भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1454, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1454

[ 15/48-51 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला त्याग करके मुझे संन्यास नहीं लेना चाहिये था। मैंने जिस समय संन्यास ग्रहण किया था, उस समय मेरा मन विक्षिप्त (पागल) हो गया था॥48-51॥ अनुभाष्य—मैं संन्यास लेकर माताके सेवारूपी धर्मका पालन नहीं करके धर्मसे भ्रष्ट हुआ हूँ॥48॥ अमृताणुकणा—श्रीमद्भगवद्गीतामें (18/66) भगवान् श्रीकृष्णने स्वयं घोषणा की है- “सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥” इसलिये उसके अनुसार सब प्रकारके नश्वर धर्मोंका परित्याग करनेवाले श्रीकृष्णके एकान्त शरणागत किसी संन्यासीके लिये पुनः किसी नश्वर धर्मका पालन न करनेसे जनित पापकी आशङ्का नहीं रह सकती है। धर्मकी संस्थापनाके लिये अवतीर्ण स्वयं भगवान् श्रीगौरसुन्दरने गीतामें अपने कहे गये उक्त वाक्यकी ही परम-सार्थकता सम्पादन करनेके लिये स्वयं ही सभी धर्मोंको त्यागकर और संन्यास ग्रहण करके श्रीकृष्णकी शरण ग्रहण करनेका उज्ज्वलतम दृष्टान्त स्थापित किया था। इसलिये “ताँहार सेवा छाड़ि' आमि करियाछि संन्यास। धर्म নহে, करि आमि निज धर्म नाश॥” आदि वचनके द्वारा उनकी कोई जड़ासक्तिका आश्रय सूचित नहीं होता है, बल्कि शचीमाताके साथ उनका नित्य सम्बन्ध ही इसके द्वारा ज्ञापित हुआ है। शचीमाता श्रीगौरसुन्दरकी नित्यसिद्ध पार्षद हैं। वे वात्सल्य-रसकी मूल आश्रय-विग्रह हैं। विषय-विग्रह और आश्रय-विग्रह दोनोंके मध्य परस्पर जो नित्य सेव्य-सेवकका सम्बन्ध है, वह कोई जड़ीय या नश्वर सम्बन्ध नहीं है—उसे ही श्रीगौरसुन्दरने श्रीवास पण्डितको बतलाया है। भक्तके प्रति भगवान्का जो 'निजधर्म' है, उसको उन्होंने स्वयं ही व्यक्त किया है—“ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्” (गीता 4/11)। शचीमाता वात्सल्य-रसमें श्रीगौरहरिकी नित्य उपासिका हैं, इसलिये उनसे उक्त रसमें सेवा ग्रहण करना ही श्रीगौरसुन्दरका 'निजधर्म' है। “ताँर प्रेम वश आमि, ताँर सेवा-धर्म।” वहाँपर संन्यास-ग्रहण वात्सल्य-रसका विरोधी होनेपर उनका उक्त 'निजधर्म' बाहरी रूपसे नाश हुआ। किन्तु परोक्षरूपसे उन्होंने अपनी अचिन्त्यशक्तिके बलसे शचीमाताके निकट जाकर उनकी प्रेमसेवा ग्रहण करके उस 'निजधर्म'का ही पालन किया। “नित्य याइ देखि मुञि ताँहार चरणे। स्फूर्त्तिज्ञाने तेंहो सत्य नाहि माने॥” (मध्यलीला 15/53) श्रीगौरसुन्दर यहाँपर अपने विषयविग्रहोचित-भावको व्यक्त करते हुये कह रहे हैं,—“कि काय संन्यासे मोर, प्रेम निज धन।” श्रीकृष्ण सेवामें नियोजित होना ही त्रिदण्डी भिक्षुका एकमात्र व्रत है और श्रीकृष्णप्रेमधन ही उसके उस निवॄत्तिमार्गका 'महाफल' है। किन्तु वह प्रेमधन श्रीगौरसुन्दरका एकान्त अपना—“प्रेम निजधन” है। अद्वयज्ञान-परतत्त्व श्रीगौरसुन्दर अपने नित्य प्रेममय परिकरों और धामके साथ स्वयं पूर्ण तत्त्व हैं। इसलिये उक्त प्रेमधनके लिये उनको संन्यास ग्रहण करनेकी कोई अपेक्षा नहीं है। “न मे पार्थास्ति कर्त्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।” (गीता 3/22) ऐसा होनेपर तब उनके संन्यास ग्रहण करनेका क्या कारण है? इसके उत्तरमें कहते हैं—“ये काले संन्यास कैलु, छत्र हैल मन।” श्रीकृष्ण सम्भोग-विग्रह हैं, श्रीराधा विप्रलम्भ-मूर्ति हैं और श्रीगौररूपी कृष्ण श्रीराधाभावोंके आस्वादनकारी हैं। उन श्रीराधाभावोंका आस्वादन करनेके लिये विप्रलम्भ-महाभावमें जो प्रबल श्रीकृष्ण-अन्वेषणकी चेष्टा और श्रीकृष्णसे इतर विषयोंसे जो तीव्र वैराग्य है, उससे प्रेरित होकर ही श्रीगौरकृष्णने मुख्यतः संन्यास ग्रहण किया। “प्रभु बोले,—शुन सार्वभौम महाशय। 'संन्यासी' आमारे नाहि जानिह निश्चय॥ कृष्णेर विरहे मुञि विक्षिप्त हइया। बाहिरे हइलुँ शिखा-सूत्र मुड़ाइया॥” (चैः भाः अः 3/66-67)। अर्थात् यहाँपर उनका वह सुतीव्र विप्रलम्भजनित दिव्योन्माद ही उक्त 'छन्न हैल मन' वाक्यका मुख्य तात्पर्य है और दूसरे प्रकारसे उक्त वाक्यसे पाखण्डी मायावादी, कर्मनिष्ठ, निन्दक आदि जीवोंके उद्धार 8 |

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