श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1452, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 15/36-43 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—'दीपावली'—दीवाली कार्तिक मासकी अमावस्या; 'उत्थान-द्वादशी-यात्रा'—कार्तिकी शुक्ला-द्वादशी; चातुर्मास-व्रत, समुद्रस्नान, नगर-परिक्रमा आदि यात्री-कृत्य॥ 36॥ श्रीनिताइके साथ एकान्त स्थानमें परामर्श :- एकदिन महाप्रभु नित्यानन्दे लञा। दुइ भाइ युक्ति कैल निभृते बसिया॥ 37॥ अनुवाद—एक दिन महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु, दोनों भाइयोंने एकान्तमें बैठकर कुछ परामर्श किया॥ 37॥ बादमें फलसे भक्तोंके द्वारा कारणका अनुमान :- किवा युक्ति कैल दुँहे, केह नाहि जाने। फले अनुमान पाछे कैल भक्तगणे॥ 38॥ अनुवाद—उन दोनोंने क्या परामर्श किया, इसे कोई नहीं जान सका, परन्तु बादमें भक्तोंने उसके फलसे उसका अनुमान लगाया॥ 38॥ समस्त गौड़ीय-भक्तोंको प्रतिवर्ष गुण्डिचामें मिलनेके लिये उपदेश देकर विदायी देना :- तबे महाप्रभु सब भक्ते बोलाइल। ‘गौड़देशे याह’ सबे विदाय करिल॥ 39॥ सबारे कहिल,—“प्रति वत्सर आसिया। गुण्डिचा देखिया याबे आमारे मिलिया॥” 40॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने सभी भक्तोंको बुलवाया और 'गौड़देश जाओ' कहकर सबको विदायी दी। महाप्रभुने सभी भक्तोंसे कहा,—“तुम सब प्रत्येक वर्ष आना और मेरे साथ गुण्डिचा अर्थात् रथ-यात्राके दर्शन करना॥” 39-40॥ श्रीअद्वैतको प्रचारका आदेश :- आचार्येरे आज्ञा दिल करिया सम्मान। “आ-चण्डाल आदि कृष्णभक्ति दिओ दान॥” 41॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यका सम्मान करते हुए उन्हें आज्ञा दी,—“आप ब्राह्मणसे लेकर चण्डाल आदि तक सभीको कृष्णभक्तिका दान करना॥” 41॥ श्रीनिताइको प्रचारका आदेश :- नित्यानन्दे आज्ञा दिल,—“याह गौड़देशे। अनर्गल प्रेमभक्ति करिह प्रकाशे॥ 42॥ श्रीनिताइके प्रचारके सङ्गी—श्रीअभिराम और श्रीदास-गदाधर :- रामदास, गदाधर आदि कत जने। तोमार सहाय लागि' दिलुँ तोमार सने॥ 43॥ अदृश्य रहकर गौड़देशमें श्रीनिताइके नृत्य-दर्शनको अङ्गीकार करना :- मध्ये मध्ये आमि तोमार निकटे याइब। अलक्षिते रहि' तोमार नृत्य देखिब॥” 44॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको आज्ञा दी,—“आप गौड़देशमें जाकर अधिकारी, अनधिकारी, जाति, वर्ण, उच्च-नीचका विचार किये बिना सर्वत्र प्रेमभक्तिका दान करना। मैं रामदास, गदाधरादि कुछ भक्तोंको आपकी सहायताके लिये आपके साथ भेज रहा हूँ। बीच-बीचमें मैं भी आपके निकट जाऊँगा और अलक्षित रूपमें रहकर आपके नृत्यको देखूँ गा॥” 42-44॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'गदाधर'—आँड़ियादह-वासी गदाधर-दास॥ 43॥ अनुभाष्य—'नित्यानन्दे आज्ञा'—प्राकृत-सहजिया लोग रोहिणीनन्दन श्रीबलरामसे अभिन्न श्रीनित्यानन्द प्रभुको अपने समान प्राकृत मनुष्य समझकर ऐसा कहते हैं,—'महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको वंशकी रक्षा (?) करनेके लिये श्रीनीलाचलसे श्रीगौड़देशमें भेजा।' श्रीनित्यानन्द प्रभुके चरणकमलोंमें अपराधके कारण ही उनमें ऐसी पाखण्डी बुद्धि उदित हुई है। यद्यपि श्रीनित्यानन्द प्रभु समस्त ईश्वरविग्रह-विष्णु-तत्त्वके मूल 6 |