भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1449, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1449

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/11-19 ] आपको ही नमस्कार करता हूँ,—यह मन्त्र पढ़कर आचार्यकी पूजा की॥ 11 ॥ अनुभाष्य—कोई यह पाठ बोलते हैं— “राधे कृष्ण रमे विष्णो सीते राम शिवे शिव। योऽसि सोऽसि नमो नित्यं योऽसि सोऽसि नमोऽस्तु ते।” अर्थात् “आप चाहे राधा-कृष्ण या रमा-विष्णु या सीता-राम या शिवानी-शिव, जो हों, सो हों, मैं आपको नमस्कार करता हूँ, नित्य नमस्कार करता हूँ॥” 11 ॥ अमृतानुकणिका—उपरोक्त मन्त्र शिवमन्त्रका एक विशेष अंश है। श्रीअद्वैताचार्य सदाशिव हैं, इसलिये महाप्रभुने उनकी इस मन्त्रके द्वारा पूजा की ॥ 10-11 ॥ एइमत अन्योन्ये करेन नमस्कार। प्रभुरे निमन्त्रण करे आचार्य बार बार ॥ 12 ॥ आचार्यके वासस्थानपर महाप्रभुकी भिक्षा— श्रीचैतन्यभागवतमें वर्णित :— आचार्येर निमन्त्रण—आश्चर्य-कथन। विस्तारि' वर्णियाछेन दास-वृन्दावन ॥ 13 ॥ एक-एक भक्तके घरमें सगण महाप्रभुको निमन्त्रण :— पुनरुक्ति हय ताहा, ना कैलुँ वर्णन। आर भक्तगण करे प्रभुरे निमन्त्रण ॥ 14 ॥ एक एक दिन एक एक भक्तगृहे महोत्सव। प्रभु-सङ्गे ताँहा भोजन करे भक्त सब ॥ 15 ॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु और श्रीअद्वैताचार्यने परस्पर एक-दूसरेको नमस्कार किया। उसके बाद श्रीअद्वैताचार्य बार-बार महाप्रभुको अपने वासस्थानपर भोजनके लिये निमन्त्रण करते। एक दिन श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा महाप्रभुको निमन्त्रण करनेकी घटना बहुत आश्चर्यजनक है। श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने श्रीचैतन्यभागवतमें इसका विस्तारसे वर्णन किया है। पुनरुक्ति दोष हो जायेगा, इसलिये मैं (ग्रन्थकार) उसका वर्णन नहीं कर रहा हूँ। इसी प्रकार अन्यान्य भक्त भी महाप्रभुको निमन्त्रण देते थे। एक-एक दिन एक-एक भक्तके स्थानपर महोत्सव होता और महाप्रभुके साथ समस्त भक्त भी वहाँपर भोजन करते थे ॥ 12-15 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीचैतन्यभागवतमें अन्त्यखण्ड, नौवाँ अध्याय देखें ॥ 13 ॥ गौड़ीयगणोंका महाप्रभुके साथ चारमास रहना :— चारिमास रहिला सबे महाप्रभु-सङ्गे। जगन्नाथेर नाना यात्रा देखे महारेङ्गे ॥ 16 ॥ अनुवाद—समस्त भक्त चार मास तक नीलाचलमें महाप्रभुके साथ रहे और उन्होंने बड़े आनन्दसे श्रीजगन्नाथदेवके सभी महोत्सवोंका दर्शन किया ॥ 16 ॥ नन्दोत्सवके दिन गोपवेशमें भक्तोंके साथ ब्रजलीलाका अभिनय :— कृष्णजन्मयात्रा-दिने नन्द-महोत्सव। गोपवेश हैला प्रभु लञा भक्त सब ॥ 17 ॥ दधिदुग्ध-भार प्रभु निज-स्कन्धे करि'। महोत्सव-स्थाने आइला बलि 'हरि' 'हरि' ॥ 18 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण-जन्माष्टमीके अगले दिन नन्द-महोत्सवमें महाप्रभु और सभी भक्तोंने गोपवेश धारण किया। महाप्रभु दूध और दहीसे भरे पात्रोंको अपने कन्धोंपर उठाकर 'हरि' 'हरि' बोलते हुए महोत्सव-स्थलपर आये ॥ 17-18 ॥ अनुभाष्य—'कृष्णजन्मयात्रा-दिन'—जन्माष्टमीसे अगले दिन अर्थात् नन्दोत्सवके दिन ॥ 17 ॥ श्रीकानाइ-खुटियाका 'नन्द' और श्रीजगन्नाथ-माहातिका 'यशोदा'-वेश :— कानाइ-खुटिया आछेन 'नन्द' वेश धरि'। जगन्नाथ-माहाति हञाछेन 'व्रजेश्वरी' ॥ 19 ॥ अनुवाद—श्रीकानाइ खुटियाने श्रीनन्द महाराजका वेश धारण किया। और श्रीजगन्नाथ-माहातिने व्रजेश्वरी श्रीयशोदाका वेश धारण किया ॥ 19 ॥ । 3

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला) · पृष्ठ 1449, कुल 2549 में से · BharatKosha