भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1387

चौदहवाँ अध्याय 14/124-134 ] भी दोष नहीं है, तो लक्ष्मीदेवी इतना क्रोध क्यों करती हैं?" 124-126 ॥ अनुभाष्य - 'यात्रा' - रथयात्रा । बृहद्भागवतामृतके प्रथम खण्डका सातवाँ अध्याय देखें ॥ 124-126 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा इसका कारण बताना- प्रियकी उदासीनतासे प्रियाका क्रोधाभिमान :- स्वरूप कहे, - "प्रेमवतीर एइ त' स्वभाव। कान्तेर उदास्य-लेशे हय क्रोधभाव ॥" 127 ॥ अनुवाद - श्रीस्वरूप दामोदरने कहा, - "प्रेमवतीका यही तो स्वभाव ही होता है कि कान्तकी लेशमात्र उदासीनतासे ही उसमें क्रोध उत्पन्न हो जाता है ॥" 127 ॥ विपुल समारोहमें बहुतसी दासियोंके साथ लक्ष्मीका आगमन :- हेनकाले, खचित याहे विविध रतन। सुवर्णेर चौदोला करि' आरोहण ॥ 128 ॥ छत्र-चामर-ध्वजा पताकार गण। नानावाद्य-आगे नाचे देवदासीगण ॥ 129 ॥ ताम्बुल-सम्पुट, झारी, व्यजन, चामर। साथे दासी शत, हार दिव्य भूषाम्बर ॥ 130 ॥ अनेक ऐश्वर्य सङ्गे बहु-परिवार। कृ अनुवाद-महाप्रभु और श्रीस्वरूप दामोदरका वार्त्तालाप चल ही रहा था, उसी समय विविध रत्नोंसे जड़ित सोनेकी पालकीपर बैठीं लक्ष्मीदेवीकी सवारी आयी। उनकी कुछ दासियाँ हाथोंमें छत्र, चामर, ध्वजा तथा पताकाएँ लेकर पालकीको चारों ओरसे घेरकर चल रही थीं। पालकीके आगे वादक अनेक प्रकारके वाद्ययन्त्र बजा रहे थे और देवदासियाँ नृत्य कर रही थीं। कुछ दासियाँ पानकी पेटिका, जलपात्र, पंखा, चामर लेकर चल रही थीं। उनके साथ हार तथा दिव्य परिधान धारण किये और सैंकड़ों दासियाँ थी। इस प्रकार लक्ष्मीदेवी क्रोधित होकर सिंहद्वारपर आयीं। उनके साथ उनके परिवारके अनेक सदस्य थे, उन सबका अपार ऐश्वर्य था ॥ 128-131 ॥ अनुभाष्य - 'सम्पुट' - पेटिका; 'झारी' - नलरहित जलपात्र ॥ 130 ॥ लक्ष्मीकी दासियोंके द्वारा श्रीजगन्नाथके प्रधान सेवकोंको बाँधकर ईश्वरीके पास लाना और प्रहार :- जगन्नाथेर मुख्य मुख्य यत भृत्यगणे। लक्ष्मीदेवीेर दासीगण करेन बन्धने ॥ 132 ॥ बान्धिया आनिया पाड़े लक्ष्मीर चरणे। चोरे दण्ड करे, येन लय नाना-धने ॥ 133 ॥ अचेतनवत् तारे करेन ताड़ने। नानामत गालि देन भण्ड-वचने ॥ 134 ॥ अनुवाद-जब लक्ष्मीदेवी सिंहद्वार पर पहुँचीं, तब उनकी दासियाँ श्रीजगन्नाथके मुख्य-मुख्य दासोंको बाँधने लगीं। उन्हें बाँधकर लक्ष्मीदेवीके चरणोंमें ऐसे पटक दिया जैसे चोरको बहुत धन चुरानेपर दण्ड दिया जाता है। लक्ष्मीदेवीके चरणोंमें गिरकर श्रीजगन्नाथके सेवक प्रायः मूर्च्छित हो गये। लक्ष्मीदेवीकी दासियाँ अनेक प्रकारके अश्लील वचनोंका व्यवहार करके उन्हें गालियाँ देने लगीं ॥ 132-134 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - श्रीजगन्नाथ जिस समय रथपर यात्रा करते हैं, उस समय लक्ष्मीको यह कहकर जाते हैं कि 'मैं कल ही लौट आऊँगा'। दो-तीन दिन बीत जानेपर भी श्रीजगन्नाथके न आनेपर, कान्तकी उदासीनताके लेशमात्रके दर्शनसे ही प्रेमवती लक्ष्मीदेवीमें स्वभावतः ही क्रोध उदित होता है। तब वे सज-धजकर पालकीमें विराजमान होकर अपनी सब दासियोंके साथ श्रीमन्दिरसे बाहर निकल पड़ती हैं। इसी समय, श्रीजगन्नाथके मन्दिरमें एक परम रहस्यमय घटना होती है, लक्ष्मीदेवीकी सेविकाएँ श्रीजगन्नाथके प्रधान-प्रधान सेवकोंको बाँधकर लाकर उनके चरणोंमें पटक देती हैं ॥ 132-133 ॥ । 543