भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1447

पन्द्रहवाँ अध्याय कथासार—रथयात्राके पूर्ण होनेपर श्रीअद्वैतप्रभुने महाप्रभुकी पुष्प-तुलसी देकर पूजा की, महाप्रभुने भी पूजापात्रमें बचे हुए पुष्प-तुलसी देकर श्रीअद्वैताचार्यकी योऽसि सोऽसिं-मन्त्रसे पूजा की। उसके बाद श्रीअद्वैताचार्यने महाप्रभुको निमन्त्रण करके भोजन करवाया। नन्दोत्सवके दिन महाप्रभुने अपने भक्तोंके सहित गोपवेश धारण करके आनन्दोत्सव मनाया। विजयादशमीके दिन लङ्का-विजयोत्सवमें महाप्रभुने अपने भक्तोंको वानर सेनाके वेशमें सजाकर स्वयं हनुमानके आवेशमें बहुत आनन्द प्रकाशित किया। उसके बाद अन्यान्य उत्सवोंको देखनेके बाद महाप्रभुने समागत भक्तोंको गौड़देश जानेकी आज्ञा दी। महाप्रभुने श्रीरामदास, श्रीगदाधरदास आदि कुछ वैष्णवोंके साथ श्रीनित्यानन्द प्रभुको भी गौड़देशमें भेजा। बादमें बहुतसे दैन्यपूर्ण वचनोंके साथ (श्रीवासके हाथसे) अपनी माताके लिये प्रसाद-वस्त्र आदि भिजवाये। महाप्रभुने श्रीराघवपण्डित, श्रीवासुदेव दत्त, कुलीन-ग्रामवासी भक्तों आदि सभी वैष्णवोंके अनेक गुणोंकी व्याख्या करके उन्हें विदायी दी। श्रीरामरामानन्द और श्रीसत्यराजके प्रश्नोंके उत्तरमें महाप्रभुने गृहस्थ-वैष्णवोंके लिये शुद्धनामपरायण वैष्णवोंकी सेवाका निर्देश दिया। तब महाप्रभुने खण्डवासी-वैष्णवोंके माहात्म्य (और सेवा-निर्देश), श्रीसार्वभौम और श्रीविद्या-वाचस्पतिको (दारु और जलब्रह्मकी सेवाका आदेश) और श्रीमुरारि-गुप्तकी श्रीरामके चरणकमलोंमें निष्ठाकी व्याख्या की। तत्पश्चात् श्रीवासुदेव दत्तकी सम्पूर्ण-वैष्णवोचित प्रार्थनाके अनुसार श्रीकृष्णके (अनायास) जगत्के उद्धारके सामर्थ्यका विचार किया। उसके बाद श्रीसार्वभौमके घरपर (महाप्रभुके द्वारा) भिक्षा ग्रहणके समय अमोघकी कुछ दुर्बुद्धि होनेपर अगले दिन प्रातःकालमें उसे हैजाका रोग हो गया। महाप्रभुने कृपा करके उसे रोगसे मुक्त कराके श्रीकृष्ण-नाममें रुचि प्रदान की। —(अमृतप्रवाह भाष्य) अपने निन्दक अमोघको आत्मसात्कारी श्रीगौरसुन्दर :— सार्वभौमगृहे भुञ्जन् स्वनिन्दकममोघकम्। अङ्गीकुर्वन् स्फुटां चक्रे गौरः स्वां भक्तवश्यताम्॥१॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीसार्वभौमके घरमें भोजन करते समय अपने निन्दक अमोघ-भट्टाचार्यको अङ्गीकार करके श्रीगौरचन्द्रने स्पष्टरूपसे अपनी भक्तवश्यताको प्रकाश किया था॥१॥ अनुभाष्य— गौरः सार्वभौमगृहे (भट्टाचार्यभवने) भुञ्जन् (भिक्षां स्वीकुर्वन्) स्वनिन्दकं (निज-निन्दाकारिणम्) अमोघकं (तन्नामकं सार्वभौमदुहितृ-'षष्ठी'-पतिम्) अङ्गीकुर्वन् (निजदासगणमध्ये गणयन्) स्वां (निजां) भक्तवश्यतां (अनुगत-जनबाध्यतां) स्फुटां (व्यक्तीभूतां) चक्रे (कृतवान्)॥१॥ श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। 'अमोघ'— श्रीसार्वभौमकी पुत्री 'षष्ठी'का पति॥१॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥२॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौरभक्तोंकी जय हो॥२॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके श्रोताओंकी जय :— जय श्रीचैतन्यचरितामृत-श्रोतागण। चैतन्यचरितामृत—याँर प्राणधन॥३॥ । 1