श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 14/135-142 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला लक्ष्मीकी दासियोंकी उद्दण्डताको देख भक्तोंका हँसना :- लक्ष्मी-सङ्गे दासीगणेर प्रागल्भ्य देखिया। हासे महाप्रभुर गण मुखे हस्त दिया॥ 135॥ अनुवाद-लक्ष्मीदेवीकी दासियोंकी ढिठाईको देखकर महाप्रभुके भक्त मुँहपर हाथ रखकर हँसने लगे॥ 135॥ श्रीदामोदरके द्वारा लक्ष्मीदेवीके ऐसे अपूर्व असाधारण मानकी व्याख्या :- दामोदर कहे,-"ऐछे मानेर प्रकार। त्रिजगते काँहा देखि, शुनि नाइ आर ॥ 136 ॥ कान्तकी उदासीनतासे मानिनी कान्ताका आचरण :- मानिनी निरुत्साहे छाड़े विभूषण। भूमे बसि' नखे लेखे, मलिन-वदन ॥ 137 ॥ ब्रजगोपियों और सत्यभामाका मान भी इसी प्रकार :- पूर्वे सत्यभामार शुनि एवम्बिध मान। व्रजे गोपीगणेर मान-रसेर निधान ॥ 138 ॥ लक्ष्मीका मान उनसे भी विलक्षण :- इँहो निज-सम्पत्ति सब प्रकट करिया। प्रियेर उपर याय सैन्य साजाञा ॥"139॥ अनुवाद-तब श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,-“इस प्रकारका मान तो त्रिभुवनमें मैंने न कहीं देखा है और न सुना है। प्रायः मानिनी तो निरुत्साहित होकर अपने आभूषण उतार देती है और मलिन-मुख होकर वह भूमिपर बैठकर अपने नखोंसे लिखने लगती है। पूर्वकालमें श्रीसत्यभामाके इस प्रकारके मानके विषयमें मैंने सुना है और ब्रजमें गोपियोंका मान तो रसका भण्डार है। परन्तु लक्ष्मीके विषयमें तो मैं अलग प्रकारका मान देख रहा हूँ। वे तो अपना सारा ऐश्वर्य दिखाते हुए अपने सैन्य बलके साथ प्रियतम श्रीजगन्नाथके ऊपर आक्रमण करने जा रही हैं॥"136-139॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीस्वरूप गोस्वामीने लक्ष्मीकी ऐसी ढिठाईको देखकर ब्रजवासियोंकी प्रेम-सम्पत्तिके उत्कर्षको दिखलानेके लिये कहा,- 'प्रभो, लक्ष्मीके इस प्रकारके मानके विषयमें मैंने कभी भी त्रिजगत्में नहीं सुना है। प्रिया मानिनी होनेपर उत्साहहीन होकर भूषणादि परित्याग करके मलिन-मुखसे भूमिपर बैठकर नखसे कुछ-कुछ लिखती है। व्रजमें गोपियोंके इस प्रकारका मान और द्वारकापुरवासिनी सत्यभामाका भी ऐसा मान सुना गया है, किन्तु लक्ष्मीदेवीका मान उसके विपरीत देख रहा हूँ। ये अपने ऐश्वर्यको प्रकट करके सेना सजाकर प्रियके ऊपर आक्रमण करने जा रही हैं॥ 136-139॥ महाप्रभुके प्रश्नोंके उत्तरमें श्रीस्वरूपके द्वारा गोपियोंके मानका वर्णन :- प्रभु कहे,-"कह व्रजेर मानेर प्रकार।" स्वरूप कहे,-"गोपीमान-नदी शतधार ॥ 140 ॥ कान्ताके स्वभाव और प्रीतिके भेदसे मान-भेद :- नायिकार स्वभाव, प्रेमवृत्त्ये बहु भेद। सेइ भेदे नाना-प्रकार मानेर भेद ॥ 141 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "यह बतलाओ कि व्रजका मान कितने प्रकारका होता है।" श्रीस्वरूप दामोदरने उत्तर दिया, - "गोपियोंका मान तो सैकड़ों धाराओंवाली नदीके समान है। ब्रजमें नायिकाओंके स्वभाव और उनकी प्रेमकी वृत्तिके अनुसार बहुत भेद हैं और उस भेदके कारण उनमें उदित होनेवाले मानके भी अनेक भेद हैं॥ 140-141॥ अमृतप्रवाह भाष्य-नायिकाका स्वभाव और प्रेमवृत्ति- अनेक प्रकारके हैं, उसी भेदके अनुसार ही प्रत्येक नायिकाके (विभिन्न) मानका उदय होता है॥141॥ गोपियोंके अनिर्वचनीय मानका संक्षेपमें वर्णन :- सम्यक् गोपिकार मान ना याय कथन। एक-दुइ-भेदे करि दिग्-दरशन ॥ 142 ॥ अनुवाद-सम्पूर्ण रूपसे गोपियोंके मानका वर्णन तो नहीं किया जा सकता, तो भी एक-दो भेद बतलाकर उसका दिग्दर्शन करा रहा हूँ॥ 142 ॥ 544