श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1393, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौदहवाँ अध्याय 14/167–173 ] (17) जाड्य, (18) व्रीड़ा, (19) अवहित्था, (20) स्मृति, (21) वितर्क, (22) चिन्ता, (23) मति, (24) धृति, (25) हर्ष, (26) औत्सुक्य, (27) औग्र्य, (28) अमर्ष (29) असूया, (30) चापल्य, (31) निद्रा, (32) सुप्ति और (33) प्रबोध। 'भाव' रूप अलङ्कार—बीस प्रकारके हैं; जैसे— [क] अङ्गज (अङ्गोंमें उत्पन्न)— (1) भाव, (2) हाव, (3) हेला; [ख] अयत्नज (बिना प्रयासके उत्पन्न)— (4) शोभा, (5) कान्ति, (6) दीप्ति, (7) माधुर्य, (8) प्रगल्भता, (9) औदार्य, (10) धैर्य; [ग] स्वभावज (स्वभावसे उत्पन्न)— (11) लीला, (12) विलास, (13) विच्छित्ति, (14) विभ्रम, (15) किलकञ्चित, (16) मोट्टायित, (17) कुट्टमित, (18) विब्बोक, (19) ललित और (20) विकृत ॥ 167 ॥ अनुभाष्य—'किलकिञ्चित'—इस अध्यायकी 174 संख्या देखें। 'कुट्टमित'—इसी अध्यायकी 197 संख्या देखें। 'विलास'—इसी अध्यायकी 187 संख्या देखें। 'ललित'—इसी अध्यायकी 192 संख्या देखें। 'विब्बोक'—उज्ज्वलनीलमणिके अनुभाव प्रकरणमें 75 संख्या— “इष्टेऽपि गर्वमानाभ्यां विब्बोकः स्यादनादरः” अर्थात् गर्व और मानके द्वारा प्रियतम अथवा उनके द्वारा दी गयी वस्तुके अनादरको 'विब्बोक' कहते हैं। 'मोट्टायित'—उज्ज्वलनीलमणिमें अनुभाव प्रकरणमें— “कान्तस्मरणवार्त्तादौ हृदि तद्भावभावतः। प्राकट्यमभिलाषस्य मोट्टायितमुदीर्यते ॥” अर्थात् हृदयमें प्रियतमकी स्मृति और कथाजनित उनकी भावनासे जो अभिलाषा उत्पन्न होती है, वही 'मोट्टायित' कहलाती है। 'मौग्ध्य',—उज्ज्वलनीलमणिके अनुभाव प्रकरणमें— “ज्ञातस्याप्यज्ञवत्पृच्छा प्रियाग्रे मौग्ध्यमीरितम्” अर्थात् कान्तके सामने नायिका किसी विषयको जाननेपर भी जैसे नहीं जानती है, इस प्रकारके भावको प्रकाश करके जो जिज्ञासा करती है, उसीको 'मौग्ध्य' कहते हैं। 'चकित'—उज्ज्वलनीलमणिके अनुभाव प्रकरणमें— “प्रियाग्रे चकितं भीतेरस्थानेऽपि भयं महत्” अर्थात् कान्तके सम्मुख होनेपर भयभीत नहीं होनेपर भी जब नायिका अत्यन्त भयभीत होनेका प्रदर्शन करती है, उसीको 'चकित' कहते हैं।” आदिलीला 4/243, 250, 256 संख्या देखें ॥ 168–169 ॥ श्रीराधाके 'किलकिञ्चित'-भावके दृष्टान्त-स्थल :— किलिञ्चितादि-भावेर शुन विवरण। ये भाव-भूषाय राधा हरे कृष्ण-मन ॥ 170 ॥ राधा देखि' कृष्ण यदि धुँइते करे मन। दानघाटि-पथे यबे वर्जेन गमन ॥ 171 ॥ याबे आसि' माना करे पुष्प उठाइते। सखी-आगे चाहे यदि गाये हात दिते ॥ 172 ॥ एसब स्थाने 'किलकिञ्चित'-उद्गम। प्रथमे 'हर्ष' सञ्चारी-मूल-कारण ॥ 173 ॥ अनुवाद—अब किलकिञ्चितादि भावोंका विवरण सुनिये जिन भावरूपी भूषणोंसे विभूषित होकर श्रीराधा श्रीकृष्णका मन हरण करती हैं। श्रीकृष्ण जब श्रीराधाको देखकर यदि उन्हें छूनेकी इच्छा करते हैं, अथवा जब दानघाटीका पथ अवरुद्धकर जब श्रीराधाको जानेसे रोकते हैं, अथवा जब श्रीराधाके पास आकर उन्हें पुष्प-चयन करनेसे मना करते हैं, अथवा किसी सखीके सामने श्रीराधाके श्रीअङ्गको छूनेका प्रयास करते हैं—ऐसे समयपर किलकिञ्चित भावका प्राकट्य होता है। पहले हर्ष-नामक सञ्चारी भाव प्रकट होता है और यही इन किलकिञ्चत भावोंका मूल कारण है ॥ 170–173 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जब श्रीमती राधिकाकी भाव-भूषा देखकर श्रीकृष्णमें उन्हें स्पर्श करनेकी इच्छा उत्पन्न होती है, तब दानघाटीके पथमें, या फिर पुष्पोंके वनमें, । 549