श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1424, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ शुनितेइ-साक्षाते श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
स्तम्भ १
शुनितेइ गोपालेर हइल १२/१४९ शुनि' प्रभु कहे किछु ६/१९० शुनिले ना हय प्रभुर १०/११३ शुष्कतर्क-खलि खाइते १४/८७ शैल-उपरि हैते आमा ४/४२ श्लोक करि' एक तालपत्रेते १/६१
श्र
श्रद्धाय चैतन्यलीला शुने ६/२८५ श्रवण-मध्ये जीवेर कोन् ८/२५४ श्रीगोपाल' नाम मोर ४/४१ श्रीचैतन्य-नित्यानन्द-अद्वैत ८/३०९ श्रीनृसिंह, जय नृसिंह ८/५ श्रीपाद, धर मोर गोसाञिर ९/२८९ श्रीविग्रह ये ना माने ६/१६७ श्रीवृन्दावन-भूमि-याँहा ८/२५३ श्री-वैष्णव एक, —व्येङ्कट ९/८२ श्रीभागवतसन्दर्भ-नाम ग्रन्थ १/४३ श्रीमाधवपुरीर सङ्गे श्रीरङ्ग ९/२९५ श्रुतिगण गोपीगणेर अनुगत ९/१३३ श्रुति-वाक्ये सेइ दुइ ६/१३६ श्रुति ये मुख्यार्थ कहे, सेइ ६/१३५ श्रेयो-मध्ये कोन् श्रेयः ८/२५० श्रेष्ठ-उपास्य-युगल ८/२५५ शृङ्गार-रसराजमय-मूर्त्तिधर ८/१४२
ष
षड्विध ऐश्वर्य—प्रभुर ६/१६१ षडैश्वर्यपूर्णानन्द-विग्रह ६/१५२
स
सङ्कीर्त्तन-यज्ञे ताँरे करे ११/९९ संस्कार करिये उत्तम ६/७६ सकल-वैष्णवशास्त्र-मध्ये ९/२४० सकल लोकेर आगे ५/११२
स्तम्भ २
सखीगण हय तार पल्लव ८/२०८ सखी बिना एइ लीला ८/२०२ सखी बिना एइ लीलाय ८/२०३ सखीभावे पाय राधाकृष्णेर ८/२२८ सखीभावे ये ताँरे करे ८/२०३ सखीर स्वभाव एक ८/२०६ सखी लीला विस्तारिया ८/२०२ सखी हैते हय एइ ८/२०१ सङ्गीत-गन्धर्व-सम, शास्त्रे १०/११६ सच्चिदानन्द-तनु, व्रजेन्द्र ८/१३५ सच्चिदानन्दमय कृष्णेर स्वरूप ८/१५३ सच्चिदानन्दमय हय ईश्वर ६/१५८ सत्य एक बात कहौँ १/२०१ सत्यविग्रह ईश्वरे', करह ९/२७७ सत्य-सीता आनि' दिल ९/२०७ सनकादि-शुकदेव ताहाते ६/१९८ संन्यास करि' विश्वरूप ७/४४ संन्यास करिला शिखा १०/१०८ संन्यास ग्रहण कैल १०/१०४ संन्यासी देखिया मोरे ९/२७२ संन्यासी' बलिया मोरे ना ८/१२८ संन्यासीर अल्प छिद्र १२/५१ संन्यासीर धर्म नहे ३/७४ संन्यासीर धर्म नहे—संन्यास ३/१७७ संन्यासीर धर्म लागि' श्रवण ६/१२७ संन्यासीर वेष देखि' ८/२८३ संन्यासीर वेषे मोरे दिला ९/२१४ 'सप्तताल-वृक्ष' देखे कानन ९/३१२ सप्तदिन पर्यन्त ऐछे करेन ६/१२३ सब खण्डि' प्रभु निज-मत ६/१७७ सब-भक्तेर आज्ञा निल १४/६ सबे, एक गुण देखि ९/२७७ सबे एक दोष तार १/१९४
स्तम्भ ३
सबे एक सखीगणेर इँहा ८/२०१ सबे दण्डधन छिल, ताहा ५/१५३ सबे बले, केने आइला १/२१३ 'समाः'-शब्दे कहे श्रुतिर ८/२२४ सम्पत्तिर मध्ये जीवेर ८/२४६ सम्भाषिले जानिबे तुमि ७/६५ सम्भाषिले जानिबे ताँर ७/६७ सम्यक् वासना कृष्णेर ८/११२ सर्व-अवतारी, सर्वकारण ८/१३३ सर्व-चित्ताकर्षक, साक्षात् ८/१३८ सर्व त्यजि' जीवेर कर्त्तव्य ८/२५३ सर्वत्र जल-याँहा अमृत १४/२२५ सर्वत्र स्थापय प्रभु वैष्णव ९/४४ सर्वत्र हय ताँर इष्टदेव ८/२७३ सर्वदेश वैष्णव' हैल प्रभुर ७/१०८ सर्व मत दुषि' प्रभु ९/४३ सर्वैश्वर्यपरिपूर्ण स्वयं ६/१४० सर्वैश्वर्य-सर्वशक्ति-सर्वरस ८/१३५ सशरीरे सप्तताल अन्तर्धान ९/३१३ ससागर-शैल मही करे १३/८३ सहज गमन करे, —यैछे १४/२२४ सहज गोपीर प्रेम, —नहे ८/२१४ सहज लोकेर कथा-याँहा १४/२२४ सहजेइ नित्यानन्द-कृष्णप्रेम १/२ सहजेइ पूज्य तुमि, आरे ६/५६ सहजे विचित्र मधुर चैतन्य ४/५ साक्षात् ईश्वर इँह, नाहिक १/१८० साक्षात् ईश्वर तुमि, के ८/१२१ साक्षात् पाण्डु तुमि, तोमार १०/५३ साक्षात् महाप्रभुर द्वितीय १०/१११ साक्षात् श्रीकृष्ण, तैं हो १०/१५ साक्षाते ना देखिले मने ५/१०५ साक्षाते ना देय देखा १३/६१
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