बसाइल लञा॥115॥ अनुवाद—महाप्रभु हेरा पञ्चमीके उत्सवको देखनेकी उत्कण्ठासे अपने भक्तोंके साथ नीलाचल (श्रीजगन्नाथ मन्दिर) आये। श्रीकाशीमिश्रने बड़े आदरसे महाप्रभुको । 541