श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1389, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौदहवाँ अध्याय 14/143–153 ] तीन प्रकारकी मानिनी :- माने केह हय 'धीरा', केह त' 'अधीरा'। एइ तिन-भेदे, केह हय 'धीराधीरा' ॥ 143 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 143 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मानिनीगण संक्षेपमें तीन भागोंमें विभक्त हैं—'धीरा', 'अधीरा' और 'धीराधीरा' ॥ 143 ॥ 'धीरा' मानिनीका स्वभाव :- 'धीरा' कान्ते दूरे देखि' करे प्रत्युत्थान। निकटे आसिते, करे आसन प्रदान ॥ 144 ॥ हृदये कोप, मुखे कहे मधुर वचन। प्रिय आलिङ्गिते, तारे करे आलिङ्गन ॥ 145 ॥ सरल व्यवहार, करे मानेर पोषण। किम्वा सौलुण्ठ-वाक्ये करे प्रिय-निरसन ॥ 146 ॥ अनुवाद—'धीरा'-मानिनी दूरसे कान्तको आते देखकर उसके स्वागतके लिये खड़ी हो जाती है और कान्तके निकट आनेपर उसे आसन प्रदान करती है। हृदयमें क्रोध होनेपर भी मुखसे मधुर वचन ही बोलती है। प्रियतमके आलिङ्गन करनेपर वह भी उसका आलिङ्गन करती है। वह कान्तके प्रति सरल व्यवहार करते हुए भी हृदयमें मानका पोषण करती है। अथवा बाहरसे परिहासयुक्त मृदु वचनों या व्याज-स्तुतिके द्वारा अपने प्रियतमकी निकट आनेकी चेष्टा आदिका निराकरण करती है ॥ 144-146 ॥ अनुभाष्य—'सौलुण्ठ वाक्य'—मन्दहास-परिहासयुक्त अथवा व्याज-स्तुति वाक्य; 'निरसन'—प्रतिवाद ॥ 146 ॥ 'अधीरा' मानिनीका स्वभाव :- 'अधीरा' निष्ठुर-वाक्ये करये भर्त्सन। कर्णोत्पले ताड़े, करे मालाय बन्धन ॥ 147 ॥ अनुवाद—'अधीरा' नायिका कभी निष्ठुर (कटु) वाक्योंके द्वारा अपने कान्तकी भर्त्सना करती है। कभी उसके कानोंको खींचती है और कभी मालाके द्वारा उसे बाँध भी देती है ॥ 147 ॥ 'धीराधीरा' मानिनीका स्वभाव :- 'धीराधीरा' वक्र-वाक्ये करे उपहास। कभु स्तुति, कभु निन्दा, कभु वा उदास ॥ 148 ॥ अनुवाद—'धीराधीरा' नायिका कभी वक्रोक्ति (कुटिल वचनों) के द्वारा कान्तका उपहास करती है, कभी स्तुति, कभी निन्दा और कभी उसके प्रति उदासीन हो जाती है ॥ 148 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 8/171 संख्या देखें; 'वक्र'—कुटिल, शठतापूर्ण ॥ 148 ॥ तीन प्रकारकी नायिकाएँ; मान-कौशलमें मुग्धाकी अनभिज्ञता :- 'मुग्धा', 'मध्या', 'प्रगल्भा',—तिन नायिकार भेद। 'मुग्धा' नाहि जाने मानेर वैदग्ध्य-विभेद ॥ 149 ॥ मुख आच्छादिया करे केवल रोदन। कान्तेर प्रियवाक्य शुनि' हय प्रसन्न ॥ 150 ॥ अनुवाद—नायिकाओंके तीन भेद हैं—'मुग्धा', 'मध्या' और 'प्रगल्भा'। 'मुग्धा' नायिका मानके चातुर्यकी गहराइयोंको नहीं जानती। वह मान करके मुँहको ढककर केवल रोती रहती है और कान्तके द्वारा कहे गये प्रियवचनोंको सुनकर ही प्रसन्न हो जाती है अर्थात् उसका मान दूर हो जाता है ॥ 149-150 ॥ अनुभाष्य—'वैदग्ध्य-विभेद'—अनेक प्रकारकी कुशलता ॥ 149 ॥ 'मध्य' और 'प्रगल्भा'का ही पूर्वोक्त धीरा, अधीरा और धीराधीरा-भेद; इसीमें श्रीकृष्णका सुख :- 'मध्या' 'प्रगल्भा' धरे धीरादि-विभेद। तार मध्ये सबार स्वभावे तिन भेद ॥ 151 ॥ केह 'प्रखरा', केह 'मृदु', केह हय 'समा'। स्व-स्वभावे कृष्णेर बाड़ाय प्रेम-सीमा ॥ 152 ॥ प्राखर्य्य, मार्द्दव, साम्य—स्वभाव निर्दोष। सेइ सेइ स्वभावे कृष्णे कराय सन्तोष ॥" 153 ॥ । 545