भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1455

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/48-62 ]

करनेकी वासनाके द्वारा उनके आवृत्त-चित्तको ही समझना चाहिये॥ 48-51॥

मायापुरमें बीच-बीचमें शचीमाताके दर्शनके लिये आगमन स्वीकार करना :- नीलाचले आछि मुञि ताँहार आज्ञाते। मध्ये मध्ये आसिमु, ताँर चरण देखिते॥ 52 ॥

अनुवाद—मैं नीलाचलमें उन्हींकी आज्ञासे ही वास कर रहा हूँ। मैं बीच-बीचमें उनके चरणोंके दर्शन करनेके लिये आऊँगा॥ 52 ॥

पहलेसे ही नित्य शचीमाताके साथ साक्षात्कार, किन्तु महाप्रभुकी मायाके प्रभावसे शचीमाताका संशय :- नित्य याइ' देखि मुञि ताँहार चरणे। स्फूर्त्ति-ज्ञाने तैं हो ताहा सत्य नाहि माने॥ 53 ॥

अनुवाद—वास्तवमें तो मैं प्रतिदिन जाकर उनके चरणोंका दर्शन करता हूँ, किन्तु वे इसे स्फूर्ति समझनेके कारण उसे सत्य नहीं मानती॥ 53 ॥

शचीमाताके विश्वासको उत्पन्न करनेके लिये एक दिनकी घटनाका वर्णन :- एकदिन शाल्यन्न, व्यञ्जन पाँच-सात। शाक, मोचा-घण्ट, भृष्ट-पटोल-निम्बपात॥ 54 ॥ लेम्बु-आदाखण्ड, दधि, दुग्ध, खण्डसार। शालग्रामे समर्पिलैन बहु उपहार॥ 55 ॥

अनुवाद—एक दिन माताने शाल्यन्न (विशेष प्रकारके चावल), पाँच-सात प्रकारके व्यञ्जन, साग, केलेके फूलोंकी बनी सब्जी, नीमकी पत्तियोंके साथ बने परमल, नीबूँ और अदरकके टुकड़े, दही, दूध तथा खण्डसार आदि बहुतसे नैवेद्य शालग्रामको समर्पित किये॥ 54-55 ॥

अनुभाष्य—'शाल्यन्न'—शालि-धानके चावलका अन्न; 'भृष्ट-पटोल-निम्बपात'—नीमके पत्तोंके साथ परमलको मिलाकर बनायी गयी सूखी भाजी॥ 54 ॥


प्रसाद लञा कोले करेन क्रन्दन। 'निमाइर प्रिय मोर—एसब व्यञ्जन॥ 56 ॥ निमाइ नाहिक एथा, के करे भोजन।' मोर ध्याने अश्रुजले भरिल नयन॥ 57 ॥ शीघ्र याइ' मुञि सब करिनु भक्षण। शून्यपात्र देखि' अश्रु करिया मार्जन॥ 58 ॥

अनुवाद—प्रसादको अपनी गोदमें लेकर माता रोते हुए सोचने लगीं,—'ये सब व्यञ्जन मेरे निमाइको बहुत प्रिय हैं, किन्तु निमाइ यहाँपर नहीं है, तो कौन इन्हें खायेगा?' इस प्रकार मेरा ध्यान करते हुए उनके नेत्र आँसुओंसे भर गये। मैंने शीघ्रतासे वहाँ जाकर वे सब व्यञ्जन खा लिये। माताने पात्रको खाली देखकर अपने आँसुओंको पोंछा॥ 56-58 ॥

'के अन्न-व्यञ्जन खाइल, शून्य केने पात? बालगोपाल किंवा खाइल सब भात?॥ 59 ॥ किंवा मोर कथाय मने भ्रम हञा गेल! किंवा कोन जन्तु आसिं सकल खाइल?॥ 60 ॥ किंवा आमि अन्न पात्रे भ्रमे ना बाड़िल।' एत चिन्ति' पाक-पात्र याञा देखिल॥ 61 ॥

अनुवाद—'अरे! किसने चावल और ये सब व्यञ्जन खाये, पात्र खाली क्यों है? क्या बालगोपालने सब चावल खा लिये? या फिर मेरी बातोंसे मेरे ही मनमें भ्रम उत्पन्न हो गया है। या फिर किसी जन्तुने आकर यह सब खा लिया? या फिर मैंने इस पात्रमें भ्रमवशतः कुछ रखा ही नहीं था।' यह सोचकर माता रसोईमें भोजन बनानेवाले बर्तनोंको जाकर देखने लगीं॥ 59-61 ॥

अन्नव्यञ्जनपूर्ण देखि' सकल भाजने। देखिया संशय हैल किछु चमत्कार मने॥ 62 ॥

अनुवाद—चावल और अन्यान्य सभी व्यञ्जनोंसे

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