श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1392, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 14/159-169 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला नायकके प्रति युक्तिपूर्ण प्रिय वचनोंका प्रयोग करती है, नायकके प्रीतिपूर्ण वचनोंसे प्रसन्न हो जाती है, उसे 'दक्षिणा' कहते हैं॥ 159 ॥ उज्ज्वलनीलमणिमें शृङ्गारभेदकथनमें 102 श्लोक :- अहेरिव गतिः प्रेम्णः स्वभावकुटिला भवेत्। अतो हेतोरहेतोश्च यूनोर्मान उदञ्चति ॥ 163 ॥ अनुवाद-सर्पकी स्वभाव-सिद्ध कुटिलगतिकी भाँति प्रेमकी भी स्वाभाविक वक्रगति होती है। इसलिये कभी कारण और कभी अकारण ही नायक एवं नायिकाका मान उदित होता है ॥ 163 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/110 संख्या देखें ॥ 163 ॥ महाप्रभुकी हर्ष-वृद्धि, दामोदरके द्वारा श्रीराधाके कृष्णप्रेम या महाभाव-सार-पराकाष्ठा-महिमा-व्याख्याका विस्तार :- एत शुनि' बाड़े प्रभुर आनन्द-सागर। 'कह, कह' कहे प्रभु, बले दामोदर ॥ 164 ॥ “अधिरूढ़ महाभाव—राधिकार प्रेम। विशुद्ध, निर्मल, यैछे दग्धवान् हेम ॥ 165 ॥ कृष्णेर दर्शन यदि पाय आचम्बिते। नाना-भाव-विभूषणे हय विभूषिते ॥ 166 ॥ अनुवाद-यह सुनकर महाप्रभुका आनन्द-सागर वर्धित होने लगा और वे श्रीस्वरूप दामोदरको 'और कहो, और कहो' कहने लगे। श्रीस्वरूप दामोदर कहने लगे,—“श्रीराधिकाका प्रेम अधिरूढ़ महाभाव है। वह प्रेम विशुद्ध, निर्मल और तपाये हुए सोनेकी भाँति उज्ज्वल है। श्रीराधिकाको यदि अकस्मात् श्रीकृष्णका दर्शन प्राप्त हो जाता है, तो वे अनेक भावरूपी आभूषणोंसे विभूषित हो जाती हैं ॥ 164-166 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'दग्धवान् हेम'-ज्वलित अर्थात् तपता हुआ सोना ॥ 165 ॥ अनुभाष्य- 'अधिरूढ़ महाभाव' - उज्ज्वलनीलमणिके स्थायिभाव प्रकरणमें 170 संख्या- “रूढ़ोक्तेभ्योऽनुभावेभ्यः कामप्याप्ता विशिष्टताम्। यत्रानुभावा दृश्यन्ते सोऽधिरूढ़ो निगद्यते ॥” “रूढ़भावके लक्षणमें कहे गये जो सब सात्त्विक अनुभाव अपूर्व विशिष्टताको प्राप्त होते हैं, उस अनिर्वचनीय विशिष्टता-प्राप्त सात्त्विक भावसमूहको 'अधिरूढ़ महाभाव' कहते हैं ॥” 165 ॥ श्रीकृष्णको परिपूर्ण मात्रामें सुख प्रदान करनेवाले सब प्रकारके भावरूपी अलङ्कारोंसे विभूषित श्रीराधिका :- अष्ट 'सात्त्विक', हर्षादि 'व्यभिचारी' याँर। 'सहज प्रेम', विंशति 'भाव' अलङ्कार ॥ 167 ॥ 'किलकिञ्चित', 'कुट्टमित', 'विलास', 'ललित'। 'विव्वोक', 'मोट्टायित', आर 'मौग्ध्य', 'चकित' ॥ 168 ॥ श्रीकृष्णवाञ्छा पूर्ण करनेवाली श्रीराधाके नाना भाव- अलङ्कार-शोभित रूप-दर्शनसे श्रीकृष्णको असीम सुख :- एत भावभूषाय भूषित श्रीराधार अङ्ग। देखिते उथले कृष्णसुखाब्धि-तरङ्ग ॥ 169 ॥ अनुवाद-आठ सात्त्विकभाव, हर्षादि व्यभिचारी भाव, 'सहज प्रेम', बीस भावरूपी अलङ्कार-'किलकिञ्चित', 'कुट्टमित', 'विलास', 'ललित', 'विव्वोक', 'मोट्टायित', 'मौग्ध्य' और 'चकित'—इन समस्त भावरूपी अलङ्कारोंसे श्रीराधिकाके अङ्ग विभूषित हैं, जिन्हें देखने मात्रसे ही श्रीकृष्णके सुख-समुद्रमें तरङ्ग उठने लगती हैं॥ 167-169 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'सात्त्विक' - सात्त्विक विकार आठ प्रकारके हैं—(1) स्तम्भ, (2) स्वेद (पसीना), (3) रोमाञ्च, (4) स्वरभङ्ग, (5) वेपथु (कम्प), (6) वैवर्ण्य (वर्ण परिवर्तन), (7) अश्रु और (8) प्रलय। 'व्यभिचारी'-व्यभिचारी अथवा सञ्चारी भाव तैंतीस प्रकारके हैं, जैसे,— (1) निर्वेद, (2) विषाद, (3) दैन्य, (4) ग्लानि, (5) श्रम, (6) मद, (7) गर्व, (8) शङ्का, (9) त्रास, (10) आवेग, (11) उन्माद, (12) अपस्मार, (13) व्याधि, (14) मोह, (15) मृति, (16) आलस्य, 548 ।