श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1456, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 15/62-72 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भरे बर्तनोंको देखकर माताके मनमें कुछ संशय हुआ तथा साथ ही मनमें कुछ आश्चर्य भी हुआ ॥ 62 ॥ अनुभाष्य- 'भाजन'-आधार, पात्र ॥ 62 ॥ ईशाने बोलाञा पुनः स्थान लेपाइल। पुनरपि गोपालके अन्न समर्पिल ॥ 63 ॥ अनुवाद-माताने ईशानको बुलाकर पुनः उस स्थानको साफ करवाया और उन्होंने पुनः गोपालको नैवेद्य समर्पित किया ॥ 63 ॥ अनुभाष्य- 'ईशान'-आदिलीला 10/110 संख्या देखें ॥ 63 ॥ एइमत यबे करेन उत्तम रन्धन। मोरे खाओयाइते करे उत्कण्ठाय रोदन ॥ 64 ॥ अनुवाद-इस प्रकार माता जब भी उत्तम-उत्तम व्यञ्जन बनाती हैं, तभी मुझे खिलानेकी उत्कण्ठामें रोती हैं ॥ 64 ॥ ताँर प्रेमे आनि' आमाय कराय भोजने। अन्तरे सुख माने तैँहो, बाह्ये नाहि माने ॥ 65 ॥ अनुवाद-उनका प्रेम मुझे वहाँ ले जाकर मुझे भोजन कराता है। माता अपने मनमें तो सुखी होती हैं, किन्तु बाहरसे मेरे आनेको नहीं मानतीं ॥ 65 ॥ पिछली विजया-दशमीमें भी इसी प्रकार माताके द्वारा बनाये गये अन्नका भोजन :- एइ विजया-दशमीते हैल एइ रीति। ताँहाके पुछिया ताँर कराइह प्रीति ॥” 66 ॥ अनुवाद-पिछली विजया-दशमीके दिन भी ऐसा ही हुआ था। मातासे इस विषयमें पूछकर उन्हें इसका विश्वास दिलाना॥” 66 ॥ भक्तोंके विच्छेदसे महाप्रभुकी विह्वलता :- एतेक कहिते प्रभु विह्वल हइला। लोक विदाय करिते प्रभु धैर्य धरिला ॥ 67 ॥ अनुवाद-इतना कहते-कहते महाप्रभु विह्वल हो गये, किन्तु भक्तोंको विदायी देनेके लिये महाप्रभुने धैर्य धारण कर लिया ॥ 67 ॥ प्रेमवशतः महाप्रभुके द्वारा श्रीराघव-पण्डितकी शुद्धकृष्णसेवा-प्रचेष्टाका वर्णन :- राघव-पण्डिते कहेन वचन सरस। “तोमार निष्ठा-प्रेमे आमि हइँ तोमार वश ॥ 68 ॥ इँहार कृष्णसेवार कथा शुन, सर्वजन। परम पवित्र सेवा अति सर्वोत्तम ॥ 69 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने श्रीराघव-पण्डितसे ये मधुर वचन कहे,-“तुम्हारी निष्ठा और तुम्हारे प्रेमके कारण मैं तुम्हारे वशमें हूँ। (तब महाप्रभु उपस्थित भक्तोंसे कहने लगे-) सभी लोग इनके द्वारा की जानेवाली श्रीकृष्ण- सेवाके विषयमें सुनो। इनके द्वारा की जानेवाली सेवा परम पवित्र और अति सर्वोत्तम है ॥ 68-69 ॥ श्रीराघवके द्वारा महाप्रभुको अपूर्व नारियलका भोग प्रदान करनेका वैशिष्ट्य :- आर द्रव्य रहु-शुन नारिकेलेर कथा। पाँच गण्डा करि' नारिकेल बिकाय तथा ॥ 70 ॥ अनुवाद-अन्य द्रव्योंकी बात तो छोड़ दो, नारियल भेंट करनेकी ही बात सुनो। इनके गाँव पाणिहाटीमें नारियल 'पाँच गण्डे' (एक पैसे)का मिलता है ॥ 70 ॥ वाटिते कत शत वृक्षे लक्ष लक्ष फल। तथापि शुनेन, यथा मिष्ट नारिकेल ॥ 71 ॥ एक एक फलेर मूल्य दिया चारिचारि पण। दशक्रोश हैते आनाय करिया यतन ॥ 72 ॥ अनुवाद-यद्यपि इनके अपने घरमें नारियलके सैकड़ों वृक्ष हैं जिनपर लाखों फल लगे रहते हैं, तथापि ये जाननेके लिये उत्कण्ठित रहते हैं कि मीठे नारियल कहाँ मिलेंगे? तब ये एक-एक फलका चार-चार पण (अर्थात् सोलह पैसे) मूल्य देकर दस कोसकी (तीस 10 ।