भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1394, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1394

[ 14/171-180 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला वैसी लीला सम्पादित करते हैं। दानघाटीके पथपर इस प्रकारकी लीला, — जिस मार्गपर श्रीमती राधिका दूध-दही-घी आदि लेकर जाती हैं, उस रास्ते अथवा दूसरी पार खड़े होकर श्रीकृष्ण कहते हैं, - 'तुम जब तक शुल्क (कर) नहीं दोगी, तब तक इस मार्गसे तुम्हारा जाना मना है'; इस छलसे एक दानकेलिरूप लीलाका उद्गम करते हैं। और जब श्रीराधिका पुष्प चयन करने जाती हैं, तब श्रीकृष्ण पुष्पवनके अधिकारी बनकर 'मेरे पुष्प चोरी कर रही हों' कहकर एक लीलाका उद्गम करते हैं। इन सभी स्थानोंपर ऐसे समयमें श्रीराधाजीका 'किलकिञ्चित' भाव प्रकट होता है ॥ 171-173 ॥ किलकिञ्चित-भावकी संज्ञा :- उज्ज्वलनीलमणिमें अनुभाव प्रकरणमें (44 श्लोक)— गर्वाभिलाषरुदितस्मितासूयाभयक्रु सङ्करीकरणं हर्षादुच्यते किलकिञ्चितम् ॥ 174 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 174 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-गर्व, अभिलाष, रोदन, हास्य, असूया, भय और क्रोध-इन सात भावोंके हर्षके साथ संमिश्रणको 'किलकिञ्चित्' भाव कहते हैं ॥ 174 ॥ अनुभाष्य- हर्षात् (हर्षः एव हेतुः तस्मात्) गर्वाभिलाषरुदितस्मितासूयाभय- क्रुधां (गर्वादीनां सप्तानां भावानां) सङ्करीकरणं (मिश्रणं युगपत्-प्राकट्यं) 'किलकिञ्चितम्' उच्यते। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 174 ॥ गर्वादि सात भावोंका हर्षके साथ युगपत् मिलनके फलसे उक्त 'महाभाव'का उदय :- आर सात भाव आसि' सहजे मिलय। अष्टभाव-सम्मिलने 'महाभाव' हय ॥ 175 ॥ गर्व, अभिलाष, भय, शुष्करुदित। क्रोध, असूया हय, आर मन्दस्मित ॥ 176 ॥ नाना-स्वादु अष्टभाव एकत्र मिलन। याहार आस्वादे तृप्त हय कृष्ण-मन ॥ 177 ॥ मीठे पानेके साथ उपमा :- दधि, खण्ड, घृत, मधु, मरीच, कर्पूर। एलाची-मिलने यैछे रसाला मधुर ॥ 178 ॥ अनुवाद-हर्षके साथ गर्व, अभिलाष, भय, शुष्क- रोदन, क्रोध, असूया और मन्द-मुस्कान-ये सात भाव सहजमें आकर मिल जाते हैं और इन आठ भावोंके मिलनेसे 'महाभाव' होता है। इन आठ भावोंका एक साथ मिश्रण ऐसा स्वादिष्ट होता है कि उसे आस्वादन करके श्रीकृष्णका मन तृप्त हो जाता है; जिस प्रकार दही, चीनी, घी, मधु, काली मिर्च, कर्पूर और छोटी इलायचीके मिलनेपर रस मधुर हो जाता है ॥ 175-178 ॥ अनुभाष्य-मूल कारण हर्षके साथ गर्व आदि सात भाव जब मिलते हैं, तब इन आठ भावोंके सम्मिलनसे 'किलकिञ्चित'-महाभाव होता है ॥ 175 ॥ श्रीराधाके किलकिञ्चित भाव-दर्शनसे श्रीकृष्णका प्रगाढ़तम सुख :- एइ भाव-युक्त देखि' राधास्य-नयन। सङ्गम हइते सुख पाय कोटि-गुण ॥" 179 ॥ अनुवाद-किलकिञ्चित भावसे युक्त श्रीराधाके मुखकमल और नेत्रोंको देखकर श्रीकृष्णको जो सुख होता है, वह श्रीराधाके सङ्गम सुखसे भी करोड़ों गुणा अधिक है ॥ 179 ॥ श्रीराधाके किलकिञ्चित-भावका दृष्टान्त-स्थल :- दानकेलिकौमुदीमें (1) श्लोक और उज्ज्वलनीलमणिमें अनुभावकथनमें (46) श्लोक- अन्तःस्मेरतयोज्ज्वला जलकणव्याकीर्णपक्ष्मङ्कुरा किञ्चित्पाटलिताञ्चला रसिकतोत्सिक्ता पुरः कुञ्चती। रुद्धायाः पथि माधवेन मधुरव्याभुग्नतारोत्तरा राधायाः किलकिञ्चितस्तबकिनी दृष्टिः श्रियं वः क्रियात् ॥ 180 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 180 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीराधिकाके गर्वादि सात भावोंसे 550 ।