भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1453

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/42-51 ] स्रोत हैं, तथापि प्राकृत सहजिया आदि लोग उन्हें अपने जैसे एक 'कुणपात्मवादी' (कफ-वात-पित्त-इन तीन धातुओंसे बने इस शरीरको आत्मा माननेवाले) और यमदण्डके भागी जड़ेन्द्रिय-भोगोंमें लिप्त जन्म-मरणके चक्रमें बँधे जीवमात्र मानते हैं। इस अपराधके कारण वे लोग नरक-पथके ही पथिक बनते हैं। ऐसे लोग कनक-कामिनी-प्रतिष्ठाके लोभी, व्यापारी-स्वभाववाले और स्वार्थपरायण होते हैं। वे अज्ञानी लोगोंको ठगनेके अपने व्यवसायका, दुर्भावनाके कारण 'सर्वत्र निन्दित स्त्रीसङ्ग'की लालसाका और गृहव्रत अथवा गृहेमेध- धर्मका अन्याय और अशास्त्रीय विचारसे समर्थन करनेका सुयोग ढूँढ़ते हैं। इसलिये वे अपने उपजाऊ मस्तिष्कमें ऐसे शास्त्रविरुद्ध मतको उत्पन्न करके श्रीनित्यानन्द प्रभुका उदाहरण देकर उनकी ईश्वर-चेष्टाओं अर्थात् लीलाओंकी नकल करते हैं। वास्तवमें, महावदान्य श्रीनित्यानन्द प्रभु श्रीकृष्णप्रेमदाता महाप्रभुके अभिन्न प्रकाश-विग्रह हैं। ब्रह्माजीने वंशवृद्धिके द्वारा सृष्टिकी रक्षाके लिये रजोगुणाश्रित प्रजापतियोंको आदेश दिया था। परन्तु श्रीनित्यानन्द प्रभुको वैसे इन्द्रिय-तृप्तिरूपी कार्यके सहायकके रूपमें किसी आदेशकी बात किसी प्रामाणिक ग्रन्थमें नहीं लिखी है, और हो भी नहीं सकती, क्योंकि वह किसी प्रकारसे श्रवणके योग्य नहीं है। ऐसी बातोंका प्रचार करके प्राकृत-स्त्रीसङ्गी-सहजिया लोग स्वयं तो परमार्थसे वञ्चित होते ही हैं, और साथ ही सद्-असद्के विवेकसे हीन जगत्की भी वञ्चना करके जगत्में अमङ्गल ही उत्पन्न करते हैं॥42॥ श्रीवासाङ्गनमें नित्य नृत्य करनेको अङ्गीकार करना :- श्रीवास-पण्डिते प्रभु करि' आलिङ्गन। कण्ठे धरि' कहे तारे मधुर वचन॥45॥ “तोमार घरे कीर्त्तने आमि नित्य नाचिब। तुमि देखा पाबे, आर केह ना देखिब॥46॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीवास पण्डितको आलिङ्गन करके उनके गलेमें अपनी भुजा डालकर उन्हें मधुर वचन कहे, - “तुम्हारे घरमें होनेवाले कीर्तनमें मैं नित्य नृत्य करूँगा, तुम मुझे नृत्य करते हुए देख पाओगे, अन्य कोई भी नहीं देख पायेगा॥"45-46॥ मातृवत्सल महाप्रभुका माताको सान्त्वना देनेके लिये श्रीवासके हाथमें वस्त्रके टुकड़ेको देना और माताके त्याग हेतु अपराधके लिये क्षमा-प्रार्थना :- एइ वस्त्र माताके दिह', एइ सब प्रसाद। दण्डवत् करि' आमार क्षमाइह अपराध॥47॥ अनुवाद-(वस्त्रके एक खण्ड और प्रसादको उनके हाथोंमें देते हुए महाप्रभुने आगे कहा-) यह सब माताको दे देना। मेरी ओरसे उन्हें दण्डवत् करके मेरे द्वारा किये गये अपराधके लिये उनसे क्षमा माँगना॥47॥ वात्सल्यरस-विरोधी संन्यास-वेष-ग्रहण-हेतु स्वयंको धिक्कार देना :- ताँर सेवा छाड़ि' आमि करियाछि संन्यास। धर्म नहे, करि आमि निज-धर्मनाश॥48॥ ताँर प्रेम-वश आमि, ताँर सेवा-धर्म। ताहा छाड़ि' करियाछि वातुलरे कर्म॥49॥ वातुल बालकेर माता नाहि लय दोष। एइ जानि' माता मोरे ना करय रोष॥50॥ कि काय संन्यासे मोर, प्रेम निज-धन। ये-काले संन्यास कैलूँ, छत्र हैल मन॥51॥ अनुवाद-उनकी सेवाको छोड़कर मैंने संन्यास ग्रहण किया है, यह कोई धर्मका कार्य नहीं है। ऐसा करके मैंने अपने धर्मका नाश किया है। मैं उनके प्रेमके वशीभूत हूँ और उनकी सेवा करना ही मेरा धर्म है। उस धर्मको छोड़कर मैंने पागल व्यक्ति जैसा कार्य किया है। माता अपने पागल बालकका कोई दोष नहीं लेती। ऐसा जानकर ही माता मेरे प्रति क्रोध नहीं करती। माताका प्रेम जो मेरा वास्तविक धन है, उसका । 7