भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1451, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1451

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/27-36 ] बहुमूल्य वस्त्र प्रभु मस्तके बान्धिल। आचार्यादि प्रभुर गणरे पराइल ॥ 28 ॥ अनुवाद—महाराज प्रतापरुद्रकी आज्ञासे तुलसी पड़िछा श्रीजगन्नाथदेवका एक प्रसादी वस्त्र ले आये। श्रीतुलसी पड़िछाने उस बहुमूल्य वस्त्रके एक खण्डको महाप्रभुके मस्तकपर बाँध दिया। तब उन्होंने श्रीअद्वैताचार्य आदि महाप्रभुके भक्तोंके मस्तकपर भी उस प्रसादी वस्त्रके खण्डोंको बाँधा ॥ 27-28 ॥ श्रीकानाइ और श्रीजगन्नाथका धनादि-वितरण :- कानाञि-खुटिया, जगन्नाथ, —दुइ जन। आवेशे बिलाइल, घरे छिल यत धन ॥ 29 ॥ अनुवाद—श्रीकानाइ खुटिया और श्रीजगन्नाथ माहाति जिन्होंने श्रीनन्द और श्रीयशोदाके वेश धारण किये थे, उस आवेशमें उनके घरमें जितना भी धन था, नन्दोत्सवके उपलक्ष्यमें उन्होंने वह समस्त धन बाँट दिया ॥ 29 ॥ अनुभाष्य—भागवत 10/3/9 संख्या देखें ॥ 29 ॥ महाप्रभुका सन्तोष और माता-पिताको प्रणाम :- देखि' महाप्रभु बड़ सन्तोष पाइला। मातापिता-ज्ञाने दुँहे नमस्कार कैला ॥ 30 ॥ परम-आवेशे प्रभु आइला निज-घर। एइमत लीला करे गौराङ्गसुन्दर ॥ 31 ॥ अनुवाद—उनके इन भावोंको देखकर महाप्रभु बहुत सन्तुष्ट हुए और उन दोनोंको माता-पिता मानकर उन्हें प्रणाम किया। तब उस परम-आवेशमें महाप्रभु अपने वासस्थानपर आ गये। श्रीगौराङ्गसुन्दर इस प्रकार मधुर लीलाएँ करते हैं ॥ 30-31 ॥ विजया-दशमी-तिथिमें भक्तोंको वानर-सेनाके रूपमें सजाकर स्वयं हनुमानकी लीलाका अभिनय :- विजया-दशमी—लङ्का-विजयेर दिने। वानर-सैन्य कैला प्रभु लञा भक्तगणे ॥ 32 ॥ हनुमान्-आवेशे प्रभु वृक्षशाखा लञा। लङ्का-गड़े चड़ि' फेले लङ्का भाङ्गिया ॥ 33 ॥ अनुवाद—भगवान् श्रीरामचन्द्रकी लङ्का-विजयके लिये शुभ यात्रा प्रारम्भके दिन विजया-दशमीपर महाप्रभुने अपने भक्तोंको वानर-सेनाके वेशमें सजाया। हनुमानके आवेशमें स्वयं महाप्रभु वृक्षकी शाखाको लेकर लङ्का नगरीके बाहरकी खाईको पारकर लङ्कामें प्रवेश करके उसे तोड़ने-फोड़ने लगे ॥ 32-33 ॥ अनुभाष्य—'लङ्का-गड़'—लङ्का नगरीके चारों ओरकी खाई ॥ 33 ॥ रावण-वध-लीलामें उद्यत महाप्रभु :- 'काँहारे रावणा' प्रभु कहे क्रोधावेशे। 'जगन्माता हरे पापी, मारिमु सवंशे ॥' 34 ॥ अनुवाद—हनुमानके आवेशमें महाप्रभु क्रोधमें भरकर कहने लगे, —'कहाँ है रावण?' 'उस पापीने जगन्माता सीताका हरण किया है, इसलिये मैं उसे वंशसहित मार डालूँगा ॥' 34 ॥ अनुभाष्य—'जगन्माता'—सीतादेवी ॥ 34 ॥ लोगोंका विस्मय और जयध्वनि :- गोसाञिर आवेश देखि' लोके चमत्कार। सर्वलोक 'जय' 'जय' करे बारबार ॥ 35 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके आवेशको देखकर लोग आश्चर्यचकित हो गये। सभी लोग बार-बार 'जय- जयकार' करने लगे ॥ 35 ॥ कार्तिक मासके वैष्णव-पर्व आदिका दर्शन :- एइमत रासयात्रा, आर दीपावली। उत्थान-द्वादशी-यात्रा देखिला सकलि ॥ 36 ॥ अनुवाद—महाप्रभु और उनके भक्तोंने इसी प्रकार कार्तिक मासके सभी उत्सवों, जैसे—रासलीला, दीपावली, देवोत्थान-द्वादशी आदिमें भाग लिया ॥ 36 ॥ | 5