भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1403

चौदहवाँ अध्याय 14/234-241 ] चारों सम्प्रदायोंको ही कीर्त्तन करते हुए थकान :- चारि-सम्प्रदाय गान करि' बहु श्रान्त हैल। महाप्रभुर प्रेमावेश द्विगुण बाड़िल ॥ 234 ॥ अनुवाद-इतनी देरसे गान करते हुए भक्तोंकी चारों मण्डलियाँ बहुत थक गयीं, परन्तु महाप्रभुका प्रेमावेश बढ़कर दो गुणा हो गया ॥ 234 ॥ श्रीराधा-प्रेमावेशमें महाप्रभु :- राधा-प्रेमावेशे प्रभु हैला सेइ मूर्त्ति। नित्यानन्द दूरे देखि' करिलेन स्तुति ॥ 235 ॥ रसविरोध-भयसे दूरसे ही श्रीनिताइका महाप्रभुका स्तव :- नित्यानन्द देखिया प्रभुर भावावेश। निकटे ना आइसे, रहे किछु दूरदेश ॥ 236 ॥ श्रीनिताइके न आनेसे महाप्रभुका आवेश और कीर्तन भी किसी प्रकारसे नहीं रुका :- नित्यानन्द बिना प्रभुके धरे कोन् जन। प्रभुर आवेश ना याय, ना रहे कीर्त्तन ॥ 237 ॥ अनुवाद-श्रीराधा-प्रेमावेशमें महाप्रभु भी वैसी राधा-मूर्ति हो गये। दूरसे महाप्रभुके राधा-रूपको देखकर श्रीनित्यानन्द प्रभु उनकी स्तुति करने लगे। महाप्रभुको श्रीराधाके भावमें आविष्ट देखकर श्रीनित्यानन्द प्रभु निकट नहीं आये, कुछ दूरीपर ही रहे। श्रीनित्यानन्द प्रभुके अतिरिक्त महाप्रभुको कोई पकड़ नहीं सकता था। महाप्रभुका आवेश दूर नहीं हो रहा था, इसलिये (भक्तोंके थके होनेपर भी) कीर्तन भी नहीं रुक रहा था ॥ 235-237 ॥ अनुभाष्य-'रहे'-रुके या विराम करे ॥ 237 ॥ श्रीस्वरूपके कौशलसे महाप्रभुकी बाह्यदशा :- भङ्ग करि' स्वरूप सबार श्रम जानाइल। भक्तगणेर श्रम देखि' प्रभुर बाह्य हैल ॥ 238 ॥ अनुवाद-तब श्रीस्वरूप दामोदरने इशारेसे महाप्रभुको बतलाया कि सब भक्त कीर्तन करते हुए थक गये हैं। भक्तोंके श्रमको देखकर महाप्रभु बाह्यदशामें आ गये ॥ 238 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुने राधाप्रेमावेशमें राधिका-मूर्ति प्रकाशित की है, ऐसा देखकर स्वयंको उस रसमें अनधिकारी जानकर श्रीनित्यानन्द प्रभु दूर ही रहे; श्रीस्वरूप गोस्वामीने इशारेसे महाप्रभुके भावावेशको भङ्ग कराया ॥ 235-238 ॥ उपवनमें जाकर सभीके द्वारा विश्राम करनेके बाद मध्याह्न-स्नान :- सब भक्त लञा प्रभु गेला पुष्पोद्याने। विश्राम करिया कैला मध्याह्न-स्नाने ॥ 239 ॥ अनुवाद-तब महाप्रभु सभी भक्तोंको साथ लेकर पुष्पोद्यानमें चले गये। वहाँ कुछ देर विश्राम करके उन्होंने मध्याह्निक-स्नान किया ॥ 239 ॥ लक्ष्मी और जगन्नाथका बहुत प्रसाद-संग्रह :- जगन्नाथेर प्रसाद आइल बहु उपहार। लक्ष्मीरे प्रसाद आइल विविध प्रकार ॥ 240 ॥ भक्तोंके साथ प्रसाद सेवन; सन्ध्यामें स्नानके बाद श्रीजगन्नाथ-दर्शन :- सबा लञा नाना-रङ्गे करिला भोजन। सन्ध्या स्नान करि' कैल जगन्नाथ-दरशन ॥ 241 ॥ अनुवाद-तब श्रीजगन्नाथको अर्पित भोगका उच्छिष्ट बहुतसा प्रसाद और लक्ष्मीजीको अर्पित अनेक प्रकारके भोगका प्रसाद आ गया। महाप्रभुने सभी भक्तोंके साथ आनन्दपूर्वक भोजन किया। सन्ध्या स्नान करके महाप्रभु श्रीजगन्नाथके दर्शनके लिये गये ॥ 240-241 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कोई-कोई कपटी (धर्मध्वजी भण्ड) व्यक्ति लक्ष्मीदेवीका प्रसाद पानेपर वितर्क करते हैं। यहाँ देखिये,-श्रीमहाप्रभुने स्वयं भक्तोंको लेकर उसी प्रसादको पाया था। तात्पर्य यह है कि लक्ष्मी आदि । 559