श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचिन्मयधाम है और वे आनन्दमय सभी रात्रियाँ भी चिन्मय रात्रियाँ हैं; जो रासलीला हुई थी, वह भी सम्पूर्ण रूपसे चिन्मय है; उसमें जड़ीय किसी भी क्रियाका स्पर्शमात्र भी नहीं हुआ। श्रीकृष्ण कभी भी जड़मयी रतिकी ओर देखते नहीं हैं। चिद्-जगत्में ही उनकी समस्त लीलाएँ अवरुद्ध हैं; उनकी कामक्रीड़ा-सब कुछ चिन्मय कार्य-मात्र है॥158॥ अनुभाष्य-शुद्ध हृदयवाले राजा परीक्षितको महाभागवत परमहंस-कुलचूड़ामणि श्रीशुकदेवके द्वारा गोपियोंके साथ श्रीकृष्णकी रासक्रीड़ाका वर्णन- एवं [कथितभावेन] सत्यकामः (नित्यसत्यसङ्कल्पः श्रीकृष्णः) अनुरताबलागणः (अनुरतः आकृष्टः अबलागणः यस्मिन् तादृशः अनुरागि-स्त्रीकदम्बस्थः इत्यर्थः) आत्मनि (एव) अवरुद्धसौरतः (अवरुद्धाः सौरताः सुरतव्यापाराः येन एवम्भूतः सः आत्मारामः अप्राकृत-कामदेवः इत्यर्थः) शरत्- काव्यकथारसाश्रयाः (शरदि भवाः काव्येषु कथ्यमाना ये रसास्तेषामाश्रयभूताः, यद्वा, शरत्कालोचितकाव्यकथारसाः तेषाम् आश्रयभूताः ताः, यद्वा, 'रसाश्रयाः शरत्काव्यकथाः' इत्यन्वये-शृङ्गार-रसाश्रयाः शरदि प्रसिद्धाः काव्येषु याः कथास्ताः) शशाङ्कांशुविराजिताः (शशाङ्कस्य अंशुभिः किरणैः विराजिताः शोभमानाः) सर्वाः एव निशाः सिषेवे (रासक्रीड़या यापयामास)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥158॥ गोपियोंमें नायिकोचित परम-चमत्कार- लक्षणमय गुण-वैचित्र्य :- 'वामा' एक गोपीगण, 'दक्षिणा' एक गण। नाना-भावे कराय कृष्णे रस आस्वादन॥159॥ अनुवाद-एक प्रकारकी गोपियाँ 'वामा' स्वभावकी हैं और दूसरी प्रकारकी 'दक्षिणा' स्वभावकी हैं। ये अनेक भावोंके द्वारा श्रीकृष्णको रसास्वादन कराती हैं॥159॥ सभी गोपियोंमें श्रेष्ठा श्रीकृष्णप्रेष्ठा श्रीराधाके गुण और स्वभाव :- गोपीगण-मध्ये श्रेष्ठा राधा-ठाकुराणी। निर्मल-उज्ज्वल-रस-प्रेम-रत्नखनि॥160॥
वयसे 'मध्यमा' तैं हो स्वभावते 'समा'। गाढ़ प्रेमभावे तैं हो निरन्तर 'वामा'॥161॥ वाम्य-स्वभावे मान उठे निरन्तर। तार मध्ये उठे कृष्णेर आनन्द-सागर॥"162॥ अनुवाद-गोपियोंमें सर्वश्रेष्ठा श्रीराधा-ठाकुराणी हैं, वे निर्मल-उज्ज्वल-रस-प्रेमरूपी रत्नोंकी खान हैं। वे आयुमें 'मध्यमा' (पौगण्ड और यौवनके मध्य), स्वभावमें 'समा' (समभाव) हैं। 'समा' होनेपर भी गाढ़ प्रेमभावके कारण निरन्तर 'वामा' अर्थात् वाम्यभाव धारण करनेवाली हैं। वाम्य स्वभावके कारण निरन्तर मानवती होती रहती हैं, जिसके द्वारा वे श्रीकृष्णको आनन्द सागरमें निमज्जित करती हैं॥160-162॥ अमृतप्रवाह भाष्य-गोपियाँ दो प्रकारकी हैं,-'वामा' और 'दक्षिणा'। गोपियोंके मध्य निर्मल उज्ज्वल-रस- प्रेमरत्नकी खान-स्वरूपा राधा-ठाकुराणी ही सर्वश्रेष्ठा हैं। वे आयुमें-'मध्यमा', स्वभावमें-'समा' एवं निरन्तर 'वामा' हैं। उनके वाम्य स्वभावसे ही मान उदित होता है॥159-162॥ अनुभाष्य- 'वामा'-उज्ज्वलनीलमणिके सखी प्रकरणमें, 32 संख्या- “मानग्रहे सदोद्युक्ता तच्छैथिल्ये च कोपना। अभेद्या नायके प्रायः क्रूरा वामेति कीर्त्यते॥” “जो नायिका मानग्रहण करनेमें सदैव चेष्टाशील होती है, मानके शिथिल पड़नेसे अत्यन्त कोप करती है, नायक जिसको सहज ही वशीभूत करनेमें समर्थ नहीं होता तथा नायकके प्रति प्रायः कठोर होती है, वही 'वामा' कहलाती है।” 'दक्षिणा'-उज्ज्वलनीलमणिके सखी प्रकरणमें 38 संख्या- “असह्या माननिर्बन्धे नायके युक्तवादिनी। सामभिस्तेन भेद्या च दक्षिणा परिकीर्तिता॥” “जो नायिका मान करनेमें असमर्थ होती है,