भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1390

[ 14/141-158 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

अनुवाद—'मध्या' और 'प्रगल्भा' नायिकाएँ धीरादिके भेदसे तीन प्रकारकी हैं। फिर इन सबके स्वभावमें भी तीन प्रकारके भेद हैं—कोई 'प्रखरा', कोई 'मृदु' और कोई 'समा' है। ये सब अपने स्वभावके अनुसार श्रीकृष्णके प्रेमको अन्तिम सीमा तक बढ़ाती हैं। यद्यपि कुछ गोपियाँ प्रखरा, कुछ मृदु और कुछ सम हैं, परन्तु तीनों प्रकारकी गोपियाँ अप्राकृत और निर्दोष हैं। वे अपने-अपने विशेष स्वभावसे श्रीकृष्णको सन्तुष्ट करती हैं॥ 151-153॥ अमृतप्रवाह भाष्य—नायिकाएँ तीन प्रकारकी हैं,— 'मुग्धा', 'मध्या' और 'प्रगल्भा'। मुग्धागण मान-चातुर्यका किसी प्रकारका भेद (रहस्य) नहीं जानतीं। जो सब नायिकाएँ,—'मध्या' और 'प्रगल्भा' हैं, वे ही धीरादिके भेदसे तीन प्रकारकी हैं॥ 149-151॥ अनुभाष्य—श्रीउज्ज्वलनीलमणिमें नायिका-भेद, यूथेश्वरी-भेद और सखी-भेद-प्रकरण देखें॥ 141-153॥ गोपियोंके नायिका-लक्षणोंको सुनकर महाप्रभुकी प्रसन्नता :— एकथा शुनिया प्रभुर आनन्द अपार। 'कह, कह, दामोदर',—बले बार बार॥ 154॥ अनुवाद—नायिकाओंके विषयमें सुनकर महाप्रभुको अपार आनन्द हुआ और वे बार-बार कहने लगे,—'दामोदर, और कहो, और कहो ॥ '154॥ श्रीस्वरूपके द्वारा श्रीकृष्ण और गोपियोंके परस्पर प्रेम-लक्षणका वर्णन :— दामोदर कहे,—“कृष्ण रसिकशेखर। रस-आस्वादक, रसमय-कलेवर॥ 155॥ प्रेममय-वपु कृष्ण—भक्त प्रेमाधीन। शुद्धप्रेमे, रसगुणे, गोपिका—प्रवीण॥ 156॥ गोपिकार प्रेमे नाहि रसाभास-दोष। अतएव कृष्णेर करे परम सन्तोष॥ 157॥

अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,—“श्रीकृष्ण रसिकशेखर हैं, वे सभी रसोंके आस्वादक हैं और उनका शरीर भी रसमय है। श्रीकृष्णका शरीर प्रेमके द्वारा गठित है और वे भक्तोंके प्रेमके अधीन हैं। गोपियोंका श्रीकृष्णके प्रति शुद्ध प्रेम है और उन्हें रसका आस्वादन करानेमें प्रवीण हैं। गोपियोंके प्रेममें रसाभास-दोष नहीं है, इसलिये वे श्रीकृष्णको परम सन्तोष प्रदान करती हैं॥ 155-157॥ अनुभाष्य—'रस-आस्वादक'—श्रीकृष्ण ही चिद्-रसके एकमात्र आस्वादक, भोक्ता अथवा विषय हैं, अन्य सभी उनके आश्रय अथवा भोग्य हैं। 'रसाभास'—भः रः सिः, उः विः, नौवीं लहरी,— 'पूर्वमेवानु रसा एव रसाभासा रसज्ञैरनुकीर्त्तिताः॥ स्युस्त्रिधोपरसाश्चानुरसाश्चापरसाश्च ते। उत्तमा मध्यमाः प्रोक्ताः कनिष्ठाश्चेत्यमी क्रमात्॥” पूर्वकथित रस-लक्षणसे विपर्ययता प्राप्त करनेपर उस लक्षणहीन रसको ही रसिकगण 'रसाभास' कहते हैं। रसाभास तीन प्रकारके हैं—उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ अर्थात् उपरस, अनुरस और अपरस्॥ 155-157॥ श्रीकृष्णकी चिन्मयी रासक्रीड़ा :— (श्रीमद्भागवत 10/33/25)— एवं शशाङ्कांशुविराजिता निशाः स सत्यकामोऽनुरताबलागणः। सिषेव आत्मन्यवरुद्ध-सौरतः सर्वाः शरत्काव्यकथारसाश्रयाः ॥ 158॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 158॥ अमृतप्रवाह भाष्य—इस प्रकारसे शरत्कालीन और काव्य-सम्बन्धीय समस्त कथाओंके रसाश्रय-रूप, अबलाओंके द्वारा अनुरत, चन्द्र-किरणोंसे सुशोभित उन सब रात्रियोंमें, चिन्मय-भावावरुद्ध सत्यकाम शृङ्गाररसमय पुरुष श्रीकृष्णने रासलीला की थी। तात्पर्य यह है,— सभी गोपियाँ शुद्ध चिन्मयी हैं, श्रीवृन्दावन शुद्ध

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