श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1399, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौदहवाँ अध्याय 14/203-211 ] श्रीराधा-सेवक श्रीस्वरूप और श्रीलक्ष्मीनारायणके सेवक श्रीवासका संलाप; श्रीवासको अपनी ईश्वरीके ऐश्वर्यका गर्व :- श्रीवास हासिया कहे, — 'शुन, दामोदर । आमार लक्ष्मीर देख सम्पत्ति विस्तर ॥ 203 ॥ वृन्दावनेर सम्पद् देख,—पुष्प-किसलय । गिरिधातु-शिखिपिच्छ-गुञ्जाफल-मय ॥ 204 ॥ अनुवाद—[नारदजीके भावमें आविष्ट होकर लक्ष्मीजीके ऐश्वर्यको देखकर] श्रीवासने हँसते हुए कहा,—'सुनो! दामोदर, इधर मेरी आराध्या लक्ष्मीकी अपार सम्पत्तिको देखो। और उधर वृन्दावनकी सम्पत्ति देखो—वहाँ तो केवल फूल, कोंपलें, गैरिक धातु, मोरपंख और गुञ्जाफल मात्र ही हैं [अर्थात् दोनोंमें तुलनाका कोई स्थान ही नहीं है] ॥ 203-204 ॥ अनुभाष्य—श्रीवास स्वयंको दास्यरसके ऐश्वर्यमें अवस्थित होनेका अभिमान करके श्रीदामोदर स्वरूपको ऐश्वर्यहीन 'व्रजवासी' समझकर प्रेमकलह कर रहे हैं॥ 203 ॥ श्रीकृष्णके व्रजगमन हेतु लक्ष्मीका क्रोध अभिमान :- वृन्दावन देखिबारे गेला जगन्नाथ । शुनि' लक्ष्मीदेवीरे मने हैल आसोयाथ ॥ 205 ॥ एत सम्पत्ति छाड़ि' केने गेला वृन्दावन। ताँरे हास्य करिते लक्ष्मी करिला साजन ॥ 206 ॥ 'तोमार ठाकुर, देख एत सम्पत्ति छाड़ि' । पत्र-फल-फूल-लोभे गेला पुष्पबाड़ी ॥ 207 ॥ एइ कर्म करे काँहा विदग्ध-शिरोमणि ? लक्ष्मीर अग्रेते निज प्रभुरे देह' आनि' ॥ '208 ॥ अनुवाद—'श्रीजगन्नाथ वृन्दावनको देखने गये हैं—यह सुनकर लक्ष्मीदेवीके मनमें निराशा होती है कि यहाँ इतनी सब सम्पत्तिको छोड़कर वे वृन्दावन क्यों गये हैं? श्रीजगन्नाथका उपहास करनेके लिये ही लक्ष्मीजीने सज-धजकर अपने ऐश्वर्यको दिखलाया। लक्ष्मीदेवीकी दासियोंने श्रीजगन्नाथके सेवकोंसे कहा,—'तुम्हारे ठाकुर (श्रीजगन्नाथ) इतनी सम्पत्तिको छोड़कर पत्र-फल-फूलके लोभसे पुष्पोद्यानमें गये हैं! विदग्ध-शिरोमणि होकर भी वे ऐसा कार्य क्यों करते हैं? शीघ्रतासे अपने प्रभुको लक्ष्मीजीके सामने लेकर आओ॥ '205-208 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आसोयाथ'-असूयायुक्त, स्वल्प-ईर्ष्यायुक्त। लक्ष्मीजीकी दासियाँ कह रही हैं,—'ओहे जगद्-बन्धुके सेवकों! देखो, इतनी सम्पत्ति छोड़कर फल-पत्र-पुष्पके लोभसे तुम्हारे ठाकुर पुष्पोद्यानमें गये हैं। (अभी) लक्ष्मीदेवीके समक्ष अपने उन प्रभुको लेकर आओ॥ 205-208 ॥ अनुभाष्य—'आसोयार्थ'—अशान्ति, अस्वास्थ्य, चाञ्चल्य। 'तोमार ठाकुर'—श्रीजगन्नाथके सेवकोंको लक्ष्य करके लक्ष्मीकी दासियोंकी उक्ति। 'निज प्रभुरे'—श्रीजगन्नाथको॥ 205-208 ॥ लक्ष्मीकी दासियोंके द्वारा ईश्वरके दोषके भागीदार सेवकोंका बन्धन और उन्हें दण्ड प्रदान :— एत बलि' लक्ष्मीर सब दासीगणे। कटि-वस्त्रे बान्धि' आने प्रभुर निजगणे ॥ 209 ॥ लक्ष्मीर चरणे आनि' कराय प्रणति । धन-दण्ड लय, आर कराय मिनति ॥ 210 ॥ रथेर उपरे करे दण्डेर ताड़न । चोरप्राय करे जगन्नाथेर सेवकगण ॥ 211 ॥ अनुवाद—यह कहकर महालक्ष्मीकी सभी दासियोंने श्रीजगन्नाथके सेवकोंको पकड़कर उनकी कमरमें वस्त्र बाँधकर उन्हें अपनी स्वामिनी श्रीलक्ष्मीके चरणोंमें गिराकर प्रणाम करवाया, दण्डके रूपमें उनसे धन लिया और उनसे क्षमा मँगवायी। और वे दासियाँ श्रीजगन्नाथके रथके ऊपर लाठियाँ बरसाने लगीं और श्रीजगन्नाथके सेवकोंका चोरकी भाँति तिरस्कार करने लगीं॥ 209-211 ॥ । 555