भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1402, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1402

[ 14/227-233 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्लोक-भावानुवाद—उस अप्राकृत भूमि वृन्दावनमें परमपुरुष श्रीकृष्ण ही कान्त (अद्वितीय भोक्ता) हैं, कान्ताएँ—व्रजकी लक्ष्मियाँ गोपियाँ हैं, कदम्बादि वृक्ष—सभी कल्पवृक्ष (कृष्णप्रेमफल देनेवाले) हैं, समस्त भूमि ही चिन्मय (रत्नपूर्ण, समस्त चिन्मय इच्छाओंको पूर्ण करनेवाली) है, जल—अमृत है, बोलना—सङ्गीत है, चलना—नृत्य है और श्रीकृष्णकी वंशी—प्रियसखी है तथा सर्वत्र चिदानन्दज्योति अनुभव होती है। इसलिये श्रीवृन्दावन ही परम आस्वाद्य है (वह सर्वथा जड़भावरहित अप्राकृत और एकमात्र कृष्णके द्वारा भोग्य है—यह अर्थ है)। मध्यलीला 8/137 संख्यामें वृन्दावन-शब्दका अनुभाष्य देखें ॥ 227 ॥ वृन्दावनके ऐश्वर्यका वर्णन :— भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/173)-उद्धृत बिल्वमङ्गल-वचन— चिन्तामणिश्चरणभूषणमङ्गनानां शृङ्गारपुष्पतरवस्तरवः सुराणाम्। वृन्दावने व्रजधनं ननु कामधेनु- वृन्द्वानि चेति सुखसिन्धुरहो विभूतिः ॥” 228 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 228 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीवृन्दावनकी व्रजाङ्गनाओंके चरणोंके भूषण ही चिन्तामणि हैं, लीला-अनुकूल समस्त पुष्पवृक्ष ही कल्पवृक्ष (सुरतरु) और कामधेनु ही व्रजका परम-धन है। इन सबके द्वारा श्रीवृन्दावनकी विभूति परमानन्द-स्वरूपमें प्रकाशित हो रही है ॥ 228 ॥ अनुभाष्य— वृन्दावने अङ्गनानां (गोपीनां) चरणभूषणं चिन्तामणिः [एव] शृङ्गारपुष्पतरवः (शृङ्गारार्थं वेशविन्यासाय कुसुमविटपिनः) सुराणां तरवः (कल्पद्रुमाः एव), कामधेनुवृन्द्वानि [एव] व्रजधनं (गोकुलवासिनां धनं); अहो [वृन्दावनस्य] विभूतिः (अतुलनीय-माहेश्वर्यमपि) सुखसिन्धुः (आनन्दामृतसमुद्रः एव)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 228 ॥ श्रीवासका परमानन्द :— शुनि' प्रेमोवेशे नृत्य करे श्रीनिवास। कक्षतालि बाजाय, करे अट्ट-अट्ट हास ॥ 229 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरसे वृन्दावनकी महिमा श्रवणकर श्रीनिवास प्रेममें आविष्ट होकर नृत्य करने लगे और बगल बजाते हुए जोरसे अट्टहास करने लगे॥ 229 ॥ श्रीराधाके रस-श्रवणसे महाप्रभुको भी आनन्द :— राधार शुद्धरस प्रभु आवेशे शुनिल। सेइ रसावेशे प्रभु नृत्य आरम्भिल ॥ 230 ॥ महाप्रभुका नृत्य और स्वरूपका गीत :— रसावेशे प्रभुर नृत्य, स्वरूपेर गान। 'बल', 'बल' बलि' प्रभु पाते निज-काण ॥ 231 ॥ महाप्रभुकी प्रेम रूपी बाढ़में पुरी-धाम प्लावित :— व्रजरस-गीत शुनि' प्रेम उथलिल। पुरुषोत्तम-ग्राम प्रभु प्रेमे भासाइल ॥ 232 ॥ अनुवाद—श्रीराधाके शुद्धप्रेमरसके विषयमें सुनकर महाप्रभुने उसी रसमें आविष्ट होकर नृत्य आरम्भ किया। महाप्रभुके रसावेशमें नृत्यके साथ श्रीस्वरूप दामोदर गान करने लगे,। तब महाप्रभु 'गान करते रहो', 'गान करते रहो', कहकर अपने कानोंको (हाथोंसे खींचकर) फैला रहे थे। व्रजरसके गीतोंको सुनकर महाप्रभुमें प्रेम उमड़ आया। इस प्रेमके द्वारा उन्होंने श्रीपुरुषोत्तम-ग्राम (श्रीजगन्नाथ पुरी) क्षेत्रको डुबो दिया॥ 230-232 ॥ दूसरे प्रहर तक महाप्रभुका नृत्य :— लक्ष्मीदेवी यथाकाले गेला निज-घर। प्रभु नृत्य करे, हैल द्वितीय प्रहर ॥ 233 ॥ अनुवाद—श्रीलक्ष्मीदेवी भी यथासमय अपने घर नीलाचलमें चली गयीं। महाप्रभुके नृत्य करते हुए द्वितीय प्रहरका समय हो आया ॥ 233 ॥ 558 ।