भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1398

[ 14/197-202 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 197 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—चोली या मुखको ढकनेवाले आञ्चलको स्पर्श करनेके समय हृदय प्रफुल्लित होनेपर भी सम्भ्रमके कारण बाहरसे क्रोध और व्यथितकी भाँति लक्षणोंको 'कुट्टमित' कहते हैं॥ 197 ॥ अनुभाष्य— स्तनाधरादि-ग्रहणे (वक्षोगण्डस्थलोष्ठ-स्पर्शने) हृत्प्रीतौ (मनसि लब्धे आनन्दे सति) अपि सम्भ्रमात् (लोक-गौरवात्) बहिः (सखिदृष्टिपथे) व्यथितवत् (आर्त्तजनोचितः) क्रोधः (अर्थात् अन्तः-सन्तोषाः बहिः-क्रोधः) [भवेत्]—इति बुधैः (अलङ्कारशास्त्रविद्भिः) 'कुट्टमितं' प्रोक्तं (कथितम्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 197 ॥ कृष्ण-वाञ्छा पूर्ण हय, करे पाणि-रोध। अन्तरे आनन्द राधा, बाहिरे वाम्य-क्रोध॥ 198 ॥ व्यथा पाञा करे, येन शुष्क रोदन। ईषत् हासिया कृष्णे करेन भर्त्सन॥ 199 ॥ अनुवाद—उनको स्पर्श करनेके लिये बढ़े श्रीकृष्णके हाथोंको श्रीराधा रोकती तो हैं, परन्तु मन-ही-मनमें सोचती हैं—'श्रीकृष्ण अपनी इच्छा पूर्ण कर लें'। इस प्रकार श्रीराधा हृदयमें तो आनन्द अनुभव करती हैं, परन्तु बाहरसे वामता (विरोध) और क्रोध प्रकट करती हैं। श्रीराधा ऐसा प्रदर्शन करती हैं जैसे वे दुःखी हैं और बिना आँसूके रोनेका अभिनय करती हैं। और साथ ही मन्द मुस्कुराते हुए श्रीकृष्णको डाँट भी लगाती है॥ 198-199 ॥ (गोस्वामीपाद द्वारा उक्त श्लोक) :— पाणिरोधमविरोधितवाञ्छं भर्त्सनाश्च मधुरस्मितगर्भाः। माधवस्य कुरुते करभोरुर्हारि शुष्करुदितञ्च मुखेऽपि॥ 200 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 200 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णके हाथके द्वारा उन्हें स्पर्श करनेकी चेष्टाको रोकनेकी इच्छा नहीं होनेपर भी शिशु-हाथीकी सूंडके समान जंघावाली श्रीमती राधिका श्रीकृष्णके हाथोंकी चेष्टाका विरोध करते हुए मधुर-मुस्कानके साथ उनको डाँटने और मनोहर शुष्करोदन (रोनेका दिखावा) करने लगीं॥ 200 ॥ अनुभाष्य— करभोरुः (करिशावकशुण्डवत् ऊर्जितोरुदेशा राधिका) माधवस्य अविरोधितवाञ्छं (न विरोधिता वाञ्छा यस्मिन् तत्) पाणिरोधं (करस्पर्शनिवारणं), मधुरस्मित-गर्भाः (मधुरं मृदु स्मितं मन्दहास्यं गर्भे येषां तथाभूताः) भर्त्सनाः, अपि च मुखे हारि-शुष्करुदितं (कृष्णमनोहारि कपटरोदनं) कुरुते। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 200 ॥ एइमत आर सब भाव-विभूषण। याहाते भूषित राधा हरे कृष्ण मन॥ 201 ॥ अनुवाद—इस प्रकार और अनेक भावरूपी भूषण हैं जिनसे विभूषित होकर श्रीराधा श्रीकृष्णका मन हरण करती हैं॥ 201 ॥ अनुभाष्य—'हरे'—हरण अर्थात् आकर्षण करती हैं॥ 201 ॥ सहस्र मुखोंसे भी शेषरूपी विष्णु श्रीकृष्ण-लीला वर्णन करनेमें असमर्थ :— अनन्त कृष्णेर लीला ना याय वर्णन। आपने वर्णेन यदि 'सहस्रवदन'॥ 202 ॥ अनुवाद—यदि श्रीकृष्ण स्वयं अपने अंश 'सहस्र-वदन' अर्थात् हजार मुखवाले शेषके द्वारा भी वर्णन करें, तो भी उनकी अनन्त लीलाओंका वर्णन करना सम्भव नहीं है॥ 202 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 21/10, 12 संख्या तथा भाः 2/7/41 और 10/14/7 श्लोक देखें॥ 202 ॥ 554 ।