भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1404, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1404

[ 14/240-248 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला समस्त शक्तियाँ ही श्रीभगवान्‌की दासियाँ हैं। जब जो भक्त उन्हें (शक्तियोंको) जो भी उत्तम वस्तु अर्पित करता है, शक्तियाँ अपने प्रभु श्रीकृष्णको वह निवेदन करके उन वस्तुओंका सेवन करती हैं। इसलिये भगवान्‌के दास-दासियोंका प्रसादान्न 'भगवान्‌का प्रसादान्न' ही है, ऐसा मानकर सर्वदा ही सेवनीय है। यहाँपर और भी कुछ विचारणीय विषय रहता है;—मायावादी नास्तिकोंके द्वारा निवेदित खाद्य द्रव्योंको भगवान्‌की शक्तियाँ ग्रहण करती है या नहीं, यह घोर सन्देहका विषय है। इसलिये भगवान्‌के दास-दासियोंके प्रति शुद्ध वैष्णवों द्वारा अर्पित निवेदित अन्नका सेवन करना ही वैष्णवोंके लिये उचित है॥ 240-241॥ आठ दिन तक श्रीजगन्नाथका दर्शन करते हुए नृत्य-कीर्त्तनके बाद भक्तोंके साथ नरेन्द्र सरोवरमें जलकेलि एवं उद्यानमें भोजन :— जगन्नाथ देखि' करेन नर्त्तन-कीर्त्तन। नरेन्द्र जलक्रीड़ा करे लञा भक्तगण ॥ 242 ॥ उद्याने आसिया कैल वन-भोजन। एइमत क्रीड़ा कैल प्रभु अष्टदिन ॥ 243 ॥ अनुवाद—श्रीजगन्नाथका दर्शन करते ही महाप्रभुने वहाँ नृत्य-कीर्तन आरम्भ किया। उसके बाद भक्तोंको साथ लेकर महाप्रभुने नरेन्द्र सरोवरमें जल-क्रीड़ा की और फिर उद्यानमें आकर वन-भोजन किया। इस प्रकार महाप्रभु आठ दिनों तक ऐसी लीलाएँ करते रहे॥ 242-243॥ श्रीजगन्नाथकी पुरीमें पुनर्यात्रा :— आर दिने जगन्नाथेर भितर-विजय। रथे चड़ि' जगन्नाथ चले निजालय ॥ 244 ॥ अनुवाद—अगले दिन गुण्डिचा मन्दिरमें श्रीजगन्नाथ 'भितर-विजय'के बाद रथपर चढ़कर अपने स्थान नीलाचलकी ओर चले॥ 244॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'भितर-विजय'—गुण्डिचा मन्दिरमें रत्नवेदीसे जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा—इन तीनों विग्रहोंको जगमोहनमें रखकर उन्हें एक ही समयमें रथपर चढ़ाया जाता है। रत्नवेदीसे उतरकर वे जगमोहनमें जितनी देर तक रहते हैं, उसीका नाम ही 'भितर-विजय' है॥ 244॥ अनुभाष्य—'भितर-विजय'—पुनर्यात्रामें श्रीमन्दिरके (गुण्डिचा-मन्दिरके) अन्दर वापिस नीलाचल लौटनेके लिये यात्रा। गुण्डिचा मन्दिरसे बाहरी विजय करके पुनः जगन्नाथ मन्दिरकी ओर गमन॥ 244॥ पहलेकी भाँति नृत्य-गीत :— पूर्ववत् कैल प्रभु लञा भक्तगण। परम आनन्दे करेन नर्त्तन-कीर्त्तन ॥ 245 ॥ अनुवाद—पहलेकी भाँति ही महाप्रभुने अपने भक्तोंको साथ लेकर रथके आगे परमानन्दसे नृत्य-कीर्त्तन किया॥ 245॥ पाहाण्डिके समय रेशमी डोरी आंशिक रूपसे छिन्न :— जगन्नाथेर पुनः पाण्डु-विजय हइल। एक गुटि पट्टडोरी ताँहा टूटि गेल ॥ 246 ॥ पाण्डुविजयेर तुली फाटि-फुटि याय। जगन्नाथेर भरे तुला उड़िया पलाय ॥ 247 ॥ अनुवाद—श्रीजगन्नाथकी फिरसे पाण्डु-विजय हुई, परन्तु अब उनके कमरमें बँधी हुई रेशमी डोरियोंमेंसे डोरियोंका एक गुच्छा टूट गया। श्रीजगन्नाथकी पाण्डु विजयके समय उन्हें थोड़ी-थोड़ी दूरीपर गद्दोंपर रखा जाता है। इस बार कुछ डोरी टूट जानेसे श्रीजगन्नाथका भार उन गद्दोंपर पड़ रहा था जिससे वे फटते जा रहे थे और उनकी रुई उड़ती जा रही थी॥ 246-247॥ सपुत्र सत्यराजको प्रतिवर्ष श्रीजगन्नाथके लिये रेशमी डोरी लानेका आदेश :— कुलीनग्रामी रामानन्द, सत्यराज खाँन। ताँरे आज्ञा दिल प्रभु करिया सम्मान ॥ 248 ॥ 560 ।