भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1457

पन्द्रहवाँ अध्याय 15/71-83 ] किलोमीटरकी) दूरीसे भी उन फलोंको बहुत ही यत्नपूर्वक मँगवाते हैं॥ 71-72॥ प्रतिदिन पाँच-सात फल छोलाञा। सुशीतल करिया राखे जले डुबाइञा ॥ 73 ॥ भोगेरे समय पुनः छुलि' संस्करि' । कृष्णे समर्पण करे, मुख छिद्र करि' ॥ 74 ॥ कृष्ण सेइ नारिकेल-जल पान करि' । कभु शून्य फल राखेन, कभु जल भरि' ॥ 75 ॥ जलशून्य फल देखि' पण्डित - हरषित । फल भाङ्गि' शस्ये करे शतपात्र पूरित ॥ 76 ॥ शस्य समर्पण करि' बाहिरे धेयान । शस्य खाञा कृष्ण करे शून्य भाजन ॥ 77 ॥ कभु शस्य खाञा कृष्ण पुनः पात्र भरे शाँसे। श्रद्धा बाड़े पण्डितेर, प्रेमसिन्धु भासे ॥ 78 ॥ अनुवाद - ये प्रतिदिन पाँच-सात नारियल छीलकर उन्हें सुशीतल करनेके लिये जलमें डुबो करके रखते हैं। भोग लगानेके समय ये पुनः नारियलको छीलकर और साफ करके उसके मुखमें छेद करके उसे श्रीकृष्णको समर्पित करते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण उस नारियलके जलका पान करके कभी तो फलको खाली कर देते हैं और कभी उसे पुनः जलसे भर देते हैं। खाली नारियल देख ये बहुत प्रसन्न होते हैं कि श्रीकृष्णने नारियलके जलको ग्रहण कर लिया है। तब ये नारियलको तोड़कर उसकी मलाईको अनेक पात्रोंमें भरकर उसे श्रीकृष्णको समर्पित करके बाहर बैठकर ध्यान करते हैं। इस बीच श्रीकृष्ण मलाईको खाकर उस पात्रको खाली कर देते हैं। कभी-कभी श्रीकृष्ण मलाई खाकर पुनः उस पात्रको मलाईसे भर देते हैं। यह सब देखकर इनकी श्रद्धा बढ़ जाती है और ये प्रेम-सिन्धुमें निमग्न हो जाते हैं ॥ 73-78 ॥ एक दिनकी घटनाका वर्णन :- एक दिन फलदश संस्कार करिया । भोग लागाइते सेवक आइल लञा ॥ 79 ॥ अवसर नाहि हय, विलम्ब हइल। फल-पात्र-हाते सेवक द्वारे त' रहिल ॥ 80 ॥ द्वारेर उपर भिते तैं हो हात दिल। सेइ हाते फल छुँइल, पण्डित देखिल ॥ 81 ॥ अनुवाद - एक दिन इनका सेवक दस नारियलोंको छीलकर भोग लगानेके लिये लेकर आया। उस दिन भोग लगानेके लिये बहुत कम समय बचा था, क्योंकि किसी कारणसे इन्हें आनेमें विलम्ब हो गया था। और इनकी प्रतीक्षामें सेवक अपने हाथमें नारियलके पात्रको लेकर द्वारपर ही खड़ा रहा। तभी इन्होंने देखा कि सेवकने द्वारके ऊपरकी दीवारको अपने हाथोंसे छुआ और उसी हाथसे फिर नारियलको छू लिया ॥ 79-81 ॥ अनुभाष्य - 'उपर-भिते'- ऊपरकी दीवारपर; 'तैंहों'- श्रीराघव पण्डितका सेवक ॥ 81 ॥ पण्डित कहे, - 'द्वारे लोक करे गतायाते। तार पदधूलि उड़ि' लागे उपर-भिते ॥ 82 ॥ सेइ भिते हात दिया फल परशिला। कृष्ण-योग्य नहे, फल अपवित्र हैला ॥ '83 ॥ अनुवाद - इन राघव पण्डितने उस सेवकसे कहा, - 'द्वारसे लोग आवागमन करते हैं। उनके पैरोंकी धूलि उड़कर ऊपरवाली दीवारपर भी लग जाती है। उसी दीवारपर हाथ लगाकर तुमने नारियलको स्पर्श किया है। इसी कारण ये फल श्रीकृष्णको समर्पित करनेके योग्य नहीं हैं, ये अपवित्र हो गये हैं ॥ '82-83 ॥ अनुभाष्य - श्रीराघव पण्डित साधारण 'शुचि- वायुरोग'-ग्रस्त अर्थात् सफाईके लिये पागल मायाबद्ध व्यक्ति नहीं थे। अथवा प्राकृत कनिष्ठ भक्तकी भाँति द्वैतबुद्धिवाले होकर 'भौमे इज्यधी' अर्थात् जड़में चिद् । 11