श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 15/3-11 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-श्रीचैतन्य-चरितरूपी अमृत ही जिनका प्राणधन है, उन श्रीचैतन्यचरितामृतके श्रोताओंकी जय हो॥3॥ भक्तोंके साथ महाप्रभुकी पुरुषोत्तम-लीला :- एइमत महाप्रभु भक्तगण-सङ्गे। नीलाचले राहि' करे नृत्यगीत-रङ्गे ॥4॥ अनुवाद-इस प्रकार नीलाचलमें रहकर महाप्रभु भक्तोंके साथ नृत्य-गान करके आनन्दका आदान-प्रदान करते थे॥4॥ प्रथम-वत्सरे जगन्नाथ-दरशन। नृत्यगीत करे दण्ड, प्रणाम, स्तवन ॥5॥ अनुवाद-(ग्रन्थकार महाप्रभुके संन्यास ग्रहण करनेके बाद प्रथम वर्षकी कुछ लीलाओंका वर्णन करते हुए कह रहे हैं-) महाप्रभु श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन करते और उनके आगे नृत्य-गीत, दण्डवत्-प्रणाम और उनकी स्तुति करते ॥5॥ मध्याह्न भोगके बाद श्रीहरिदासके साथ साक्षात्कार :- 'उपलभोग' लागिले करे बाहिरे विजय। हरिदास मिलि' आइसे आपन-निलय ॥6॥ अनुवाद-'उपलभोग' लगनेके समय महाप्रभु मन्दिरसे बाहर चले आते। तब वे श्रीहरिदास ठाकुरसे मिलकर अपने आवास-स्थानपर आ जाते ॥6॥ अनुभाष्य-मध्याह्नकालमें भोगवर्धन-खण्डमें भोग अर्थात् उपल-भोग लगनेपर महाप्रभु श्रीमन्दिरसे बाहर चले आते। उससे पहले गरुड़-स्तम्भके पीछे खड़े होकर दण्डवत्-प्रणाम और स्तवादि करते थे। लौटते समय 'सिद्धबकुल'में श्रीहरिदास ठाकुरके साथ मिलकर अपने वासस्थान श्रीकाशीमिश्र-भवनमें आ जाते॥6॥ अपने वासस्थानमें बैठकर नामकीर्तन, श्रीअद्वैतके द्वारा महाप्रभुकी पूजा :- घरे बसि' करे प्रभु नाम-सङ्कीर्त्तन। अद्वैत आसिया करे प्रभुर पूजन ॥7॥ अनुवाद-महाप्रभु अपने वास-स्थानमें बैठकर नाम-जप करते। एक दिन श्रीअद्वैताचार्यने वहाँ आकर महाप्रभुकी पूजा की॥7॥ सुगन्धि-सलिले देन पाद्य, आचमन। सर्वाङ्गे लेपये प्रभुर सुगन्धि चन्दन ॥8॥ गले माला देन, माथाय दिल तुलसी-मञ्जरी। जोड़-हाते स्तुति करे पदे नमस्करि' ॥9॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यने महाप्रभुके चरण और मुख धोने (पाद्य और आचमन) के लिये सुगन्धित जल प्रदान करके महाप्रभुके समस्त अङ्गोंपर सुगन्धित चन्दनका लेपन किया। उन्होंने महाप्रभुके गलेमें माला पहनायी और उनके मस्तकपर तुलसी-मञ्जरी प्रदान की। तब उन्होंने हाथोंको जोड़कर महाप्रभुके चरणोंमें प्रणाम करते हुए उनकी स्तुति की॥8-9॥ अमृतानुकणिका-महाप्रभु यद्यपि स्वयं भगवान् हैं और उनके चरणोंमें तुलसी देनेसे कोई अपराध नहीं होता। परन्तु महाप्रभु उस समय भक्तरूपमें लीला कर रहे थे, इसलिये श्रीअद्वैताचार्यने उनके मस्तकपर तुलसी-मञ्जरी प्रदान की ॥8-9॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीअद्वैतका प्रतिपूजन :- पूजा-पात्रे पुष्प-तुलसी शेष ये आछिल। सेइ सब लञा प्रभु आचार्ये पूजिल ॥10॥ 'योऽसि सोऽसि नमोऽस्तु ते' एइ मन्त्र पड़े। मुखवाद्य करि' प्रभु हासाय आचार्ये ॥11॥ अनुवाद-पूजा-पात्रमें जो भी पुष्प और तुलसी-पत्र बच गये, महाप्रभुने उनके द्वारा श्रीअद्वैताचार्यकी पूजा की। पूजा करते समय उन्होंने यह मन्त्र पढ़ा,-'आप जो हो, सो हो, मैं आपको नमस्कार करता हूँ।' तथा अपने मुखसे वाद्ययन्त्रकी भाँति कुछ ध्वनि की जिसे सुनकर श्रीअद्वैताचार्य हँसने लगे ॥10-11॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'आप जो हो, सो हो, मैं 2 ।