श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1386, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 14/114-126 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला उनके भक्तोंके साथ ऐसे स्थानपर बैठा दिया जहाँसे हेरा-पञ्चमीकी लीलाको देखनेमें उन्हें कोई भी असुविधा नहीं हो॥ 114-115 ॥ प्रकट करते हैं। वर्षमें एकबार मात्र उनकी वृन्दावन सदृश सुन्दराचलको देखनेके लिये अत्यधिक उत्कण्ठा होती है॥ 117-119 ॥ महाप्रभुकी श्रीस्वरूपसे श्रीजगन्नाथके द्वारा लक्ष्मीके सङ्गको छोड़कर वृन्दावन जानेके कारणकी जिज्ञासा :- रसविशेष प्रभुर शुनिते मन हैल। ईषत् हासिया प्रभु स्वरूपे पुछिल ॥ 116 ॥ “यद्यपि जगन्नाथ करेन द्वारकाय विहार। सहज प्रकट करे परम उदार ॥ 117 ॥ तथापि वत्सर-मध्ये हय एकबार। वृन्दावन देखिते ताँर उत्कण्ठा अपार ॥ 118 ॥ वृन्दावन-सम एइ उपवन-गण। ताहा देखिबारे उत्कण्ठित हय मन ॥ 119 ॥ बाहिर हइते करे रथयात्रा-छल। सुन्दराचले याय प्रभु छाड़ि' नीलाचल ॥ 120 ॥ नाना-पुष्पोद्याने तथा खेले रात्रि-दिने। लक्ष्मीदेवीरे सङ्गे नाहि लय कि कारणे?” ॥ 121 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा इसका कारण बतलाना-व्रजलीलामें गोपियोंका ही अधिकार और लक्ष्मीका अनधिकार :- स्वरूप कहे,—“शुन, प्रभु, कारण इहार। वृन्दावन-क्रीड़ाते लक्ष्मीर नाहि अधिकार ॥ 122 ॥ वृन्दावन-लीलाय कृष्णेर सहाय गोपीगण। गोपीगण बिना कृष्णेर हरिते नारे मन ॥” 123 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,—“प्रभो! इसका कारण सुनो। वृन्दावनकी लीलाओंमें लक्ष्मीका अधिकार नहीं है। वृन्दावनकी लीलाओंमें गोपियाँ ही श्रीकृष्णकी सहायक हैं। गोपियोंके अतिरिक्त कोई भी श्रीकृष्णके मनको नहीं हर सकता॥” 122-123 ॥ अनुभाष्य—वृन्दावन-लीलामें लक्ष्मी-ठाकुराणीका अधिकार नहीं होनेके कारण सुन्दराचल जाते समय श्रीजगन्नाथ लक्ष्मीको साथ नहीं ले जाते,—यही कारण है॥ 122 ॥ अनुवाद—महाप्रभुकी कुछ विशेष रसके विषयको सुननेकी इच्छा हुई और उन्होंने मन्द मुस्कुराते हुए श्रीस्वरूप दामोदरसे पूछा,—“यद्यपि श्रीजगन्नाथ द्वारकामें विहार करते हैं और सहज रूपमें ही परम उदारता प्रकट करते हैं, तथापि वर्षमें एक बार उनकी वृन्दावन देखनेकी तीव्र उत्कण्ठा होती है। यहाँके उपवन वृन्दावनके समान हैं, जिन्हें देखनेकी उनकी उत्कण्ठा होती है। बाहरसे वे रथ-यात्राका बहाना करते हैं, परन्तु वास्तवमें वे नीलाचलको छोड़कर सुन्दराचल जाना चाहते हैं। सुन्दराचलके पुष्प उद्यानोंमें वे दिन-रात लीला करते हैं, परन्तु किस कारणसे वे लक्ष्मीदेवीको अपने साथ नहीं ले जाते?” ॥ 116-121 ॥ महाप्रभुका पुनः प्रश्न-लक्ष्मीके क्रोधके कारणकी जिज्ञासा :- प्रभु कहे,—“यात्रा-छले कृष्णेर गमन। सुभद्रा आर बलदेव, सङ्गे दुइजन ॥ 124 ॥ गोपी-सङ्गे यत लीला हय उपवने। निगूढ़ कृष्णेर भाव केह नाहि जाने ॥ 125 ॥ अतएव कृष्णेर प्राकट्ये नाहि किछु दोष। तबे केने लक्ष्मीदेवी करे एत रोष?” ॥ 126 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने पुनः पूछा,—“रथ-यात्राके छलसे श्रीकृष्ण श्रीसुभद्रा तथा श्रीबलदेवको भी अपने साथ वहाँ ले जाते हैं। गोपियोंके साथ श्रीकृष्णकी उपवनमें जो लीलाएँ होती हैं, वे अति रहस्यमयी हैं, उन्हें कोई नहीं जानता है। इसलिये श्रीकृष्णकी लीलाओंमें कोई अनुभाष्य—श्रीजगन्नाथदेव जीवोंके प्रति करुण होकर नीलाचल मन्दिरमें बैठकर श्रीकृष्णके द्वारका-विहारको 542 ।