भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1401

प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति इस प्रकार है:

चौदहवाँ अध्याय 14/218-227 ] सर्वत्र जल-याँहा अमृत-समान। चिदानन्द ज्योतिः स्वाद्य-याँहा मूर्त्तिमान् ॥ 225 ॥ लक्ष्मी जिनि' गुण याँहा लक्ष्मीर समाज। कृष्ण-वंशी करे याँहा प्रियसखी-काज ॥ 226 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,- "श्रीवासजी, सावधानीपूर्वक सुनो। क्या वृन्दावनकी सम्पत्तिके विषयमें भूल गये हो? वृन्दावनकी सहज सम्पत्ति महासागरकी भाँति है और द्वारका-वैकुण्ठकी सम्पत्ति उसकी एक बूँदके बराबर भी नहीं है। स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण परम पुरुषोत्तम हैं और उनका समस्त ऐश्वर्य केवल वृन्दावन-धाममें ही प्रकाशित होता है। श्रीवृन्दावनकी भूमि चिन्तामणिसे बनी है, वहाँके भवन रत्नोंसे बने हैं। वृन्दावनकी दासियाँ भी चिन्तामणिसे बने नूपुर अपने चरणोंमें धारण करती हैं। वृन्दावन कल्पवृक्षों और लताओंसे